पैसा कभी ठंड तो कभी गर्मी पैदा करता है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन
आजकल भारत में बेमौसम क्रिकेट मैच के आयोजन हो रहे हैं। पहले जब भारत में कोई विदेशी क्रिकेट टीम आती थी तो उसके लिये सर्दी का मौसम तय हुआ करता था। उस काल में नवंबर से फरवरी तक ही टेस्ट मैचों का आयोजन होता था। भारतीय टीम भी तभी विदेशों में जाती थी जब वहां का मौसम इस खेल के अनुकूल होता था। जब से इस खेल ने फिल्म और टीवी की तरह मनोरंजक के साथ ही व्यवसायिक रूप लिया है तब से इसका कोई मौसम नहीं रहा।
कभी देश भक्ति का वास्ता देकर क्रिकेट प्रेमियों को आकर्षित किया गया था। अब शहरों की प्रतिष्ठा का विषय बनाया गया है। तय बात है कि बड़े शहरों के नाम पर बने इन क्लबों के बीच होने वाले व्यवसायिक मैचों को वैसह हार्दिक अभिनंदनीय मान्यता नहीं है जैसे दो देशों के बीच होने वाले मैचों को मिलती थी। एक सज्जन उस दिन कह रहे थे कि यह क्लबस्तरीय प्रतियोगिता होना देश का गौरव है। होगी भई, कौन इसका विरोध कर सकता है? फिर छोटे शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी इस पर अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां दे भी तो उसे सुनने वाला कौन है? क्लब स्तरीय इस प्रतियोगिता से खेल का क्या लेना देना है, यह आज तक समझ में नहंी आया। कुछ लोगों इसे खेल के विकास के लिये अत्यंत उपयुक्त बताया है। इस पर हंसी आती है। खेलों का विकास कैसे होता है यह आज तक समझ में नहीं आया। अगर अधिक से अधिक लोगों उसे खेलने लगें और उसे ही विकास कहा जाये तो भी बात जमती नहीं क्योंकि क्रिकेट खेलने वाले हमारे देश में बहुत सारे लोग हैं। वह सारे लोग क्रिकेट खेलते हैं जिन्हे मैदान और साथ मिल जाते हैं। अगर खिलाड़ियों को अधिक पैसा मिलना ही विकास है तो फिर प्रश्न आता है कि कितने खिलाड़ियों को यह पैसा मिल रहा है? पैसा कमाने वालों की संख्या हजार या डेढ़ हजार से ऊपर दिख नहीं सकती। जिस देश में करोड़ों बेरोजगार हों वहां यह संख्या विकास का स्वरूप नहीं दिखाती।
यह प्रतियोगिता शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये है। अगर अपने पास समय है। टीवी पर कोई ढंग का कार्यक्रम नहीं आ रहा हो तब अगर क्रिकेट का अभिनय करते क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना बुरा नहीं है। बीच बीच में विज्ञापनों का भी मनोंरजन आ ही जाता है। कुछ बिफरे हुए आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के साथ मनोरंजन के क्षेत्र जैसा व्यवहार होना चाहिये। यह उनका अपना नजरिया है पर एक बात तय है कि गर्मी के मौसम में इस खेल का आयोजन करना कोई सरल काम नहीं है। कहते हैं कि पैसा आदमी में गर्मी पैदा करता है पर जब इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन इस तर्क का जनक भी है कि यही पैसा ठंड का काम भी करता है।
टीवी की बात हो रही है तो आजकल दो कॉमेडी धारावाहिक आते हैं। दोनों का समय टकराता है। तब चैनल बदल बदल कर उनको देखना पड़ता है। हमेशा ही अपने साथ बोरियत का सामान लेकर चलने वाले लोगों के लिये कॉमेडी अच्छा विषय है। यह अलग बात है कि कॉमेडी प्रस्तुत करने वाले को भी कुछ विनोदप्रिय होना चाहिये। दोनों कॉमेडी धारावाहिक देखकर लगता नहीं है कि उनके साथ कोई लेखकीय न्याय हो रहा है। हमारे देश के धनपति साहित्य, कला, खेल, फिल्म और अन्य मनोरंजक व्यवसायों से पैसा तो कमाना चाहते हैं पर उसके लिये प्रतिभाओं की खोज उनके बूते का नहीं है। सच बात तो यह है कि पाश्चात्य व्यवसायी भी पैसा कमाते हैं पर उनकी अपने काम से प्रतिबद्धता होती है। कुछ नया करना उनका मौलिक स्वभाव है। उनकी यह प्रवृत्ति उनका प्रबंध कौशल बढ़ाती है। इसके विपरीत भारतीय व्यवसायी पैसा कमाते हैं पर उनकी काम से अधिक कमाई से प्रतिबद्धता रहती है। कुछ नया करने की बजाय वह उपलब्ध व्यवस्था और साधनों का ही उपयोग करते हैं। यही कारण है कि फिल्म और टीवी प्रसारणों में अंग्रेजी फिल्मों और धारावाहिकों की नकल दिखती है। खास बात यह कि भारत में लेखक को एक दोयम दर्जे का जीव माना जाता है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में हिन्दी मनोरंजक कार्यक्रम मुबंई में बनते जहां की मूल भाषा भले ही मराठी है पर हिन्दी एक तरह से खिचड़ी भाषा बन गयी है। यही कारण है कि मुंबईया फिल्म और धारावाहिकों की हिन्दी उत्तर भारत की मूल हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोनों कारणों से हिन्दी कार्यक्रम अमौलिक हो जाते हैं। बड़े बड़े दिग्गज हिन्दी लेखक हिन्दी फिल्मों में काम करने गये पर बेरंग वापस लौटे आये। इसका कारण यह कि मुंबई के थैलीशाह हिन्दी लेखक के मनोविज्ञान को नहीं समझते। स्थिति यह है कि इतने सारे हिन्दी धारावाहिक तथा फिल्मों के पुरस्कार वितरण समारोह होते हैं वहां उसे लिखने वाले को सम्मान मिलने वाली घटना सामने नहीं आती। सच बात तो कहें कि हमें लगता है कि इन फिल्मों और धारावाहिकों के कथा, पटकथा और संवाद लेखकों की हैसियत स्पॉट बॉय से अधिक नहीं होगी। यही कारण है कि भाषा की दृष्टि से हिन्दी कार्यक्रम स्तरीय नहीं होते। कल्पनाशक्ति का अभाव साफ दिखता है। यही कारण है कि कॉमेडी कार्यक्रमों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर हास्य का भाव पैदा किया जाता है।
पहले कहा जाता था कि हिन्दी गरीबों की भाषा है। यह अलग बात है कि ऐसा कहने वाले प्रसिद्धि भी हिन्दी में अधिक पाते रहे हैं। अब हिन्दी वालों के पास पैसा भी खूब है। यही कारण है कि अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रसारण हिन्दी में भी हो रहा है। यह भी एक तरह से अंग्रेजी व्यवसायियों की प्रबंध कुशलता का परिणाम है। जबकि भारतीय मनोरंजन व्यवसायी हिन्दी का खाकर उसे दुत्कारते भी हैं। हिन्दी लेखकों के प्रति असम्मान का भाव रखन उसकी भाषा को दुत्कारने जैसा ही है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior
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सपनों का सौदा और बाज़ार-हिन्दी कविताhttp://youtu.be/xVyay7jtBqA
अध्यात्मिक विषय पर इंटरनेट पर निजी चर्चा पर वीडियो जारी करने का एकल प्रायोगिक प्रयास
मरे इंसान का भूत-हिन्दी कविता
मरे इंसान का नाम लेने से भी
वह घबड़ाते हैं
डर है उसके साथ हमदर्दी करते हुए
ज़माना बह न जाये
जो कह न सके कीमती जिंदा लोग
उसका भूत वह बात न कह जाये
इसलिये अमुक नाम से बुलाते हैं।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के
प्रचार माध्यम भौंपू हैं
खड़े करते हैं दाम देकर मशहूर लोग,
समझ न हो पर भी बोलने का हो जिनको रोग,
कत्ल किया गया जिसका जिस्म
जलकर वह राख हो गया,
जिंदा कौड़ी का था
मरकर उसका दाम टके से लाख हो गया,
चलने लगे न उसके नाम का सिक्का
छिपाया इसलिये
अपने खोटे सिक्कों को पिटने से बचाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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कुछ शोक कुछ विज्ञापन-हिंदी हास्य व्यंग्य
दो प्रचार प्रबंधक एक बार में सोमरस का उपभोग करने के लिये गये। बैरा उनके कहे अनुसार सामान लाता और वह उसे उदरस्थ करने के बाद इशारा करके पास दोबारा बुलाते तब फिर आता। दोनों आपस में अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत करते रहे। एक प्रचार प्रबंधक ने दूसरे से कहा‘-‘‘यार, मेरे चैनल का मालिक विज्ञापनों का भूखा है। कहता है कि तुम समाचार अधिक चलाते हो विज्ञापन कम दिखाते हो।’’
दूसरा बोला-‘‘यार, मेरे चैनल पर तो समाचारों का सूखा है। इतने विज्ञापन आते हैं कि समझ में नहीं आता कि समाचार चलायें कि नहीं। जिन मुद्दों पर पांच मिनट की बहस होती है हम पच्चपन मिनट के विज्ञापन चलाते हैं। हालांकि इस समय मुसीबत यह है कि हर रोज कोई मुद्दा मिलता नहीं है।’’
पहला बोला-‘‘अरे, इसकी चिंता क्यों करते हो? हम और तुम मिलकर कोई कार्यक्रम बनाते हैं। राई को पर्वत और रस्सी को सांप बना लेंगे। अरे दर्शक जायेगा कहां? मेरे चैनल या तुम्हारे चैनल पर जाने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है।
इतने में बैरा उनके आदेश के अनुसार सामान ले आया। उसकी आंखों में आंसु थे। यह देखकर पहले प्रचार प्रबंधक ने उससे पूछा कि ‘‘क्या बात है? रो क्यों रहे हो? जल्दी बताओ कहीं हमारे लिये जोरदार खबर तो नहीं है जिससे हमारे विज्ञापन हिट हो जाये।’’
बैरा बोला-‘‘नहीं साहब, यह शोक वाली खबर है। वह मर गयी।’’
दोनों प्रबंधक उछलकर खड़े हुए पहला बोला-‘‘अच्छा! यार तुम यह पैसा रख लो। सामान वापस ले जाओ। हम अपने काम पर जा रहे है। आज समाचार और बहसों के लिये ऐसी सामग्री मिल गयी जिसमे हमारे ढेर सारे विज्ञापन चल जायेंगे।’’
दूसरा बोला-‘‘यार, पर शोक और उसकी बहस में विज्ञापन! देखना लोग बुरा न मान जायें।’’
पहला बोला-‘‘नहीं यार, लोग आंसु बहायेंगे। विज्ञापन देखकर उनको राहत मिलेगी। हम फिर उनको रुलायेंगे। देखा नहीं उसके बस से लेकर उसके अस्पताल रहने तक हमने समाचार और बहस में कितने विज्ञापन चलाये।’’
दूसरा बोला-‘‘पहले यह तो इससे पूछो मरी कौन है?’’
पहले ने बैरे से पूछा-‘‘यह तो बताओ मरी कौन है?’’
बैरा रोता रहा पर कुछ बोला नहीं। दूसरे ने कहा-‘‘यार, यह तो मौन है।’’
पहला बोला-‘‘चलो यार, अपने विज्ञापन का काम देखो। यह हमारा कौन है?’’
दोनों ही बाहर निकल पड़े। पहले ने एक विद्वान को मोबाइल से फोन किया और बोला-‘‘जनाब, आप जल्दी आईये। अपने साथ अपनी मित्र मंडली भी लाना। सभी अच्छा बोलने वाले हों ताकि दर्शक अधिक से अधिक हमने चैनल पर बने रहें। हमारा विज्ञापन का समय निकल सके।’’
दूसरे ने भी मोबाईल निकाला और अपने सहायक से बोला-‘‘सुनो, जल्दी से विज्ञापन की तैयारी कर लो। एक खबर है जिस पर लंबी बहस हो सकती है। इसमें अपनी आय का लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी।’’
दोनों अपने लक्ष्यों की तरफ चल दिये। उन्होंने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि ‘मरी कौन है’। इससे उनका मतलब भी नहीं था।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
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नारे और ज़माना-हिंदी कविता
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
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बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों से इस देश की सोचने की क्षमता का खूब दोहन किया -विशेष रविवारीय लेख
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गुरु चेला और नया ज़माना-हिंदी हास्य कविता
‘‘महाराज,
केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,
कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,
आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह
माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,
शायद नये युवा आपके नाम के साथ शब्द गुरु भरें,
वरना यही सब थम जायेगा,
खालीपन का यहां गम आयेगा,
मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता
छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।सुनकर उस्ताद ने कहा
‘‘जाना है तो चला जा,
तू ही इश्क गुरु बन कर आ,
हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,
इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,ं
अपनी तबाही पर रोते लोग
जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,
महंगाई का हाल यह है कि
सामान हो गये महंगे
आदमी सस्ता हो गया है,
आशिकी हो सकती है थोड़ी देर
जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,
जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे
तभी तक ठीक है
हम फिल्म के हीरो नहीं
जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है
किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका
तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,
कमबख्त,
जिस रास्ते से भाग कर
सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है
कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है
हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,
तू भी कर बंद आना कल से
वरना हमारे अंदर मरे आशिक का
भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।
—————–
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep”"
Gwalior, madhyapradesh
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1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
उधार के फूल-हिंदी कविता
मुश्किल में देश है
हल के लिये सजती हैं महफिलें
बहसों में रोज वही चेहरे
नये अल्फाजों के साथ आते हैं,
नतीजा सिफर है
कहने वालों को मालुम नहीं क्या कहा
सुनने वाले भी भूल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
हम तो चले भगवान भरोसे हमेशा
कभी खुश हुए कभी गमगीन,
पर्दे पर आते चेहरे देखे
कोई मीठे कोई नमकीन,
सभी बो रहे जमाने के लिये कांटे
अपने लिये उधार मे फूल लाते हैं।
————–
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, Madhya pradesh
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
ठग बनते हैं सरताज-हिंदी कविता
देखता है पूरा ज़माना,
मगर कोई एक काबिल ही होताजिसे मिलती है जहान की गद्दी
यह अलग बात है कि
नाकाबिलों को भी आता है
अपने इलाके को सल्तनत बताना।
कहें दीपक बापू
ठग बनते ठगी के सरताज,
मूर्ख अपनी हरकतों को माने
दुनियां का राज,
सोने के सिक्के संदूकों में छिपाकर,
लूट का माल अपने नाम लिखाकर,
हल्दी की गांठ मिलते ही
चूहों को भी आता है बादशाह बन जाना।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
चौराहों पर बहस कर लो-हिंदी व्यंग्य कविता
महलों में रहने,
हवाई जहाज में बैठने,
और अपनी जिंदगी का बोझ
गुलामों के कंधों पर रखने वालों से
हमदर्दी की आशा करना है बेकार,
जिन्होंने दर्द नहीं झेला
कभी अपने हाथ काम करते हुए
ओ मेहनतकश,
उनसे दाद पाने को न होना बेकरार।
कहें दीपक बापू
चौराहों पर चाहे जितनी बहस कर लो,
अपना दर्द बाजार में बेचने के लिये भर लो,
मगर भले के सौदागरों से न करना कभी
इलाज के बदले दिल देने का करार।
—————————————
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
athor and editor-Deepak “Bharatdeep”,Gwalior
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खलनायक और पहरेदार-हिंदी व्यंग्य कविता
चेहरे रोज
उनकी अदाऐं कई बार बदल जाती हैं,
कभी कोई नायक है
कभी बन जाता है खलनायक
अपनी अपनी भूमिका है
मिलता है पैसा
सभी को निभानी आती है।
कहें दीपक बापू
बाज़ार और प्रचार का खेल है यह
कभी पहजेदार पर ही लगता है
राहजनी का इल्जाम
फरियादी पाता है खजाना बचाने का ठेका
चाबी हाथ में आते उसकी नीयत बदल जाती है,
एक सिरे पर लुटेरे हैं
दूसरे पर खड़े साहूकार
बीच में फंसा है जमाना,
दोनों को पैसा है हथियाना,
एक काला है दूसरा सफेदपोश
एक राह के राहगीर
उनकी दोस्ती हो ही जाती है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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काली नीयत के तोहफे-हिंदी कविता
तोहफे देने वालों की
नीयत पर भला कौन शक करता है,
बंद हो जाते हैं अक्ल के दरवाजे
इंसान हाथ में लेते हुए आहें भरता है।
कहें दीपक बापू
आम आदमी के दिल से खेलने का
तरीका है तोहफे देना
जिसे पाने की करता है वह जद्दोजेहद
खोने की बात सोचने से भी डरता है।
——–
तोहफों का जाल बुनते हैं वह लोग
जिनके दिल मतलबी ओर तंग हैं,
कहें दीपक बापू
नीयत है जिनकी काली
बाहर दिखाते वह तरह तरह के रंग हैं
——————
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
Deepak raj kureja “”BharatDeep”"
Gwalior madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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सेवा का व्रत मेवा में पद-हिंदी कविता
सेवा का व्रत उन्होंने उठाया है,
मेवा में पद मिलेगा
किसी ने उनको सुझाया है।
गरीबों की मदद
मजदूरों को मेहनताना
और बीमार को इलाज दिलाने के लिये
वह समाज सेवा करने में जुट गये है,
रहने के लिये महल
बैठने के लिये कुर्सी
उड़ने क्रे लिये विमान
उनकी पहली जरूरत बन गये है
लाचार तक पहुंचने के लिये
बन गयी उनकी पहली जरूरत
कई साहुकार बन गये मदद पाने के लिये लाचार
सेवक बने स्वामियों की मदद में
उनके खजाने लुट गये हैं।
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