पैसा कभी ठंड तो कभी गर्मी पैदा करता है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन
आजकल भारत में बेमौसम क्रिकेट मैच के आयोजन हो रहे हैं। पहले जब भारत में कोई विदेशी क्रिकेट टीम आती थी तो उसके लिये सर्दी का मौसम तय हुआ करता था। उस काल में नवंबर से फरवरी तक ही टेस्ट मैचों का आयोजन होता था। भारतीय टीम भी तभी विदेशों में जाती थी जब वहां का मौसम इस खेल के अनुकूल होता था। जब से इस खेल ने फिल्म और टीवी की तरह मनोरंजक के साथ ही व्यवसायिक रूप लिया है तब से इसका कोई मौसम नहीं रहा।
कभी देश भक्ति का वास्ता देकर क्रिकेट प्रेमियों को आकर्षित किया गया था। अब शहरों की प्रतिष्ठा का विषय बनाया गया है। तय बात है कि बड़े शहरों के नाम पर बने इन क्लबों के बीच होने वाले व्यवसायिक मैचों को वैसह हार्दिक अभिनंदनीय मान्यता नहीं है जैसे दो देशों के बीच होने वाले मैचों को मिलती थी। एक सज्जन उस दिन कह रहे थे कि यह क्लबस्तरीय प्रतियोगिता होना देश का गौरव है। होगी भई, कौन इसका विरोध कर सकता है? फिर छोटे शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी इस पर अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां दे भी तो उसे सुनने वाला कौन है? क्लब स्तरीय इस प्रतियोगिता से खेल का क्या लेना देना है, यह आज तक समझ में नहंी आया। कुछ लोगों इसे खेल के विकास के लिये अत्यंत उपयुक्त बताया है। इस पर हंसी आती है। खेलों का विकास कैसे होता है यह आज तक समझ में नहीं आया। अगर अधिक से अधिक लोगों उसे खेलने लगें और उसे ही विकास कहा जाये तो भी बात जमती नहीं क्योंकि क्रिकेट खेलने वाले हमारे देश में बहुत सारे लोग हैं। वह सारे लोग क्रिकेट खेलते हैं जिन्हे मैदान और साथ मिल जाते हैं। अगर खिलाड़ियों को अधिक पैसा मिलना ही विकास है तो फिर प्रश्न आता है कि कितने खिलाड़ियों को यह पैसा मिल रहा है? पैसा कमाने वालों की संख्या हजार या डेढ़ हजार से ऊपर दिख नहीं सकती। जिस देश में करोड़ों बेरोजगार हों वहां यह संख्या विकास का स्वरूप नहीं दिखाती।
यह प्रतियोगिता शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये है। अगर अपने पास समय है। टीवी पर कोई ढंग का कार्यक्रम नहीं आ रहा हो तब अगर क्रिकेट का अभिनय करते क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना बुरा नहीं है। बीच बीच में विज्ञापनों का भी मनोंरजन आ ही जाता है। कुछ बिफरे हुए आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के साथ मनोरंजन के क्षेत्र जैसा व्यवहार होना चाहिये। यह उनका अपना नजरिया है पर एक बात तय है कि गर्मी के मौसम में इस खेल का आयोजन करना कोई सरल काम नहीं है। कहते हैं कि पैसा आदमी में गर्मी पैदा करता है पर जब इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन इस तर्क का जनक भी है कि यही पैसा ठंड का काम भी करता है।
टीवी की बात हो रही है तो आजकल दो कॉमेडी धारावाहिक आते हैं। दोनों का समय टकराता है। तब चैनल बदल बदल कर उनको देखना पड़ता है। हमेशा ही अपने साथ बोरियत का सामान लेकर चलने वाले लोगों के लिये कॉमेडी अच्छा विषय है। यह अलग बात है कि कॉमेडी प्रस्तुत करने वाले को भी कुछ विनोदप्रिय होना चाहिये। दोनों कॉमेडी धारावाहिक देखकर लगता नहीं है कि उनके साथ कोई लेखकीय न्याय हो रहा है। हमारे देश के धनपति साहित्य, कला, खेल, फिल्म और अन्य मनोरंजक व्यवसायों से पैसा तो कमाना चाहते हैं पर उसके लिये प्रतिभाओं की खोज उनके बूते का नहीं है। सच बात तो यह है कि पाश्चात्य व्यवसायी भी पैसा कमाते हैं पर उनकी अपने काम से प्रतिबद्धता होती है। कुछ नया करना उनका मौलिक स्वभाव है। उनकी यह प्रवृत्ति उनका प्रबंध कौशल बढ़ाती है। इसके विपरीत भारतीय व्यवसायी पैसा कमाते हैं पर उनकी काम से अधिक कमाई से प्रतिबद्धता रहती है। कुछ नया करने की बजाय वह उपलब्ध व्यवस्था और साधनों का ही उपयोग करते हैं। यही कारण है कि फिल्म और टीवी प्रसारणों में अंग्रेजी फिल्मों और धारावाहिकों की नकल दिखती है। खास बात यह कि भारत में लेखक को एक दोयम दर्जे का जीव माना जाता है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में हिन्दी मनोरंजक कार्यक्रम मुबंई में बनते जहां की मूल भाषा भले ही मराठी है पर हिन्दी एक तरह से खिचड़ी भाषा बन गयी है। यही कारण है कि मुंबईया फिल्म और धारावाहिकों की हिन्दी उत्तर भारत की मूल हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोनों कारणों से हिन्दी कार्यक्रम अमौलिक हो जाते हैं। बड़े बड़े दिग्गज हिन्दी लेखक हिन्दी फिल्मों में काम करने गये पर बेरंग वापस लौटे आये। इसका कारण यह कि मुंबई के थैलीशाह हिन्दी लेखक के मनोविज्ञान को नहीं समझते। स्थिति यह है कि इतने सारे हिन्दी धारावाहिक तथा फिल्मों के पुरस्कार वितरण समारोह होते हैं वहां उसे लिखने वाले को सम्मान मिलने वाली घटना सामने नहीं आती। सच बात तो कहें कि हमें लगता है कि इन फिल्मों और धारावाहिकों के कथा, पटकथा और संवाद लेखकों की हैसियत स्पॉट बॉय से अधिक नहीं होगी। यही कारण है कि भाषा की दृष्टि से हिन्दी कार्यक्रम स्तरीय नहीं होते। कल्पनाशक्ति का अभाव साफ दिखता है। यही कारण है कि कॉमेडी कार्यक्रमों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर हास्य का भाव पैदा किया जाता है।
पहले कहा जाता था कि हिन्दी गरीबों की भाषा है। यह अलग बात है कि ऐसा कहने वाले प्रसिद्धि भी हिन्दी में अधिक पाते रहे हैं। अब हिन्दी वालों के पास पैसा भी खूब है। यही कारण है कि अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रसारण हिन्दी में भी हो रहा है। यह भी एक तरह से अंग्रेजी व्यवसायियों की प्रबंध कुशलता का परिणाम है। जबकि भारतीय मनोरंजन व्यवसायी हिन्दी का खाकर उसे दुत्कारते भी हैं। हिन्दी लेखकों के प्रति असम्मान का भाव रखन उसकी भाषा को दुत्कारने जैसा ही है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior
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बाज़ार में बिकते सपनों के सौदे-विडियो पर चर्चा
सपनों का सौदा और बाज़ार-हिन्दी कविताhttp://youtu.be/xVyay7jtBqA
अध्यात्मिक विषय पर इंटरनेट पर निजी चर्चा पर वीडियो जारी करने का एकल प्रायोगिक प्रयास
काली दुनिया का खेल-हिंदी शायरी
पर्वत से निकली नदी
घर से चली नाली
नाले ने दोनों का संगम करा दिया,
पवित्र जल पीयें या नहायें
आंखें बंद कर श्रद्धा से फूल चढ़ायें,
धर्म की धरती पर अधर्म का घर भरा दिया।
कहें दीपक बापू
कचड़े में कांति नहीं होती,
अशांत मन लेकर चलें
कभी साथ शांति नहीं होती,
उठती हैं ख्वाहिशें
सुंदर नजारे देखने के लिये
आदमी मचल जाता है,
काली दुनियां हैं उनके पीछे
खबर नहीं लेता कोई
धर्म का सौदागर छल कर जाता है।
जल गया है जल
जहरीला हो गया फल
इसलिये जिस धरा पर बैठे हो
वहीं ध्यान कर
ज्ञान में स्नान कर
कर अपने पर विश्वास
कर दे अपने से दूर उस ख्वाब को
जिसने ज़माने को डरा दिया है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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प्रचार माध्यम अपने बलबूते पर देश में बदलाव नहीं ला सकते-हिन्दी लेख
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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कुछ फिक्सिंग कुछ मिक्सिंग–हिन्दी व्यंग्य चिंतन
फुटबाल में फिक्सिंग होती होगी इसका शक हमें पहले से ही था। इसका कारण यह है की हमारे देश में व्यसाय, खेल, फिल्म तथा अन्य क्षेत्रों में पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति घर कर चुकी है। ऐसे में हमारे देश के व्यवसाई और खिलाड़ी कोई ऐसा काम नहीं कर सकते जो पश्चिम वाले नहीं करें। पश्चिम वाले जो काम करें वह हमारे देश के लोग भी हर हाल में करेंगे यह भी निश्चित है। एक बात तय है कि सांसरिक विषयों में कोई मौलिक रूप के हमारे देश में अब होना संभव नहीं है। विश्व में हमारा देश आध्यात्मिक गुरु माना जाता है पर सांसरिक विषयों के मामले में तो पिछड़ा हुआ है। यह अलग बात है कि इन सांसरिक विषयों में भी हमारे अनेक प्राचीन सिद्धांत हैं जिनको अब लोग भूल चुके है । बात फुटबाल की हो रही है तो हम अपने क्रिकेट खेल को भी जोड़ लेते हैं। पूरी तरह व्यवसायिक हो चुके क्रिकेट खेल में फिक्सिग नहीं होती हो अब इस बात पर संदेह बहुत कम लोग को रह गया है। दूसरी बात यह कि मनोरंजन की दृष्टि से इस देखने वालों की संख्या अधिक है खेलने वाले बहुत कम दिखते हैं। फिर आजकल मनोरंजन के साधन इतने हो गये हैं कि क्रिकेट खेल के प्रतिबद्ध दर्शक अत्यंत कम रह गये हैं। अनेक विशेषज्ञ तो इस बात पर हैरान है कि भारत में चलने वाली क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आखिर किस तरह के आर्थिक स्त्रोत पर चल रही है? अभी कल ही इस खेल के खिलाड़ियों की नीलामी हुई। अनेक खिलाड़ियों की कीमत देखकर अनेक विशेषज्ञों के मुंह खुले रह गये। एक विदेशी खिलाड़ी ने तो अपनी कीमत पर खुद ही माना है कि वह उसके लिये कल्पनातीत या स्वपनातीत है। ।
फुटबॉल चूंकि भारत में अधिक नहीं खेला जाता इसलिये उसके मैचों में फिक्सिंग का अनुमान किसी को नहीं है पर देश जो खेलप्रेमी इन फुटबॉल मैचों को देखते हैं उनको अनेक बार ऐसा लगता है कि कुछ खिलाड़ी अनेक बार अपने स्तर से कम प्रदर्शन करते हैं या फिर कोई पूरी की पूरी टीम अप्रत्याशित रूप से हार जाती है। अभी कुछ समय पहले संपन्न फुटबॉल विश्व के दौरान अनेक मैच शुकशुबहे का कारण बने। क्रिकेट हो या फुटबॉल इन खेलों में अब जमकर पैसा बरस रहा है। यह पैसा खेल से कम उससे इतर गतिविधियों के कारण अधिक है। अनेक खिलाड़ियों को कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसेडर बना लेती है। भारत में तो अनेक खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिन्होंने बीसीसीआई की कथित राष्ट्रीय टीम का मुंह तक नहीं देखा पर करोड़पति हो गये हैं। अनेक खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग की वजह से प्रतिबंध लगाया गया है जो कि इस बात का पं्रमाण है कि फिक्सिंग होती है। यहां यह भी बता दें कि जिन खिलाड़ियों पर यह प्रतिबंध लगे वह प्रचार माध्यमों के ‘स्टिंग ऑपरेशन’ की वजह से लगे न कि बीसीसीआई की किसी संस्था की जांच में वह फंसे। इसका मतलब यह कि जिनका ‘स्टिंग ऑपरेशन’ नहीं हुआ उनके भी शुद्ध होने की पूरी गांरटी नहीं हो सकती। सीधी बात यह कि जो पकड़ा गया वह चोर है और जिस पर किसी की नज़र नहीं है वह साहुकार बना रह सकता है।
हमारा मानना है कि खेलों में फिक्सिंग अब रुक ही नहीं सकती। इसका कारण यह है कि एक नंबर और दो नंबर दोनों तरह के धनपति इसमें संयुक्त रूप से शामिल हो गये हैं। दोनों में एक तरह से मूक साझोदारी हो सकती है कि तुम भी कमाओ, हम भी कमायें। यह भी संभव है कि दो नंबर वाले एक नबर वालों का चेहरा आगे कर चलते हों और एक नंबर वाले भी अपनी सुरक्षा के लिये उनका साथ मंजूर करते हों। क्रिकेट से कहीं अधिक महंगा खेल फुटबॉल है। उसमें शक्ति भी अधिक खर्च होती है। दूसरी बात यह कि दुनियां में कोई भी व्यवसाय क्यों न हो कुछ सफेद और काले रंग के संयोजन से ही चलता है। अब चूंकि भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात तो कोई करता नहीं इसलिये हम अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शॉ के इसी सूत्र को दोहराते हैं कि इस दुनियां में कोई भी आदमी दो नंबर का काम किये बिना अमीर नहीं हो सकता। साथ ही यह भी जो सेठ साहुकार फुटबॉल या अन्य खेलों के खिलाड़ियों को पाल रहे हैं वह उनके खेल को अपने अनुसार प्रभावित न करते हों यह संभव नहीं है। इस तरह की फिक्सिंग के सबूत मिलना संभव नहीं है पर मैच देखकर परिणाम पूरी की पूरी कहानी बयान कर ही देता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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मरे इंसान का भूत-हिन्दी कविता
मरे इंसान का नाम लेने से भी
वह घबड़ाते हैं
डर है उसके साथ हमदर्दी करते हुए
ज़माना बह न जाये
जो कह न सके कीमती जिंदा लोग
उसका भूत वह बात न कह जाये
इसलिये अमुक नाम से बुलाते हैं।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के
प्रचार माध्यम भौंपू हैं
खड़े करते हैं दाम देकर मशहूर लोग,
समझ न हो पर भी बोलने का हो जिनको रोग,
कत्ल किया गया जिसका जिस्म
जलकर वह राख हो गया,
जिंदा कौड़ी का था
मरकर उसका दाम टके से लाख हो गया,
चलने लगे न उसके नाम का सिक्का
छिपाया इसलिये
अपने खोटे सिक्कों को पिटने से बचाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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भारतीय साहित्य में महाश्वेतधारा के स्वप्न-हिंदी लेख चिंत्तन
पश्चिम बंगाल की एक साहित्यकारा का यह तर्क हैरान करने वाला है कि नक्सलवाद फैलाने वालों को भी सपने देखने का हक है। हम यह तो मानते हैं कि सभी लोगों को सपने देखने का हक है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कानून तोड़ने या बंदूक से दूसरे को मारने पर भी वह बने रहने दिया जाये। एक बात तय रही कि बंदूक थामने वाला अपने विरोधी की बोलने की आजादी तो छोड़िये उसका जिंदा रहने का अधिकार भी नहीं स्वीकारता। ऐसे में उसके सपने देखने के हक की बात कोई सात्यिकार करने लगे तो समझिये उसे अपने लेखकीय अहंकार से उपजी आत्मुग्धता के भाव ने धर दबोचा है या अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव की अनुभूति ने कुंठित कर दिया है।
पश्चिम बंगाल में कुछ साहित्यकार हमारी दृष्टि से गजब के हुए हैं। इनमें शरत चंद्र और पूर्णिमा देवी के उपन्यास हमारे मन को भी बहुत भाये हैं। पूर्णिमा देवी का स्वर्णलता उपन्यास एक अत्यंत रोचक रचना है। एक बात निश्चित है कि पश्चिम बंगाल के लेखकों की प्रसिद्ध रचनायें बंगाल की सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। उनकी रोचकता इसलिये भी अधिक बढ़ जाती है क्योंकि वहां की कुछ परंपरायें संपूर्ण भारतीय समाज से मेल खाती है। यहां कुछ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि हम संपूर्ण भारतीय समाज में सांस्कारिक, भाषाई तथा धार्मिक पंरपराओं में विभिन्नता पाते हैं। सीधी बात कहें तो किसी भी एक क्षेत्रीय भाषा के साहित्य में संपूर्ण भारतीय समाज को नहीं जोड़ा जा सकता। कहा जाता था कि बंगाल जो आज सोचता है वह पूरा भारत कल सोचता है। यह बात तब कही जाती थी जब वहां जनवादी साहित्यकारों का गढ़ बन गया था। उनका यह आत्मविश्वास राज्य से निकटता के कारण बना। उन्हें लगने लगा कि एक दिन उनके विचारों की राज्य प्रबंधन व्यवस्था पूरा देश स्वीकार कर लेगा। इन जनवादी बुद्धिमानों का यह यकीन था कि वह एक दिन पूरे देश में लाल रंग फैला देंगे।
अध्यात्मिक ज्ञानियों की दृष्टि में उनका विचार हमेशा ही सामाजिक सरोकारों से परे रहा है। पश्चिम बंगाल में सत्ता और जनवादियों का संयुक्त वर्चस्व लंबे समय तक रहा पर वहां को समाज फिर भी देश के ढांचे पर ही चला। भारत में लोकतंत्र है इसलिये हमेशा ही किसी एक राज्य प्रबंधन विचाराधारा का लंबे समय तक चलना संभव नहीं है। यही बंगाल में हुआ जब जनवादियों की प्रिय प्रबंधन विचारधारा भी पराजित हुई। अब जनवादी बुद्धिमान बिना राज्य के सहयोग के मैदान संभाल रहे हैं और उनको इस बात का अफसोस है कि उनके पास आम भीड़ के पास अपनी बौद्धिक शक्ति का प्रमाण पेश करने का साधन नहीं है। राज्य का समर्थन, धन और प्रतिष्ठा यह तीनों न हो तो आम मनुष्य में अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने में कठिनाई होती है। जनवादियों के पास अब केवल अपनी विचार शक्ति ही बची है जिसके सहारे वह अपना अभियान चलाये हुए है।
उनकी विचार शक्ति हमेशा ही राज्य पद, पैसे और प्रतिष्ठा के इर्दगिर्द ही घूमती है। वह समाज में सभी को समान देखना चाहते हैं और अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये यह एक कभी पूरा न होने वाला सपना है। जनवादी समाज के हर विषय में राज्य का हस्तक्षेप चाहते हैं। उनका मानना है कि समाज में सभी बुद्धिमान नहीं है इसलिये उनके समानता लाने का काम राज्य को करना चाहिये। राज्य उनकी दृष्टि में एक श्वेत संस्था है। उसमें सक्रिय लोगों के अज्ञानी, भ्रष्ट और अकुशल होने की कोई संभावना नहीं है-यह अलग बात है जिस व्यवस्था के प्रबंधन से उनका मतभेद है उस पर इसी तरह के आरोप वह लगाते हैं। जनवादी बुद्धिमानों की यह राज्य के हमेशा पवित्र और श्वेत सोच उनको अयथार्थवादी बनाती है तो जो प्रबंधन उनकी विचाराधारा से अलग चलता है उसके प्रति आक्रोशित करता है। वह अपना आक्रोश अहिंसक तरीकेि से प्रचार माध्यमों में व्यक्त करते हैं पर उनके अनुयायी उससे आगे जाकर हिसक भी हो जाते हैं। यह हिंसक तत्व समाज में कोई बदलाव नहीं ला सकते पर उनके विचारों में अपना प्रतिबिंब देखकर यह बुद्धिमान प्रसन्न होते है।
देखा जाये तो साहित्यकारों में कुछ लिपिक तरह के भी होते हैं। वह समाज में घटित किसी घटना को जस का तस अपनी रचना बना लेते हैं। कुछ जोड़ते हैं कुछ घटाते हैं। उनकी रचनायें किसी समस्या को उबारती हैं पर निष्कर्ष नहीं प्रस्तुत करती। उनको इनाम भी मिलते हैं। इससे उनका मनोबल इतना बढ़ जाता है कि अपने विचार को वह इस कदर प्रमाणित मान लेते है कि उससे प्रथक चलने वाले शेष समाज को बुद्धिहीन घोषित कर देते हैं। उनके विचारों में दोहरापन है। एक तरफ वह समाज पर इसलिये राज्य का कठोर नियंत्रण देखना चाहते हैं कि सभी लोग बुद्धिमान नहीं है पर अपनी रचनाओं में निष्कर्ष प्रस्तुत न कर यह आशा करते हैं कि समाज स्वयं ही हल निकाले।
सच बात तो यह है कि ऊपर हमने लिखा था कि भारतीय समाज में सांसरिक, भाषाई तथा धार्मिक संस्कारों की दृष्टि से भिन्नता है पर अध्यात्मिक दृष्टि से पूरा समाज एक है। यही बात इस भिन्नता को खत्म कर देती है। भारतीय अध्यात्म में श्रीवृद्धि करने वाले सभी परम पुरुष सभी जगह पूजे जाते हैं। इसलिये भारतीय अध्यात्म विषय से परे होकर लिखने और सोचने वाले चाहे जितने भी अपने वैज्ञानिक विचारों को अंतिम सत्य माने पर उसे दूसरे लोग स्वीकार नहीं करते। भारतीय अध्यात्म में राज्य, परिवार और व्यक्ति के संचालन के जो वैज्ञानिक तरीके प्रतिपादित किये गये हैं उनकी तुलना किसी विदेशी विचारधारा से हो ही नहीं सकती। समाज में मनुष्य के बीच बुद्धि, धन, और ज्ञान के स्तर पर भेद रहेगा पर सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिये, यह बात हमारा ही अध्यात्म दर्शन कहता है। यह अलग बात है कि हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के साहित्य के कुछ महानुभाव यह श्वेत धारा भी प्रवाहित करते हैं कि सभी लोग समान हो जायें तो समाज की दृष्टि भी समान हो जायेगी।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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हैप्पी न्यू ईयर यानि नव वर्ष पर हिंदी व्यंग्य
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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मकर सक्रांति पर इलाहाबाद में महाकुंभ का प्रारंभ -हिंदी लेख और चिंत्तन
मकर सक्रांति पर इलाहाबाद में महाकुंभ प्रारंभ हो गया। यह बरसों पुरानी पंरपरा है और भारतीय संस्कृति का ऐक ऐसा हिस्सा है जिसे देखकर कोई भी विदेशी चमत्कृत हो सकता है। जहां तक भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रश्न है उसकी दृष्टि से इसे सकाम भक्ति का प्रतीक माना जा सकता है। गंगा में नहाने से पुण्य मिलता है यही सोचकर अनेक श्रद्धालु इसमें नहाते हैं। अनेक निष्काम श्रद्धालु भी हो सकते हैं जो मकर सक्रांति में गंगा में यह सोच नहाते हैं कि पुण्य मिले या नहंी हमें तो इसमें नहाना है। इससे उनको मानसिक शांति मिलती है। श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले ज्ञान साधक किसी भी प्रकार की भक्ति पद्धति का विरोध नहीं करते भले ही वह उनके हृदय के प्रतिकूल हो।
यह तय है कि इस संसार में दो प्रकृति के लोग-असुर और दैवीय-रहेंगे। चार प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-भी यहां देखे जा सकते हैं। उसी प्रकार त्रिगुणमयी माया -सात्विक, राजसी और तामसी-के वशीभूत होकर लोग यहां विचरण करेंगे। इसे परे कुछ योगी भी होंगे पर उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक होगी, यह भी अंतिम सत्य है। अंतर इतना रह जाता है कि ज्ञानी लोग मूल तत्वों को जानते है इसलिये सहअस्तित्व की भावना के साथ रहते हैं जबकि अज्ञानी अहंकारवश सभी को अपने जैसा दिखने के लिये प्रेरित करते हैं। जो कुंभ में नहाने गये वह श्रेष्ठ हैं पर जो नहीं करने गये वह बुरे हैं यह भी बात नहीं होना चाहिए।
जिन्कों भारतीय संस्कृति में दोष दिखते हैं उनके लिये यह कुंभ केवल एक पाखंड है। ऐसी दोषदृष्टि रखने वाले अज्ञानियों से विवाद करना व्यर्थ हैै। उन अज्ञानियों के अपने खोजे गये सांसरिक सत्य हैं पर अध्यात्मिक सिद्धि की समझ से उनका वास्ता कभी हो नहीं सकता क्योंकि उनके अहंकार इतना भरा है कि जैसे कि इस विश्व को बदलने की भारी श्ािक्त उनके पास है।
बहरहाल अब अपनी बात गंगा और इलाहाबाद के महाकुंभ पर भी कर लें। समाचार आया कि गंगा के प्रदूषित जल की वजह से नाराज चारों शंकराचार्य वहां नहीं आये। उनके न आने के बावजूद इस खबर की परवाह किये बिना श्रद्धालू लोग नहाने पहुंचें। शंकराचार्य आये या नहीं इसमें बहुत ही कम लोगों की दिलचस्पी दिखाई। यह उन लोगों के लिये बहुत निराशाजनक है जो हिन्दू धर्म को एक संगठित समूह में देखना चाहते हैं। दरअसल विदेशी धर्मो को जिस तरह एक संगठन का रूप दिया गया है उससे प्रेरित कुछ हिन्दू धार्मिक विद्वान चाहते हैं कि हमारा समूह भी ऐसा बने। यह हो नहीं पा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे धर्म के सांस्कृतिक भिन्नताये बहुत हैं। भौगोलिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार भोजन, रहन सहन और कार्य शैली में भिन्नतायें हैं। मुख्य बात यह कि अपने अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार मानते हैं कि सारे विश्व के लोग एक जैसे नहीं बन सकते। इसके विपरीत विदेशी धर्मों के प्रचारक यह दावा करते हैं कि वह एकदिन सारे संसार को अपनी धार्मिक छतरी के अंदर लाकर ही मानेंगे। इसके विपरीत हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि सभी मनुष्यों के साथ अन्व जीवों पर भी समान दृष्टि रखना चाहिये जबकि विदेशी धर्म प्रचारक यह दावा करते हैं कि हम तो सारे विश्व के लोगों को एक ही रंग में रंगेंगे ताकि उन पर सभी समान दृष्टि स्वतः पड़ेगी। हम उन पर आक्षेप नहीं करते पर सच्चाई यह है कि पश्चिमी में सदियों से चल रही धार्मिक वैमनस्य की भावना ने हमारे देश को भी घेर लिया है। भारत में कभी भी जातीय और धार्मिक संघर्ष का इतिहास नहीं मिलता जबकि विदेशों में धार्मिकता के आधार पर अनेक संघर्ष हो चुके हैं।
बहरहाल समस्त भारतीय धर्म व्यक्ति के आधार पर वैसे ही संगठित हैं उनको किसी औपचारिक संगठन की आवश्यकता नहीं है। अभी तो ढेर सारे प्रचार माध्यम हैं जब नहीं थे तब भी लाखों लोग इन कुंभों में पहुंचते थे। यह सब व्यक्ति आधारित संगठन का ही परिणाम है। हमारे जो बुद्धिमान लोग हिन्दू धर्म को असंगठित मानते हैं उन्हें यह समझना चाहिये कि विदेशी विचाराधारायें पद पर आधारित संगठनों के सहारे चलती हैं। चुने हुए लोग पदासीन होकर भगवत्रूप होने का दावा प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा वहां पहले राष्ट्र फिर समाज और अंत में व्यक्ति आता है जबकि हमारे यहां व्यक्ति पहले समाज और फिर राष्ट्र का क्रम आता है। हमारा राष्ट्र इसलिये मजबूत है क्योंकि व्यक्ति मजबूत है जबकि दूसरे राष्ट्रों के लड़खड़ाते ही उनके लोग भी कांपने लगते हैं। महाकुंभ में हर वर्ग, जाति, समाज, भाषा और क्षेत्र के लोग आते हैं। उनको किसी संगठन की आवश्यकता नहीं है।
चारों शंकराचार्य जिस गंगा के प्रदूषित होने पर दुःखी हैं वह कई बरसों से दूषित हो चुकी है। ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म प्रदर्शित हुए बरसों हो गये हैं। जब वह दूषित होना प्रारंभ हुई थी तब भी अखबारों में समाचार आने लगे थे। तब हिन्दू धर्म को सगठित रखने का दावा करने वाले यह शंकराचार्य कहां थे? उन्होंने उसे रोकने के लिये क्या प्रयास किया? क्या लोगों को प्रेरणा दी! देश की हर छोटी बड़ी घटना पर अपना चेहरा दिखाने के आदी अनेक धार्मिक पुरुष हो चुके हैं। इनमें कुछ शंकराचार्य भी हैं। गंगा के प्रदूषित होने के समाचार उन्होंने न देखे या न सुने हों यह संभव नहीं है। अब उनका दुःखी होना सामयिक रूप से प्रचार पाने के अलावा कोई अन्य प्रयास नहीं लगता।
दरअसल देखा यह गया है कि हमारे अनेक धार्मिक पुरुषों के यजमान अब ऐसे पूंजीपति भी हैं जो उद्योग चलाते हैं। गंगा में प्रदूषण उद्योगों के कारण फैला है। अगर इन शंकराचार्यों के साथ मिलकर अन्य धार्मिक शिखर पुरुष कोई अभियान छेड़ते तो यकीन मानिये उनको मिलने वाले दान पर बुरा प्रभाव पड़ सकता था। सच बात तो यह है कि हमारे धर्म का आधार तत्वज्ञान है और जो संगठन बने हैं उनका संचालन वह माया करती है जिस पर यह संसार आधारित है। धर्म रक्षा धन से ही संभव का सिद्धांत अपनाना बुरा नहीं है पर उसको वैसा परिणामूलक नहीं बनाया जा सकता जिसकी चाहत हमारे धार्मिक शिखर पुरुष करते है। वह तत्वज्ञान से ही संभव है पर उसमें रमने वाला आदमी फिर जिस आनंद के साथ जीता है उसे हम रैदास के इस कथन से जोड़ कर देखें ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ तो बात समझ में आ सकती है।
बहरहाल इलाहाबाद महाकुंभ में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को शुभकामनायें तथा मकर सक्रांति के पर्व पर सभी ब्लॉग मित्रों, पाठकों और प्रशंसकों को बधाई। हां, प्रशंसक भी जोड़ने पड़ेंगे क्योंकि अनेक लोग अक्सर लिखते हैं कि हम आपके लेखकीय रूप के प्रशंसक हैं। जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athor and editor-Deepak “Bharatdeep”,Gwalior
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नारी के विषय पर 23 माह पहले लिखा आज भी प्रासंगिक-हिंदी लेख
इस लेखक के इन्टरनेट पर लिखे गए लेखों में एक है कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख। 11 फ़रवरी 2011 को लिखे गए इस लेख पर आज तक भी टिप्पणियाँ आती हैं। इस पर कुछ टिप्पणीकारों ने यह भी लिखा कि आपकी बात हमारे समझ में नहीं आयी तो अनेक लोगों ने अपनी व्यथा कथा भी कही है। लिखने का अपना अपना तरीका होते है। जब किसी विषय पर गंभीरता से लिखते हुए कोई डूब जाये तो भाषा सौंदर्य दूर हो जाता है और अगर शब्दों की चिंता करें तो दिमाग सतह पर आ जाता है। हम जैसे हिंदी के गैर पेशेवर लेखकों के लिया यही मुश्किल है कि पाठक हमारे लेखों में भाषा सौन्दर्य न देखकर यह मान लेते हैं इनकी बात तो आम भाषा में लिखी गयी है इसलिए यह कोई मशहूर लेखक नहीं बन पाए। बाज़ार के सहारे मशहूर लेखकों को पढ़कर भी पाठक निराश होते हैं की उन्होंने कोई नयी बात नहीं कही। कन्या भ्रूण हत्या पर लिखे गए इस लेख में समाज की आंतरिक और बाह्य सत्यता का वर्णन किया गया था। इसके लिए किसी खास घटना पर आंसू नहीं बहाए गए थे। एक पेशेवर लेखक की तरह पाठकों का ध्यान सामयिक रूप से अपनी तरफ आकर्षित करने का यह कोई प्रयास नहीं था।
आज मन में आया कि भारतीय नारियों के प्रति अपराध पर कुछ नया लिखा जाए पर पता चला की पाठकों की नज़र आज भी इस पर पड़ी हुई है तब लगा कि इसे पुन: प्रस्तुत किया जाए। पूरे लेख को हमें पढ़ा तो लगा कि यह अब भी प्रासंगिक है। 11 फरवरी 2011 तथा 29 दिसंबर 2012 में करीब 23 महीने का अंतर है। नारियों के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए अनेक कारण है। दरअसल कुछ ऐसे भी हैं जो सभीके सामने हैं, लोग जानते हैं, मानते भी हैं मगर बाहरी रूप से कोई स्वीकार नहीं करना चाहता है। पुरुष ही नहीं नारियां भी शुतुर्मुर्गीय अंदाज़ में बहस कर रहे हैं। अभी हाल ही में दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना हुई। इस पर इतने प्रदर्शन हुए। अख़बारों में सम्पाकीय छपे। टीवी चैनलों पर बहसें हुई। सब कुछ प्रायोजित लगा। हमें लगा कि 11 फरवरी 2011 को लिखा गया यह लेख अभी भी सीना तनकर खड़ा है और पेशेवर लेखकों को ललकार रहा हो ऐसा बोलकर और लिखकर दिखाओ। जिन्होंने बहस की उन्होंने कुछ न कुछ पाया होगा। चैनलों ने पांच मिनट की बहस की तो पच्चीस मिनट का विज्ञापन चलाया। मगर सच कोई नहीं बोला। वैसे तो .धनपतियों के हाथ में पूरी दुनिया है पर समाज उनके हाथ में पूरी तरह नहीं रहा था। उनके सहारे चल रहे प्रचार माध्यमों ने यह काम भी कर दिखाया। उदारीकरण के चलते सार्वजानिक क्षेत्र कम हुआ है। सीधी बात कहें तो समाज की राज्य से अधिक निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ गयी है। मान सम्मान की रक्षा, सुरक्षित सेवाओं का प्रबंध तथा प्रजा हित को सर्वोपरि मानते हुए अपना काम जितना राज्य कर सकता है, निजी क्षेत्र के लिए यह संभव नहीं है। राज्य के लिए अपने लोग महत्वपूर्ण होते हैं निजी क्षेत्र के लिए अपनी कमाई सर्वोपरि होती है।
इससे भी अधिक बात यह है की राज्य का जिम्मा अपने प्रजा को संभालना भी होता है और निजी क्षेत्र कभी इसे महत्व नहीं देता। निजी क्षेत्र कभी राज्य का प्रतीक नहीं हो सकते। जब निजी क्षेत्र अपने साथ राज्य के प्रतीक के रूप में अपनी ताकत दिखाते हैं तो कुछ ऐसी समस्याएँ उठ सकती हैं जिनकी कल्पना कुछ लोगों ने की भी होगी। इस पर किसी ने प्रकाश नहीं डाला। इसी अपेक्षा भी नहीं थी। कारण की बाज़ार के सौदागरों और प्रचार प्रबंधकों का या सिद्धान्त है की बहसें खूब हों पर इतनी कि लोग बुद्धिमान न हो जाएँ। इसलिए नारे लगाने तथा रुदन करने वाले बुद्धिजीवियों को आमंत्रित करते हैं। इनमें कुछ एक हद तक व्यवस्था तो कुछ समाज की आलोचना करने की खानापूरी करते हैं। इस विषय पर बहुत कुछ लिखने का मन है पर क्या करें अपने पास समय की सीमायें हैं। पेशेवर बुद्धिजीवियों के मुकाबले हम जैसे आम लेखकों को समाज अधिक महत्व भी नहीं देता। इसलिए जब समाज मिलता है अपनी बात कह जाते हैं।
पहले लिखा गया लेख पढना चाहें तो पढ़ सकते हैं।
हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं।
इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।
हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak raj kukreja “Bharatdeep”
Gwalior,madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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नारे और ज़माना-हिंदी कविता
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
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