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पैसा कभी ठंड तो कभी गर्मी पैदा करता है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन

               आजकल भारत में बेमौसम क्रिकेट मैच के आयोजन हो रहे हैं।  पहले जब भारत में कोई विदेशी क्रिकेट टीम आती थी तो उसके लिये सर्दी का मौसम तय हुआ करता था। उस काल में  नवंबर से फरवरी तक ही टेस्ट मैचों का आयोजन होता था। भारतीय टीम भी तभी विदेशों में जाती थी जब वहां का मौसम इस खेल के अनुकूल होता था।  जब से इस खेल ने फिल्म और टीवी की तरह मनोरंजक के साथ ही व्यवसायिक रूप लिया है तब से इसका कोई मौसम नहीं रहा।

             कभी देश भक्ति का वास्ता देकर क्रिकेट प्रेमियों को आकर्षित किया गया था। अब शहरों की प्रतिष्ठा का विषय बनाया गया है। तय बात है कि बड़े शहरों के नाम पर बने इन क्लबों के बीच होने वाले व्यवसायिक मैचों को वैसह हार्दिक अभिनंदनीय मान्यता नहीं है जैसे दो देशों के बीच होने वाले मैचों को मिलती थी।  एक सज्जन उस दिन कह रहे थे कि यह क्लबस्तरीय प्रतियोगिता होना देश का गौरव है।  होगी भई, कौन इसका विरोध कर सकता है?  फिर छोटे शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी इस पर अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां दे भी तो उसे सुनने वाला कौन है?  क्लब स्तरीय इस प्रतियोगिता से खेल का क्या लेना देना है, यह आज तक समझ में नहंी आया।  कुछ लोगों इसे खेल के विकास के लिये अत्यंत उपयुक्त बताया है। इस पर हंसी आती है।  खेलों का विकास कैसे होता है यह आज तक समझ में नहीं आया।  अगर अधिक से अधिक लोगों उसे खेलने लगें और उसे ही विकास कहा जाये तो भी बात जमती नहीं क्योंकि क्रिकेट खेलने वाले हमारे देश में बहुत सारे लोग हैं।   वह सारे लोग क्रिकेट खेलते हैं जिन्हे मैदान और साथ मिल जाते हैं। अगर खिलाड़ियों को अधिक पैसा मिलना ही विकास है तो फिर प्रश्न आता है कि कितने खिलाड़ियों को यह पैसा मिल रहा है?  पैसा कमाने वालों की संख्या हजार या डेढ़ हजार से ऊपर दिख नहीं सकती। जिस देश में करोड़ों बेरोजगार हों वहां यह संख्या विकास का स्वरूप नहीं दिखाती।

      यह प्रतियोगिता शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये है।  अगर अपने पास समय है।  टीवी पर कोई ढंग का कार्यक्रम नहीं आ रहा हो तब अगर क्रिकेट का अभिनय करते क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना बुरा नहीं है।  बीच बीच में विज्ञापनों का भी मनोंरजन आ ही जाता है।  कुछ बिफरे हुए आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के साथ मनोरंजन के क्षेत्र जैसा व्यवहार होना चाहिये।  यह उनका अपना नजरिया है पर एक बात तय है कि गर्मी के मौसम में इस खेल का आयोजन करना कोई सरल काम नहीं है। कहते हैं कि पैसा आदमी में गर्मी पैदा करता है पर जब इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन इस तर्क का जनक भी है कि यही पैसा ठंड का काम भी करता है।

   टीवी की बात हो रही है तो आजकल दो कॉमेडी धारावाहिक आते हैं।  दोनों का समय टकराता है। तब चैनल बदल बदल कर उनको देखना पड़ता है।  हमेशा ही अपने साथ बोरियत का सामान लेकर चलने वाले लोगों के लिये  कॉमेडी  अच्छा विषय है।  यह अलग बात है कि कॉमेडी प्रस्तुत करने वाले को भी कुछ विनोदप्रिय होना चाहिये। दोनों कॉमेडी धारावाहिक देखकर लगता नहीं है कि उनके साथ कोई लेखकीय न्याय हो रहा है।  हमारे देश के धनपति साहित्य, कला, खेल, फिल्म और अन्य मनोरंजक व्यवसायों से पैसा तो कमाना चाहते हैं पर उसके लिये प्रतिभाओं की खोज उनके बूते का नहीं है। सच बात तो यह है कि पाश्चात्य व्यवसायी भी पैसा कमाते हैं पर उनकी अपने काम से प्रतिबद्धता होती है। कुछ नया करना उनका मौलिक स्वभाव है।  उनकी यह प्रवृत्ति उनका प्रबंध कौशल बढ़ाती है।  इसके विपरीत भारतीय व्यवसायी पैसा कमाते हैं पर उनकी काम से अधिक कमाई से प्रतिबद्धता रहती है। कुछ नया करने की बजाय वह उपलब्ध व्यवस्था और साधनों का ही उपयोग करते हैं। यही कारण है कि फिल्म और टीवी प्रसारणों में अंग्रेजी फिल्मों और धारावाहिकों की नकल दिखती है।  खास बात यह कि भारत में लेखक को एक दोयम दर्जे का जीव माना जाता है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में हिन्दी  मनोरंजक  कार्यक्रम मुबंई में बनते जहां की मूल भाषा भले ही मराठी है पर हिन्दी एक तरह से खिचड़ी भाषा बन गयी है।  यही कारण है कि मुंबईया फिल्म और धारावाहिकों की हिन्दी उत्तर भारत की मूल हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोनों कारणों से हिन्दी कार्यक्रम अमौलिक हो जाते हैं।  बड़े बड़े दिग्गज हिन्दी लेखक हिन्दी फिल्मों में काम करने गये पर बेरंग वापस लौटे आये। इसका कारण यह कि मुंबई के थैलीशाह हिन्दी लेखक के मनोविज्ञान को नहीं समझते।  स्थिति यह है कि इतने सारे हिन्दी धारावाहिक तथा फिल्मों के पुरस्कार वितरण समारोह होते हैं वहां उसे लिखने वाले को सम्मान मिलने वाली घटना सामने नहीं आती। सच बात तो कहें कि हमें लगता है कि इन फिल्मों और धारावाहिकों के कथा, पटकथा और संवाद लेखकों की हैसियत स्पॉट बॉय से अधिक नहीं होगी।  यही कारण है कि भाषा की दृष्टि से हिन्दी कार्यक्रम स्तरीय नहीं होते।  कल्पनाशक्ति का अभाव साफ दिखता है। यही कारण है कि कॉमेडी कार्यक्रमों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर हास्य का भाव पैदा किया जाता है।

               पहले कहा जाता था कि हिन्दी गरीबों की भाषा है। यह अलग बात है कि ऐसा कहने वाले प्रसिद्धि भी हिन्दी में अधिक पाते रहे हैं।  अब हिन्दी वालों के पास पैसा भी खूब है।  यही कारण है कि अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रसारण हिन्दी में भी हो रहा है। यह भी एक तरह से अंग्रेजी व्यवसायियों की प्रबंध कुशलता का परिणाम है।  जबकि भारतीय मनोरंजन व्यवसायी हिन्दी का खाकर उसे दुत्कारते भी हैं। हिन्दी लेखकों के प्रति असम्मान का भाव रखन उसकी भाषा को दुत्कारने जैसा ही है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

बाज़ार में बिकते सपनों के सौदे-विडियो पर चर्चा

सपनों का सौदा और बाज़ार-हिन्दी कविताhttp://youtu.be/xVyay7jtBqA

वीडियो पर हिंदी व्यंग्य प्रस्तुत करने का एक प्रयास

वीडिओ पर व्यंग्य कविता प्रस्तुत करने का प्रयास http://youtu.be/4HN16j3CN0Q

अध्यात्मिक विषय पर इंटरनेट पर निजी चर्चा पर वीडियो जारी करने का एकल प्रायोगिक प्रयास

अध्यात्म के  विषय पर यह वीडियो एक प्रयोग के लिये प्रस्तुत किया जा रहा है। अगर इस पर सही प्रतिक्रियायें मिली तो अन्य वीडियो भी प्रस्तुत किया जा रहा है। याद रखें यह एकल अव्यवसायिक प्रयास है। इसमें व्यवसायिक आकर्षण ढूंढना व्यर्थ होगा। http://youtu.be/zKkqSF7Z7CQ

मरे इंसान का भूत-हिन्दी कविता

 

मरे इंसान का नाम लेने से भी
वह घबड़ाते हैं
डर है उसके साथ  हमदर्दी करते हुए
ज़माना बह न जाये
जो कह न सके  कीमती जिंदा लोग
उसका भूत वह बात न कह जाये
इसलिये अमुक नाम से बुलाते हैं।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के
प्रचार माध्यम भौंपू हैं
खड़े करते हैं दाम देकर मशहूर लोग,
समझ न हो पर भी बोलने का हो जिनको रोग,
कत्ल किया गया जिसका जिस्म
जलकर वह राख हो गया,
जिंदा कौड़ी का था
मरकर उसका दाम टके से लाख हो गया,
चलने लगे न उसके नाम का सिक्का
छिपाया इसलिये
अपने खोटे सिक्कों को पिटने से बचाते हैं।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior

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कुछ शोक कुछ विज्ञापन-हिंदी हास्य व्यंग्य

                     दो प्रचार प्रबंधक एक बार में सोमरस का उपभोग करने के लिये   गये। बैरा उनके कहे अनुसार सामान लाता और वह उसे उदरस्थ करने के बाद इशारा करके पास दोबारा बुलाते तब फिर आता। दोनों आपस में अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत करते रहे।  एक प्रचार प्रबंधक ने दूसरे से कहा‘-‘‘यार, मेरे चैनल का मालिक विज्ञापनों का भूखा है।  कहता है कि तुम समाचार अधिक चलाते हो विज्ञापन कम दिखाते हो।’’

दूसरा बोला-‘‘यार, मेरे चैनल पर तो समाचारों का सूखा है।  इतने विज्ञापन आते हैं कि समझ में नहीं आता कि समाचार चलायें कि नहीं। जिन मुद्दों पर पांच मिनट की बहस होती है  हम पच्चपन मिनट के विज्ञापन चलाते हैं।  हालांकि इस समय मुसीबत यह है कि हर रोज कोई मुद्दा मिलता नहीं है।’’

पहला बोला-‘‘अरे, इसकी चिंता क्यों करते हो? हम और तुम मिलकर कोई कार्यक्रम बनाते हैं। राई को पर्वत और रस्सी को सांप बना लेंगे। अरे दर्शक जायेगा कहां? मेरे चैनल  या तुम्हारे चैनल पर जाने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है।

इतने में बैरा उनके आदेश के अनुसार सामान ले आया।  उसकी आंखों में आंसु थे। यह देखकर पहले प्रचार प्रबंधक ने उससे पूछा कि ‘‘क्या बात है? रो क्यों रहे हो? जल्दी बताओ कहीं हमारे लिये जोरदार खबर तो नहीं है जिससे हमारे विज्ञापन हिट हो जाये।’’

बैरा बोला-‘‘नहीं साहब, यह शोक वाली खबर है।  वह मर गयी।’’

दोनों प्रबंधक उछलकर खड़े हुए पहला बोला-‘‘अच्छा! यार तुम यह पैसा रख लो। सामान वापस ले जाओ। हम अपने काम पर जा रहे है। आज समाचार और बहसों के लिये ऐसी सामग्री मिल गयी जिसमे हमारे ढेर सारे विज्ञापन चल जायेंगे।’’

दूसरा बोला-‘‘यार, पर शोक और उसकी बहस में विज्ञापन! देखना लोग बुरा न मान जायें।’’

पहला बोला-‘‘नहीं यार, लोग आंसु बहायेंगे। विज्ञापन देखकर उनको राहत मिलेगी। हम फिर उनको रुलायेंगे। देखा नहीं उसके  बस से लेकर उसके अस्पताल रहने तक  हमने समाचार और बहस में कितने विज्ञापन चलाये।’’

दूसरा बोला-‘‘पहले यह तो इससे पूछो मरी कौन है?’’

पहले ने बैरे से पूछा-‘‘यह तो बताओ मरी कौन है?’’

बैरा रोता रहा पर कुछ बोला नहीं। दूसरे ने कहा-‘‘यार, यह तो मौन है।’’

पहला बोला-‘‘चलो यार, अपने विज्ञापन का काम देखो।  यह हमारा कौन है?’’

दोनों ही बाहर निकल पड़े। पहले ने एक विद्वान को मोबाइल से फोन किया और बोला-‘‘जनाब, आप जल्दी आईये।  अपने साथ अपनी मित्र मंडली भी लाना। सभी अच्छा बोलने वाले हों ताकि दर्शक अधिक से अधिक हमने चैनल पर बने रहें। हमारा विज्ञापन का समय निकल सके।’’

दूसरे ने भी मोबाईल निकाला और अपने सहायक से बोला-‘‘सुनो, जल्दी से विज्ञापन की तैयारी कर लो। एक खबर है जिस पर लंबी बहस हो सकती है। इसमें अपनी आय का लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी।’’

दोनों अपने लक्ष्यों की तरफ चल दिये। उन्होंने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि ‘मरी कौन है’। इससे उनका मतलब भी नहीं था।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश 

poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

नारे और ज़माना-हिंदी कविता

किस पर भरोसा करें
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के  हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर  बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों से इस देश की सोचने की क्षमता का खूब दोहन किया -विशेष रविवारीय लेख

                  जब कभी टीवी पर बैठें हमारा चिंतन चल पड़ता है।  कभी हंसी आती है तो कभी दुःख होता है। हमारे टीवी चैनलों ने समाज की बौद्धिक शक्ति का हरण किया है वह आश्चर्यजनक है। वह जैसा चाहते हैं वैसे ही लोग सोचते हैं।  अपना सोचना एक तरह से लोग भूल ही गये हैं।  इंग्लैंड की टीम अपने ही घर पर बीसीसीआई की टीम को धो पौंछकर घर गयी।  लगातार हार पर चैनलों का विलाप होता रहा।  टेस्ट मैचों में बुरी तरह हारी बीसीसीआई की टीम के लिये चैनल चीखते  रहे-अब यहां जीतो वहां जीतो।  बाद में आये  बीस ओवरीय मैच, जिनको उतना प्रचार नहीं मिला।  दरअसल टीवी चैनलों को यह मौका मिला दिल्ली में एक गैंगरैप की घटना के कारण!  इस दौरान समाचार वाले टीवी चैनलों ने तो इंग्लैंड के साथ होने वाले बीस ओवरीय मैचों की खबर अत्यंत हल्के ढंग से दी। यहां तक कि हर मैच में टॉस की खबर देने वाले समाचार चैनलों ने अपने दर्शकों को इस तरह उलझाया कि बहुत कम लोगों ने यह मैचा देखा होगा।  हर मैच में टॉस की खबर देने वाले चैनलों ने इसे शोक में छिपाया यह व्यवसायिक मजबूरियों के कारण कहना मुश्किल है। वैसे इस दौरान गैंगरैप पर हुई बहसों में टीवी चैनलों का विज्ञापन समय खूब पास हुआ। इतना ही नहीं बीसीसीआई की टीम के इंग्लैंड की पराजय से उस पर विज्ञापन समय खर्च करने से कतराने वाले टीवी समाचार चैनल पांच दिन  गैंगरैप के मसले को इस तरह प्रचारित करते रहे कि अवकाश के दिनों में उसका  पारा चढ़ ही गया और इधर भीड़ बढ़ी तो उनको विज्ञापन समय पास करने के लिये अच्छा समय मिला। भीड़ के प्रदर्शन का उन्होंने सारा दिन मैच की तरह प्रसारित किया।  पुलिस के साथ भीड़ के झगड़े का प्रसारण इस तरह हो रहा था जैसे कि कोई हॉकी या फुटबॉल मैच हो रहा हो।  यकीनन देश के अनेक बौद्धिक चिंत्तक इस पर चिंतित हो रहे होंगे।  भीड़ का प्रदर्शन मैच की तरह प्रसारित कर टीवी समाचार चैनल अपने किस व्यवसायिक सिद्धांत का पालन कर रहे थे, यह समझना कठिन है
       इधर इस खबर का जोर कम हुआ तो पाकिस्तान की टीम आ गयी।  अब उसके साथ होने वाले बीस ओवरीय मुकाबले पर समाचार चैनल पिल पड़ हैं। महामुकाबला, सुपर मुकाबला तथा जोरदार मुकाबला आदि जैसे नारे लग रहे हैं। पांच साल बाद पाकिस्तान टीम भारत आ रही है इससे बड़ा झूठ क्या हो सकता है? पिछली बार पाकिस्तान की टीम विश्व क्रिकेट कप का सेमीफायनल मैच खेलने भारत आयी थी।  चलिये मान लिया। मगर उसका स्वागत इस तरह हो रहा है जैसे कि कोई नोबल पुरस्कार जीतकर आ रहा हो।  तय बात है कि यह स्वागत केवल दिखावा है और इस पर हो रही बहसों में विज्ञापन का समय पास हो रहा है।  बहरहाल छोटे और बड़े पर्दे का प्रभाव लोगों पर पड़ता ही है।  न भी पड़े तो विज्ञापनदाताओं को तो यह लगता ही है कि उनके उत्पाद का सही समय पर प्रचार हो रहा है।
 पहले हम जब फिल्म देखते थे तब यह अंदाज नहीं था कि उनका प्रभाव कितना हमारे मन पर पड़ता है।  पता तब चला जब फिल्मों से अलग हो गये।  वह भी तब छोटे पर्दे पर समाचारों में ऐसे दृश्य सामने आये जहां कहीं किसी आदमी को अनेक आदमी मिलकर मार रहे  है और भीड़ खड़ी देख रही है। हमने एक फिल्म देखी थी जिसमें एक अपराधी समूह से जूझले वाली  महिला को अनेक गुंडे सरेआम उसके घर के बाहर निर्वस्त्र किया  पड़ौसी अपने घरों दुबक कर  यह सब देख रहे थे।  उस फिल्म की कहानी मुंबई की पृष्ठभूमि पर थी।  हमें लगा कि अगर यह सब हमारे शहर में कहीं होता तो एक दो भला आदमी बीच में आ ही गया होता। अब नहीं लगता कि कोई भला आदमी सड़क पर देश के किसी भी हिस्से में किसी नारी की इज्जत बचाने आयेगा।  समाचारों में अनेक जगह महिलाओं पर सरेआम अत्याचार देखकर लगता है कि अब तो पूरा देश ही उस समय की मुंबई जैसा हो गया है जब हमने फिल्म देखी थी।  दूसरों की क्या कहें अपने पर भी संदेह है कि हम अकेले कहीं किसी अनाचार पर बोल पायेंगे कि नहीं।  सच कहें तो बड़े पर्दे की फिल्मों ने कहीं न कहीं कायरपन का बोध भर ही दिया है।
         हमारा स्पष्ट आरोप है कि मुंबईया फिल्मों में जानबूझकर ऐसे दृश्य डाले गये जिससे लोग किसी अपराधी गिरोह के विरुद्ध विद्रोह न करें या कहीं एक होकर अपराधियों पर सार्वजनिक रूप से प्रहार करें।  केवल नायक के अवतरण की प्रतीक्षा करते हुए सब देखते रहें। लगता है कि  इन फिल्मों में धन देने वाले लोग  ऐसे काले धंधों वाले रहे होंगे जो भीड़ से अपने गुर्गों को बचाना चाहते होंगे।  उनकी वजह से ही ऐसी नायक प्रधान कहानियां लिखी गयी जिससे समाज में कायरता या निर्लिप्तता का भाव आ जाये।  अब छोटे पर्दे पर भी यही दिखाई दिया।  जब यह सब देखते रहे तो चिंत्तन भी चलता रहा। अब लगता है कि बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों का एक समूह है जो अपने समय और हित के अनुसार समाज का पथप्रदर्शन इस तरह करता है कि उसका नेतृत्व धन लेकर उनके हितों का ध्यान रखते  हुए  अपनी भूमिका तय करता रहे।  कब देश में देशभक्ति का भाव जगाना है और कब लोगों  प्रेम और उदारता का नारा दिखाकर विदेश के प्रति आकर्षित करना है, यह सब अपने हिसाब से बाज़ार तथा प्रचार प्रबंधक तय करते हैं।  देखा जाये तो वह हर हाल में सफल हैं।  नफरत से सनसनी और प्रेम में मनोरंजन बेचने की जो कला बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों ने सीखी है वह आश्चर्यजनक है।
          सच बात तो यह है कि समाज छोटे और बड़े पर्देे से प्रभावित हो रहा है।  हमें इस पर आपत्ति नहीं होती पर चिंता इस बात की है कि लोगों ने स्वचिंतन की शक्ति को खो दिया है। यह देश के लिये खतरनाक संकेत है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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गुरु चेला और नया ज़माना-हिंदी हास्य कविता

चेले ने कहा उस्ताद से

‘‘महाराज,

केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,

कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,

आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह

माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,

शायद नये युवा आपके नाम के साथ  शब्द गुरु भरें,

वरना यही सब थम जायेगा,

खालीपन का यहां गम आयेगा,

मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता

छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।सुनकर उस्ताद ने कहा

‘‘जाना है तो चला जा,

तू ही इश्क गुरु बन कर आ,

हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,

इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,ं

अपनी तबाही पर रोते  लोग

जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,

महंगाई का हाल यह है कि

सामान हो गये महंगे

आदमी सस्ता हो गया है,

आशिकी हो सकती है थोड़ी देर

जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,

जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे

तभी तक ठीक है

हम फिल्म के हीरो नहीं

जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है

किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका

तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,

कमबख्त,

जिस रास्ते से भाग कर

सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है

कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है

हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,

तू भी कर बंद आना कल से

वरना हमारे अंदर मरे आशिक का

भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।

—————–

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep”"

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior

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उधार के फूल-हिंदी कविता

मुश्किल में देश है

हल के लिये सजती हैं महफिलें

बहसों में रोज वही चेहरे

नये अल्फाजों के साथ आते हैं,

नतीजा सिफर है

कहने वालों को मालुम नहीं क्या कहा

सुनने वाले भी भूल जाते हैं।

कहें दीपक बापू

हम तो चले भगवान भरोसे हमेशा

कभी खुश हुए कभी गमगीन,

पर्दे पर आते चेहरे देखे

कोई मीठे कोई नमकीन,

सभी बो रहे जमाने के लिये कांटे

अपने लिये उधार मे फूल लाते हैं।

————–

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर

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ठग बनते हैं सरताज-हिंदी कविता

 

बादशाह बनने का ख्वाब

देखता है पूरा ज़माना,

मगर कोई एक काबिल ही होता

जिसे मिलती है जहान की गद्दी

यह अलग बात है कि

नाकाबिलों को भी आता है

अपने इलाके को सल्तनत बताना।

कहें दीपक बापू

ठग बनते ठगी के सरताज,

मूर्ख अपनी हरकतों को माने

दुनियां का राज,

सोने के सिक्के संदूकों में छिपाकर,

लूट का माल अपने नाम लिखाकर,

हल्दी की गांठ मिलते ही

चूहों को भी आता है बादशाह बन जाना।

——————————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

चौराहों पर बहस कर लो-हिंदी व्यंग्य कविता

कभी न करना दिल देने का करार-हिन्दी कविता

महलों में रहने,

हवाई जहाज में बैठने,

और अपनी जिंदगी का बोझ

गुलामों के कंधों पर रखने वालों से

हमदर्दी की आशा करना है बेकार,

जिन्होंने दर्द नहीं झेला

कभी अपने हाथ काम करते हुए

ओ मेहनतकश,

 उनसे दाद पाने को न होना बेकरार।

कहें दीपक बापू

चौराहों पर चाहे जितनी बहस कर लो,

अपना दर्द बाजार में बेचने के लिये भर लो,

मगर भले के सौदागरों से न करना कभी

इलाज के बदले दिल देने का करार।

—————————————
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior

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खलनायक और पहरेदार-हिंदी व्यंग्य कविता

आंखों के सामने चमकते हैं जो

चेहरे रोज

उनकी अदाऐं कई बार बदल जाती हैं,

कभी कोई नायक है

कभी बन जाता है खलनायक

अपनी अपनी भूमिका है

मिलता है पैसा

सभी को निभानी आती है।

कहें दीपक बापू

बाज़ार और प्रचार का खेल है यह

कभी पहजेदार पर ही लगता है

राहजनी का इल्जाम

फरियादी पाता है खजाना बचाने का ठेका

चाबी हाथ में आते उसकी नीयत बदल जाती है,

एक सिरे पर लुटेरे हैं

दूसरे पर खड़े साहूकार

बीच में फंसा है जमाना,

दोनों को पैसा है हथियाना,

एक काला है दूसरा  सफेदपोश

एक राह के राहगीर

उनकी दोस्ती हो ही जाती है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “”Bharatdee”"
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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काली नीयत के तोहफे-हिंदी कविता

तोहफे देने वालों की
नीयत पर भला कौन शक करता है,
बंद हो जाते हैं अक्ल के दरवाजे
इंसान हाथ में लेते हुए आहें भरता है।
कहें दीपक बापू
आम आदमी के दिल से खेलने का
तरीका है तोहफे देना
जिसे पाने की करता है वह जद्दोजेहद
खोने की बात सोचने से भी डरता है।
——–
तोहफों का जाल बुनते हैं वह लोग
जिनके दिल मतलबी ओर तंग हैं,
कहें दीपक बापू
नीयत है जिनकी काली
बाहर दिखाते  वह तरह तरह के रंग हैं
——————
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश

Deepak raj kureja “”BharatDeep”"

Gwalior madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior

http://deepkraj.blogspot.com

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सेवा का व्रत मेवा में पद-हिंदी कविता


सेवा का व्रत उन्होंने उठाया है,
मेवा में पद मिलेगा
किसी ने उनको सुझाया है।
गरीबों की मदद
मजदूरों को मेहनताना
और बीमार को इलाज दिलाने के लिये
वह समाज सेवा करने में जुट गये है,
रहने के लिये महल
बैठने के लिये कुर्सी
उड़ने क्रे लिये विमान
उनकी पहली जरूरत बन गये है
लाचार तक पहुंचने के लिये
बन गयी उनकी पहली जरूरत
कई साहुकार बन गये मदद पाने के लिये लाचार
सेवक बने स्वामियों की मदद में
उनके खजाने लुट गये हैं।
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लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,‘‘भारतदीप’’,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior

http://dpkraj.blgospot.com

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