लेखकीय अधिकार से लिखें अनुयायी बनकर नहीं


इस देश में स्वतंत्रता के बाद विचार और चिंतन के नाम पर तमाम तरह के वाद और नारे दिए गए। जिन पर देश का बौद्धिक और चिन्तक वर्ग कई भागों में बंट गया। सभी ने अपने वाद और नारों के अनुसार किताबे लिखीं, लिखवाईं और बंटवाईं। उन्होने तय किया किया कि लोगों के बच्चे वह पढें जो हम पढ़वाएं। ऐसा हुआ भी पर इस देश में हमारे पुराने महापुरुषों के जीवन चरित्र और संदेशों से भरपूर साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और लोगों ने मैकाले द्वारा रचित इस शिक्षा प्रणाली से अक्षर ज्ञान तो लिया पर अपने मन और विचारों से अपने प्राचीनतम ज्ञान को विस्मृत नहीं होने दिया। नेताओं और अभिनेताओं द्वारा प्रदत विषयों के साथ लोग उठे-बैठे पर उनको धारण नहीं किया और यही बात इस देश पर बौद्धिक रूप से अपना नियंत्रण करने वालों को अखरी तब उन्होने उन पर अपने मन पसंद के पात्रों को शैक्षिक पुस्तकों में पढ़ने के लिए थोपा। फिर उनसे भी काम नहीं चला तो अब ऐसे पात्र पढ़ने के लिए दिए जा रहे हैं जिनका मापदंड यह है कि वह लोकप्रिय रहें भले ही इसके लिए कोई निर्धारित नियम नहीं है।

मैं बात कर रहा हूँ विचारधाराओं की। दरअसल नारे लगाना अलग चीज है और अपने मान्य दर्शन पर चलना अगला मामला है। वाद और नारों से भीड़ एकत्रित तो हो जाती है इस आशा के साथ कि उसका लाभ होगा पर जब वह अपने अगुआओं को शक्ति तो प्रदान कर देती है पर बाद में पता लगता है कि वास्तविकता कुछ और है।

हमारे देश में राजनीति के सबसे विशारद के रूप में चाणक्य में लिया जाता है और उनके नाम का मोह लोगों के मन में इतना है कि जो भी नेता वयोवृद्ध हो जाता है अपने को इस नाम की उपाधि मिलने पर प्रसन्न होता है। जो सता में आ जाता है तो वह उसे एक तरह से चाणक्य ही कहा जाता है। मगर आप जानते हैं कि चाणक्य ने कभी कोई पद नहीं लिया-कभी सुख सुविधा का पीछा नहीं किया। इधर-उधर से विचारधाराएं लाकर अपने को एक उम्र के बाद चाणक्य कहे जाने पर प्रसन्न होने वाले विचारधाराओं के यह पोषक उसे महान व्यक्तित्व के मार्ग पर चलना तो दूर उस पर एक कदम भी नहीं रखे सके। सच तो यह है कि जब इस देश का समाज शब्दश: उनके मार्ग पर नहीं चलेगा यहाँ कि व्यवस्था नहीं सुधर सकती।

मैं अपने साथियों को जो ब्लोग पर लिख रहे हैं उन्हें इस बात के लिए आगाह कर देना चाहता हूँ कि मैंने अब तक जितना चाणक्य का लिखा हुआ अपने ब्लोगों पर लिखा है वह ज्ञान बघारने के लिए नहीं स्वाध्याय के लिए लिखा है और उसमें अभी तक कहीं भी ऐसे पंक्ति नहीं आयी जिसमें लिखा हो कि राजनीति में किसी पर विश्वास करना चाहिए। इस देश में जो विचारधाराएं हैं वह कहीं न कहीं राजनीति का प्रतिबिम्ब हैं और जो ब्लोगर इससे प्रेरित होकर लिखे रहें हैं उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि
१।क्या वह सही राह पर हैं?
२। क्या वह जिन लोगों का अपनी विचारधारा के आधार पर समर्थन कर रहे हैं वह वाकई उस पर चल रहे हैं
३।क्या उनसे कोई निजी लाभ हैं?
४।क्या वह जिनके समर्थन या विरोध में लिख रहे हैं उस पर उन्होने स्वयं गहनता से विचार किया है।
५।क्या उससे सामान्य व्यक्ति संतुष्ट है।
इस मामले मने अगत लिखने से तत्काल कोई उनको लाभ मिलता है तो जरूर लिखें पर भविष्य में मिलने की उम्मीद में लिखने की बजाय अन्य रुचिकर विषयों पर लिखें. राजनीति में भविष अनिश्चित होता है.यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी को किसी विषय पर लिखने के लिए न तो प्रेरित कर रहा हूँ न रोक रहा हूँ क्योंकि इसका न मुझे अधिकार है न किसी और को। यह आलेख केवल मैं अपने साथ ब्लोगरों से चर्चा और विचार के लिए लिख रहा हूँ। मैं सोचता हूँ कि ब्लोगिंग एक ऐसी विधा है जिसमें अपने विचार स्वतन्त्र रूप का अवसर मिलता है जो कि अब से पहले दुर्लभ था और हम दूसरे के हाथ में मौजूद साधनों पर निर्भर थे। तब हम इस बात का भी विचार करते थे कि उनसे हमारे विचार न मिलते हों तो छपने के लिए मिला लेना चाहिए। इस आदत ने हमारी चिन्त्तन और मनन की प्रक्रिया को पंगु कर दिया है। इसलिए जब ब्लोगर ऐसे विषय को लेते हैं तो उन्हें उस पर गहनता पूर्वक विचार कर फिर लिखना चाहिए। मैं देखता हूँ कि कई लेखक जब लिखते हैं तो साफ लगता है कि उसमें उनका सोच कम विचारधाराओं के स्वयंभू लोगों के नारे अधिक हैं। अपने वैचारिक चिन्त्तन और अनुसंधान का अभाव उनमें साफ नजर आता है। ऐसे में मुझे लगता है कि शायद किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध कोई अखबार पढ़ रहा हूँ।

मैं अपने अच्छा लेखक हूँ या नहीं मुझे पढ़ने वाले आप लोग तय करेंगे पर मैं अच्छी और सरस रचनाओं को पढ़ने वाला एक अच्छा पाठक हूँ और मुझे किसी विचारधारा से न तो विरोध हैं न प्रतिबद्धता पर मैं कुछ नया पढ़ना चाहता हूँ। राजनितिक विषयों से मुझे परहेज नहीं है पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथी जब लिखें तो अपने लेखकीय अधिकार से लिखें किसी के अनुयायी या प्रशंसक बनकर नहीं.

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टिप्पणियाँ

  • Sanjeeva Tiwari  On 24/11/2007 at 16:47

    शीर्षक से सौ फीसदी सहमत हूं , मेरे लिये तो यह बढिया आत्‍ममंथन है भाई, धन्‍यवाद ।

    http://www.aarambha.blogspot.com

  • umesh saroj  On 24/11/2007 at 17:50

    Deepak ji whatever you have written is the mirror you have shown to the socitey but the concrete part is still missing , what it is ? its not traced by me but there is something which is in mind but uable to express it.Still its a great job for primary learners who can gain a lot to do better in there writing.Only critics not solve the problems rather it creates illusions .

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