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भारतीय योग संस्थान के प्रांतीय शिविरों में सीखने का मौका मिलता है-विशिष्ट हिन्दी रविवारीय लेख

     जब कभी भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविरों में जाने का अवसर मिलता है तब हमें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि वहां विद्वानों के विचार सुनकर कुछ न कुछ नया विचार मिलता है। दरअसल अगर यह कहें कि कोई नया विचार मिलता है तो स्वयं को अजीब लगता है क्योंकि उनके विचार हमारे दिमाग मेंकहीं न कहीं  हमेशा रहते हैं।  बस, उनको सार्वजनिक रूप से कहने का अवसर नहीं मिलता या हम उनहें  ढूंढते नहीं है।  अपने ब्लॉग पर अक्सर हमने भारतीय योग विद्या के बारे में लिखा है।  उसके लाभों की चर्चा करते हुए हमने अनेक पाठ लिखे हैं।  इन शिविरों में जाने पर हर विचार हमें नया लगता ही है चाहे भले ही वह कभी हमारे अंतर्मन में स्थित होकर विचरता रहा हो।  एक तरह से कहें तो मस्तिष्क में चल रहा विचार जब पुष्ट होता है तो वह नवीन हो जाता है। दूसरी बात यह भी है कि  शब्दों तथा उनको व्यक्त करने की शैली भी उसे नया बना देती है।

 yog sadhana
भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविर का दृश्य

          आज हमें अपने ही ग्वालियर शहर के भारतीय योग संस्थान के  दो दिवसीय शिविर में जाने का अवसर मिला।  हम उसमें नियमित रूप से तो शामिल होने में असमर्थ थे पर अपने शिविर के बाहरी साधकों से मिलकर उनको जानने की जिज्ञासा हमें कुछ देर के लिये वहां ले ही गयी।  ऐसे अवसरों पर स्वयं मौन रहकर बहुत सीखा जा सकता है।  सबसे पहले तो उन निष्काम प्रवृत्ति के विद्वानों की सराहना करने का मन करता है जो अपने अनुभव तथा विचार वहां व्यक्त कर रहे थे।  उनके विचार सुनने के साथ ही हम उनके हाव भाव के साथ ही शब्दों पर भी अपना ध्यान रखे हुए थे। 

         आमतौर से पेशेवर धार्मिक तथा योग शिक्षक कामना भाव के कारण पारंगत होकर श्रोताओं को प्रभावित करते हैं पर निष्काम भाव से भी लोगों को प्रभावित किया जा सकता है, यह बात भारतीय योग संस्थान को देखकर सीखी जा सकती है।  भारतीय योग विज्ञान का प्रचार करने की शपथ लेने वाले इन विद्वानों के चेहरे पर तेज टपकता है तो वाणी से निकले शब्द योगरस में नहाये लगते हैं।  वहां मौजूद योग साधकों पर भी दृष्टिपात किया।  भारतीय योग संस्थान में निष्कामी विद्वानों और हमारे बीच तब थोड़ा मार्ग अलग हो जाता है जब हम अपनी गीता ज्ञान की दृष्टि जमाकर विचार करते हैं।  हमारे हिसाब से योगी भी भक्त है जिनके भक्तों की तरह चार प्रकार  होते हैं-ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा आर्ती।  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हजारों में कोई एक मुझे भजेगा और उन हजारों में भी कोई मुझे एक पायेगा। फिर वह कहते हैं कि ज्ञानी मेरा ही रूप है और वही मुझे पाता है।  वहां एक विद्वान ने यह भी माना कि हमारा काम है लोगों को बताना। सभी अमल नहीं करेंगे पर कुछ तो उसका असर होगा। 

       वहां लोगों को दो घंटे का मौन रखकर तप करने के लिये कहा गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हम तो देरी से पहुंचे थे। वहां लोगों से बात की पर उनके मौन तप के भंग में हमारा कोई योगदान नहीं है क्योंकि वह सभी तो पहले से वार्तालाप में लगे हुए थे। संभव है कुछ लोगों को वह शिविर बोर करने वाला लगे पर इतना तय है कि जिनके मन में योग को लेकर जिज्ञासायें वहां उनके निराकरण के पूरे अवसर हैं।

   अगर योग साधक की अपनी श्रेणी की बात करें तो हम अभी तक स्वयं को अर्थाथी श्रेणी का मानते हैं।  जहां तक प्रचारक के रूप में माने तो वह भी इसी श्रेणी में आता है। इस पर लिखने से हमारे मन की भूख शंात होती है।  यह हम अपने बारे में स्वयं मानते हैं इसका श्रेय श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन को जाता है जिसके प्रति हमारा निष्काम भाव है।  इन शिविरों में जिज्ञासु बनकर जाते हैं। योग साधना की शरण हमने आर्त भाव से ली थी।  जहां तक ज्ञानी का प्रश्न है उसका निर्णय तो हमारे जीवनकाल में तो होना ही नहीं है इसलिये चिंता छोड़ दी है।

         एक महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलती है कि हम जिन विद्वानों को सुनते हैं ऐसा लगता है कि वह हमारे मन की बात कह रहे हैं।  अच्छा लगता इसलिये क्योंकि वह वही बात कह रहे हैं जो हम सुनना चाहते है।  ऐसे में वक्ता और श्रोता का अंतर हमारे अंदर नहीं रहता।  ऐसा लगता है कि हम अपने से ही बात कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी लगती है कि निरंतर योग साधना करने वाले अगर किसी दूसरे की बात न भी सुने तो भी उनके अंदर वैसे ही विचार योग साधना करते हुए स्वतः  एक जैस  हो जायेंगे जो अन्य विद्वानों के हैं।  कोई भी  व्यक्ति नियमित योगाभ्यास से क्षेत्रज्ञ बन जाता है।  वह न केवल अपनी देह बल्कि प्रकृति और अंतरिक्ष की संरचना को भी समझ सकता है।  इसलिये नियमित योग साधकों और शिक्षकों के विचार एक ही मार्ग पर आ जाते हैं। 

      हमने अनेक बार लिखा है कि योग तो हर मनुष्य करता है।  अंतर इतना है कि आम मनुष्य चंचल मन, मुख और मस्तिष्क को इंद्रियों के वश में रखकर असहज योग के मार्ग पर चलता है जबकि योग साधक सहज योग की तरफ जाते हैं।  असहज योग के अनेक मार्ग है पर सहज योग का मार्ग एक ही है। कोई आगे चलते हुए किसी पड़ाव पर आया और उसने उस उस स्थान ं का ज्ञान प्राप्त किया। दूसरा पीछे है और जब वह उसी पड़ाव पर आयेगा तो वह भी वैसा ही ज्ञान प्राप्त करता है।  एक ही मार्ग होने के कारण  सहज योगियों के विचारों में साम्यता होती है जबकि असहज योगी अनेक मार्गों के कारण हमेशा ही संशय में पड़े होते हैं।  असहज योगी को पता ही नहीं कि उसकी देह के विकारों का जनक कौन है? इसके लिये वह अनेक तरह के परीक्षण करता फिरता है।  असहज योगियों के बीच बीमारियों की दवाओं और चिकित्सकों के ही चर्चे होते हैं। जबकि सहज योग प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग जानते हैं इसलिये पहले तो विकार पैदा होने ही नहीं देते और हो भी जायें तो उनको निकालना भी जानते हैं।

        आखिर में हमें  यह कहना है कि  कि एक विद्वान ने कहा कि हमें योग संस्थान के प्रचार करना चाहिये। भारतीय योग संस्थान की प्रशिक्षण शैली ऐसी है कि किसी साधक को योग साधन करते  देखकर ही पता चल जाता है कि उसने वहीं से सब सीखा है।  सभी को यह बताना चाहिये कि भारतीय योग संस्थान ही इस विषय में सबसे श्रेष्ठ संगठन है।  हमें यह सुनकर हैरानी हुई क्योंकि यह बात तो हमने अनेक पाठों में पहले ही लिखी है।  यही इस बात का प्रमाण है कि सहज योगियों के आपस में बिना मिले भी एक जैसे विचार हो जाते हैं।     

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior

http://zeedipak.blogspot.com

देश की मनोदशा पर विचार करना जरूरी-हिंदी लेख

        न्यायविदों, सामाजिक चिंत्तकों और सेवकों के लिये छोटी आयु की बच्चियों के साथ कुकर्म की बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंता का विषय है।  अपराधियों का पकड़ा जाना अच्छी बात है पर ऐसे अप्राकृतिक कर्म की बढ़ती निरंतरता इसे महत्वहीन बना देती है। यही कारण है कि जब सुरक्षा करने वाली संस्थायें  यह कहती है कि वह ऐसे अपराधों को रोक नहीं सकती तो न्यायविदों का उससे यह कहना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह इतना तो पता लगाये कि ऐसा क्यों हो रहा है।  न्यायविदों का यह पूछना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या लोग पागल हो रहे हैं?
        आर्थिक विकास था भौतिक उत्थान की अंधी दौड़ प्रारंभ हुए पंद्रह वर्ष हो गये हैं।  आर्थिक उदारीकरण के चलते विश्व के सभी देशों में एक समान रूप वाली उपभोग संस्कृति विकसित हो रही है।  यह संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के साथ ही मूल मानवीय संस्कारों का विलोपन करने वाली है।  बच्चियों के साथ अप्राकृतिक रूप से अनाचार तथा कुंठावश आत्महत्याओं की घटनायें संस्काहीनता के कारण ही बढ़ रही हैं।
      इसी कारण देश की आर्थिक विकास दर का प्रश्न अब गौण होता जा रहा है। पिछले अनेक वर्षों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते आ रहे हैं कि देश में दैहिक विकारों के साथ ही लोगों की बिगडती जा रही है़।  समाज में दैहिक रोगियों के साथ ही मानसिक विकारवान लोगों का संख्या भी बढ़ी है। हमारे देश में  आमतौर से मनोरोगी केवल विक्षिप्त व्यक्ति को ही  माना जाता है। जिसे कुछ भी भान न हो वही पागल केवल मनोचिकित्सा योग्य है, यह सोच आज भी बनी हुई है।  आधुनिक मनोविज्ञान की जानकारी आम लोगों को नहीं है।  उनको यह पता नहीं कि अस्थाई रूप से पागलपन के शिकार अनेक लोग हो रहे है।  कब किसका मस्तिष्क पर से नियंत्रण समाप्त हो सकता है इसका अंदाज किसी को नहीं है।  एक पत्रिका मे छपे एक लेख में हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों के आंकड़े पांच से छह वर्ष पूर्व पढ़े थे।  उसमें देश में मधुमेह से चालीस, उच्चरक्तचाप, से पचास तथा हृदय रोगों से पैतीस  प्रतिशत लोगों के पीड़ित होने की बात कही गयी थी।  उसमें मनोरोगियों की संख्या भी तीस प्रतिशत बताई गयी थी।  उसमें महत्वपूर्ण बात यह कही गयी थी कि समस्या यह  भी है कि अनेक रोगियों को अपने रोग के बारे में पता ही नहीं है।
           हम पिछले अनेक वर्षों से देख  रहे हैं कि मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोगों के परीक्षण के लिये निशुल्क शिविर लगते हैं-क्योंकि इससे चिकित्सकों को अपने मरीज ढूंढने का अवसर मिलता है- पर मनोरोगों के लिये कभी ऐसा कार्यक्रम नहीं होता। इसका कारण यह है कि यह माना जाता है कि मनोरोगी होना केवल पागल होना ही है।  यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति मनोरोगों की जांच के लिये तैयार नहीं होगा।  लोग इस खौफ के साये में नहीं जीना चाहेगे कि किसी को उनके मनोरोगी होने का पता लगे। मनोचिकित्सा का कोई बड़ा बाज़ार भी इसी कारण नहीं बन पाया है क्योंकि सभी लोगों को यह लगता है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।   मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोग की जांच करने के पश्चात् कोई भी आदमी इलाज के लिये तैयार हो जाता है पर मनोरोगी होने की बात कोई भी आदमी बदनामी के भय से  स्वीकार नहीं करना चाहेगा।
       देश में मनोरोगों के बढ़ने की बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार भी करते हैं पर इसके निवारण का कोई बड़ा प्रयास हो भी नहीं रहा।  योग साधन का ज्ञान देने वाले अनेक आचार्य  अपने प्रचार में दैहिक स्वास्थ्य की बात तो करते हैं पर मानसिक रोगों से निजात पाने की बात कहने में उनकी हिचक साफ देखी जा सकती हैं।  उन्हें अपने सामने उपस्थित लोगों के सामने मनोरोगों के निवारण की बात कहते हुए शायद संकोच इसलिये होता है कि कहीं लोग उनसे नाराज न हो जायें।  हालांकि हम यह लेख योग साधना के प्रचार के लिये नहीं लिख रहे। साथ ही यह भी बता दें कि योग साधना से ही कोई ज्ञानी या मानसिक रूप से परिपक्व हो जाये यह जरूरी नहीं है।  हम जिन मनोरोगों की बात कर रहे हैं वह आधुनिक भौतिक साधनों के उपयोग से ही बढ़े है। खासतौर से कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग ने लोगों की दिमागी स्थिति को बिगाड़ दिया है।  कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग के खतरे पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञ पहले ही बता चुके हैं।  कंप्यूटर जहां शहरी सभ्यता तक सीमित है वहीं मोबाइल फोन का जाल तो गांवों तक भी फैल चुका है। कंप्यूटर जहां सीमित रूप से शिक्षित तथा धनी लोगों में अपनी बीमारी फैला रहा है,  तो मोबाइल हर वर्ग में मनोविकार पैदा कर रहा है। इस पर विश्लेषण करना जरूरी है।  मोबाइल के बारे में स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह चुके हैं कि उसकी गर्मी मनुष्य के मस्तिष्क को विकृत तक कर सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि  देश में लोगों की मनोदशाओं का भी अध्ययन करना अब आवश्यक है। अप्राकृतिक रूप से किये जा रहे अपराधों से निपटने के लिये यह आवश्यक है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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हैप्पी न्यू ईयर यानि नव वर्ष पर हिंदी व्यंग्य

               वर्ष 2013 आ गया। अनेक लोगों का कहना है की हम भारतीयों   को यह अंग्रेजी वर्ष नहीं मनाना   चाहिए।   खासतौर से यह बात हिन्दू धर्म को कट्टरता से मानने का दावा करने  वालों  की तरफ से कही  जाती है।  मगर इन लोगों का कोई प्रभाव नहीं होता।  आखिर क्यों?  सच बात तो यह है  कि अनेक लोगों की तरह हम भारतीय अध्यात्मवादी लोग  भी उनकी बात को महत्व देते रहे हैं ।  अब लगने लगा है कि  वेलेन्टाईन डे, क्रिस्मस  और न्यू ईयर जैसे अंग्रेजी पर्व भी अब भारतीय समाज का ऐसा हिस्सा बन  गए हैं, जिन्हें अलग करना अब संभव नहीं है।  दरअसल जिन लोगों ने इन पर्वों को हमेशा ही वक्र दृष्टि से देखते हुए अपने धर्म पर दृढ़ रहने का मत व्यक्त किया है वह सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।  उन्होंने धार्मिक रूप से कभी अपने देश का अध्ययन नहीं किया।  हालांकि यह लोग अं्रग्रेजी शैली के समर्थक हैं पर वैसा सोच नहीं है।
         कम से कम एक बात माननी पड़ेगी कि अंग्रेजों ने हमारे समाज को जितना समझा उतने अपने ही लोग नहीं समझ पाये।  इन्हीं अंग्रेजों के अखबार ने एक मजेदार बात कही जो यकीनन हम जैसे चिंतकों के लिये रुचिकर थी।  अखबार ने  कहा कि भारत के धर्म पर आधारित संगठन और उनके शिखर पुरुष अपने भक्तों को वैसे ही अपने साथ जोड़े रखते हैं जैसे कि व्यवसायिक कंपनियां। वह अपने संगठन कंपनियों की तरह चलाते हैं कि उनके भक्त समूह बने रहें।
         हमने उनके नजरिये को सहज भाव से लिया।  हम यह तो पहले से मानते थे कि भारत में धर्म के नाम पर व्यापार होता है पर इससे आगे कभी विचार नहंी किया था।  जब यह नजरिया सामने आया तो फिर हमने उसी के आधार पर इधर उधर नजर दौड़ाई।  तब भारतीय धार्मिक संगठनों में वाकई यह गजब की व्यवसायिक प्रवृत्ति दिखाई दी।  जिस तरह देशी विदेशी कंपनियां अपने उत्पादों के विक्रय करने के लिये नयी पीढ़ी को  विज्ञापनों के  माध्यम से आकर्षित करने के अनेक तरह के उपक्रम करती हैं वैसे ही भारतीय धार्मिक संगठन और उनके शिखर पुरुष भी यही प्रयास करते हैं।  भले ही बड़े व्यवसायिक समूहों ने प्रचार माध्यमों से युवा पीढ़ी में  वेलेन्टाईन डे, क्रिस्मस  और न्यू ईयर जैसे अंग्रेजी पर्व अपने लाभ के लिये प्रचलित करने में योगदान दिया है पर भारतीय धार्मिक संगठन और उनके शिखर पुरुष भी इन्हीं पर्वों का उपयोग अपने भक्त समूह को बनाये रखने के लिये कर रहे हैं।  यही आकर इन्हीं पर्वों के विरोधी सामाजिक संगठन तथा कार्यकताओं के लिये ऐसी मुश्किल खड़ी होती है जिसे पार पाना संभव नहीं है।  अनेक मंदिरों में नर्ववर्ष पर विशेष भीड़ देखी जा सकती है।  इतना ही नही मंदिरों में  खास सज्जा भी देखी जा सकती है।  हम जैसे नियमित भक्त तो दिनों के हिसाब से मंदिरों में जाते रहते हैं-जैसे कि सोमवार को शंकर जी तो शनिवार को नवग्रह और मंगलवार को हनुमान जी-अगर कोई खास सज्जा न भी हो तो भी भक्तों को इसकी परवाह नहीं है।  परवाह तो किसी भक्त को नहीं है पर जो लोग इन मंदिरों के सेवक या स्वामी है उन्हें लगता है कि कुछ नया करते रहें ताकि युवा पीढ़ी उनकी तरफ आकर्षित रहे।  वह समाज में कोई नया भाव पैदा करने की बजाय उसमें मौजूद भाव का ही उपयोग करना चाहते हैं।   इतना ही नही इन मंदिरों में जाने पर केाई परिचित अगर बोले कि हैप्पी न्यू इयर तो भला भगवान की दरबार में हाजिरी का निर्मल भाव लेकर गया कौन भक्त अपने अंदर कटुता का भाव लाना चाहेगा।  इतना ही नहीं कुछ संगठित पंथ तो क्रिसमस, वेलेन्टाईन डे और नववर्ष पर अपने शिखर  पुरुषों को इन पर्वों के अवसर पर खास उपदेश भी दिलवाते हैं।
         हम जैसे अध्यात्मिक व्यक्तियों की दिलचस्पी उन विवादों में नहीं होती जिनके आधार कमजोर हों।  जो सामाजिक कार्यकर्ता इन पर्वों को मनाये जाने का विरोध करते हैं वह अपने जीवन में उस पर अमल कर पाते हों यह संदेहपूर्ण है।  जब कोई समाज से जुड़ा है तो वह अपने बैरी नहंी बना सकता।  मान लीजिये हम नहीं मानते पर अगर कोई कह दे कि हैप्पी क्रिसमस, हैप्पी न्यू ईयर या हैप्पी वेलेन्टाईन डे तो क्या उसे लड़ने लगेंगे।  एक बात निश्चित है कि भारत में धर्म के विषय पर आज भी धार्मिक साधु, संतों और प्रवचको की बात अंतिम मानी जाती है।  सामाजिक कार्यकताओं को  इन पर्वो के विरोधी  अभियान के प्रति उनका समर्थन उस व्यापक आधार पर नहीं मिल पता यही कारण है कि इसमें सफलता नहीं मिलती।  हालांकि कुछ साधु, संत और प्रवचक इन सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात का समर्थन करते हैं पर वह इतना व्यापक नहीं है।  चूंकि भारतीय धार्मिक संगठन और शिखर पुरुष भी  एक कंपनी की तरह अपने भक्त बनाये रखने की बाध्यता को स्वीकार करते हैं इसलिये वह उनके  तत्वज्ञान धारण करने की बजाय व्यवसायिक योजनाओं में जुटे रहते हैं।  हमारा मानना है कि केवल तत्वज्ञान के आधार पर हमेशा अपने पास भीड़ बनाये रखना कठिन है  और धार्मिक संगठन तथा उनके शिखर पुरुषों में यही बात आत्मविश्वास कम कर देती है।  यह आत्मविश्वास तब   ऋणात्मक स्तर पर पहुंच जाता है जब तत्वज्ञान को धारण करने से ऐसे पंथ या संगठनों के शिखर पुरुष स्वयं ही दूर होते हैं।  अपना नाम और धन जुटाने के चक्कर मे वह सब ऐसे प्रयास करते हैं जैसा कंपनियां करती है।  यही कारण है कि अंग्रेजी पर्व फिलहाल तो समाज में मनाये ही जा रहे हैं क्योंकि कहीं न कहीं धार्मिक तत्व उन्हें समर्थन दे रहे हैं।
          हमारे एक करीबी  मित्र ने सुबह मिलते ही कहा-’’हैप्पी न्यू ईयर!’’
          वह सब जानता था इसलिये हमने उससे कहा कि ‘‘हमारा नया वर्ष तो मार्च में आयेगा।’’
             वह बोला-‘‘यार, तुम कैसे अध्यात्मिकवादी हो।  कम से कम कुछ उदारता दिखाते हुए बोले ही देते कि ‘‘हैप्पी न्यू ईयर’’
    इससे पहले कि हम कुछ बोलते। एक अन्य परिचित आ गये। वह भी अपना हाथ मिलाने के लिये आगे बढ़ाते हुए बोले-‘‘नव वर्ष मंगलमय हो।’
     हमने हाथ बढ़ाते हुए उनसे कहा‘‘आपको भी नववर्ष की बधाई।’
     वह चले तो हमारे मित्र ने हमसे कहा‘‘उसके सामने तुमने अपना अध्यात्मिक ज्ञान क्यों नहीं बघारा।’’
       हमने अपने मित्र से कहा‘‘अपना अध्यात्मिक ज्ञान बघारने के लिये तुम्हीं बहुत हो।  अगर  इसी तरह हर मिलने वाले से नववर्ष पर बधाई मिलने पर ज्ञान बघारने लगे तो शाम तक घर नहीं पहुंचने वाले।’’
          एक धार्मिक शिखर पुरुष ने वेलेन्टाईन डे को मातृपितृ दिवस मनाने का आह्वान किया था।  अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओ को अच्छी लगी पर अनेक लोगों ने यह सवाल किया कि अगर वेलेन्टाईन डे को समाज से बहिष्कृत करना है तो फिर उसका नाम भी क्यों लिया जाये?  तय बात है कि दिन तो वह होना चाहिये पर हमारे हिसाब से मने।  यह बात तो ऐसे ही हो गयी कि मन में लिये कुछ ढूंढ रहा आदमी किसी व्यवसायिक कंपनी के पास न जाकर हमारी धार्मिक कंपनी की तरफ आये।
        हम जैसे योग साधकों और गीता पाठकों को लगता है कि  ऐसे विवाद किसी समाज की दिशा तय नहीं करते।  फिर यह अपने अध्यात्मिक ज्ञान  और सांसरिक विषयों दक्षता के अभाव के कारण आत्मविश्वास की कमी को दर्शान वाला भी है।  चाणक्य, विदुर, कौटिल्य और भर्तुहरि  जैसे महान दर्शनिकों ने हमारे अध्यात्मिक भंडार  ऐसा सृजन किया जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान दोनों है।   तुलसी, सूर, रहीम और मीरा जैसे महानुभावों ने ऐसी रचनायें दी जिसके सामने  दूसरे देशों का साहित्य असहाय नज़र आता है। यह आत्मविश्वास जिसमें होगा वह अंग्रेजी पर्वो के इस प्रभाव से कभी परेशान नहीं होगा।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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मकर सक्रांति पर इलाहाबाद में महाकुंभ का प्रारंभ -हिंदी लेख और चिंत्तन

         मकर सक्रांति पर इलाहाबाद में महाकुंभ प्रारंभ हो गया।  यह बरसों पुरानी पंरपरा है और भारतीय संस्कृति का ऐक ऐसा हिस्सा है जिसे देखकर कोई  भी विदेशी चमत्कृत हो सकता है।  जहां तक भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रश्न है उसकी दृष्टि से इसे सकाम भक्ति का प्रतीक माना जा सकता है। गंगा में नहाने से पुण्य मिलता है यही सोचकर अनेक श्रद्धालु इसमें नहाते हैं।  अनेक निष्काम श्रद्धालु भी हो सकते हैं जो मकर सक्रांति में गंगा में यह सोच नहाते हैं कि पुण्य मिले या नहंी हमें तो इसमें नहाना है।  इससे उनको मानसिक शांति मिलती है।  श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले ज्ञान साधक किसी भी प्रकार की भक्ति पद्धति का विरोध नहीं करते भले ही वह उनके हृदय के प्रतिकूल हो।

     यह तय है कि इस संसार में दो प्रकृति के लोग-असुर और दैवीय-रहेंगे।  चार प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-भी यहां देखे जा सकते हैं।  उसी प्रकार त्रिगुणमयी माया -सात्विक, राजसी और तामसी-के वशीभूत होकर लोग यहां विचरण करेंगे। इसे परे कुछ योगी भी होंगे पर उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक होगी, यह भी  अंतिम सत्य है।  अंतर इतना रह जाता है कि ज्ञानी लोग मूल तत्वों को जानते है इसलिये सहअस्तित्व की भावना के साथ रहते हैं जबकि अज्ञानी अहंकारवश सभी को अपने जैसा दिखने के लिये प्रेरित करते हैं।  जो कुंभ में नहाने गये वह श्रेष्ठ हैं पर जो नहीं करने गये वह बुरे हैं यह भी बात नहीं होना चाहिए।

            जिन्कों भारतीय संस्कृति में दोष दिखते हैं उनके लिये यह कुंभ केवल एक पाखंड है।  ऐसी दोषदृष्टि रखने वाले अज्ञानियों से विवाद करना व्यर्थ हैै।  उन अज्ञानियों के अपने खोजे गये सांसरिक सत्य हैं पर अध्यात्मिक सिद्धि की समझ से उनका वास्ता कभी हो नहीं सकता क्योंकि उनके अहंकार इतना भरा है कि जैसे कि इस विश्व को बदलने की भारी श्ािक्त उनके पास है।

        बहरहाल अब अपनी बात गंगा और इलाहाबाद के महाकुंभ पर भी कर लें।  समाचार आया कि गंगा के प्रदूषित जल की वजह से नाराज चारों शंकराचार्य वहां नहीं आये।  उनके न आने के बावजूद इस खबर की परवाह किये बिना श्रद्धालू लोग नहाने पहुंचें।  शंकराचार्य आये या नहीं इसमें बहुत ही कम लोगों की दिलचस्पी  दिखाई।  यह उन लोगों के लिये बहुत निराशाजनक है जो हिन्दू धर्म को एक संगठित समूह में देखना चाहते हैं।  दरअसल विदेशी धर्मो को जिस तरह एक संगठन का रूप दिया गया है उससे प्रेरित कुछ हिन्दू धार्मिक विद्वान चाहते हैं कि हमारा समूह भी ऐसा बने।  यह हो नहीं पा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे धर्म के सांस्कृतिक भिन्नताये बहुत हैं।  भौगोलिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार भोजन, रहन सहन और कार्य शैली में भिन्नतायें हैं।  मुख्य बात यह कि अपने  अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  मानते हैं कि सारे विश्व के लोग एक जैसे नहीं बन सकते। इसके विपरीत विदेशी धर्मों के प्रचारक यह दावा करते हैं कि वह एकदिन सारे संसार को अपनी धार्मिक छतरी के अंदर लाकर ही मानेंगे।   इसके विपरीत हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि सभी मनुष्यों के साथ अन्व जीवों पर भी समान दृष्टि रखना चाहिये जबकि विदेशी धर्म प्रचारक यह दावा करते हैं कि हम तो सारे विश्व के लोगों को एक ही रंग में रंगेंगे ताकि उन पर सभी समान दृष्टि स्वतः पड़ेगी।   हम उन पर आक्षेप नहीं करते पर सच्चाई यह है कि पश्चिमी में सदियों से चल रही धार्मिक वैमनस्य की भावना ने हमारे देश को भी घेर लिया है।  भारत में कभी भी जातीय और धार्मिक संघर्ष का इतिहास नहीं मिलता जबकि विदेशों में धार्मिकता के आधार पर अनेक संघर्ष हो चुके हैं।

       बहरहाल समस्त भारतीय धर्म व्यक्ति के आधार पर वैसे ही संगठित हैं उनको किसी औपचारिक संगठन की आवश्यकता नहीं है।  अभी तो ढेर सारे प्रचार माध्यम हैं जब नहीं थे तब भी लाखों लोग इन कुंभों में पहुंचते थे। यह सब व्यक्ति आधारित संगठन का ही परिणाम है।  हमारे जो बुद्धिमान लोग हिन्दू धर्म को असंगठित मानते हैं उन्हें यह समझना चाहिये कि विदेशी विचाराधारायें पद पर आधारित संगठनों के सहारे चलती हैं।  चुने हुए लोग  पदासीन होकर भगवत्रूप होने का दावा प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा  वहां  पहले राष्ट्र फिर   समाज और अंत में  व्यक्ति आता  है जबकि हमारे यहां व्यक्ति पहले समाज और फिर राष्ट्र का क्रम आता है।  हमारा राष्ट्र इसलिये मजबूत है क्योंकि व्यक्ति मजबूत है जबकि दूसरे राष्ट्रों के लड़खड़ाते ही उनके लोग भी कांपने लगते हैं। महाकुंभ में हर वर्ग, जाति, समाज, भाषा और क्षेत्र के लोग आते हैं। उनको किसी संगठन की आवश्यकता नहीं है।

     चारों शंकराचार्य  जिस गंगा के प्रदूषित होने पर दुःखी हैं वह कई बरसों से दूषित हो चुकी है। ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म प्रदर्शित हुए बरसों हो गये हैं। जब वह दूषित होना प्रारंभ हुई थी तब भी अखबारों में समाचार आने लगे थे।  तब हिन्दू धर्म को सगठित रखने का दावा करने वाले यह शंकराचार्य कहां थे?  उन्होंने उसे रोकने के लिये क्या प्रयास किया? क्या लोगों को प्रेरणा दी!  देश की हर छोटी बड़ी घटना पर अपना चेहरा दिखाने के आदी अनेक  धार्मिक पुरुष हो चुके हैं।  इनमें कुछ शंकराचार्य भी हैं।   गंगा के प्रदूषित होने के समाचार उन्होंने  न देखे या न सुने हों यह संभव नहीं है।  अब उनका दुःखी होना सामयिक रूप से प्रचार पाने के अलावा कोई अन्य प्रयास नहीं लगता।

        दरअसल देखा यह गया है कि हमारे अनेक धार्मिक पुरुषों के यजमान अब ऐसे पूंजीपति भी हैं जो उद्योग चलाते हैं।  गंगा में प्रदूषण उद्योगों के कारण फैला है।  अगर इन शंकराचार्यों के साथ मिलकर अन्य धार्मिक शिखर पुरुष कोई अभियान छेड़ते तो यकीन मानिये उनको मिलने वाले दान पर बुरा प्रभाव पड़ सकता था।  सच बात तो यह है कि हमारे धर्म का आधार तत्वज्ञान है और जो संगठन बने हैं उनका संचालन वह माया करती है जिस पर यह संसार आधारित है।  धर्म रक्षा धन से ही संभव का सिद्धांत अपनाना बुरा नहीं है पर उसको वैसा परिणामूलक नहीं बनाया जा सकता जिसकी चाहत हमारे धार्मिक शिखर पुरुष करते है।  वह तत्वज्ञान से ही संभव है पर उसमें रमने वाला आदमी फिर जिस आनंद के साथ जीता है उसे हम रैदास के इस कथन से जोड़ कर देखें ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ तो बात समझ में आ सकती है।

         बहरहाल इलाहाबाद महाकुंभ में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को शुभकामनायें तथा मकर सक्रांति के पर्व पर सभी ब्लॉग मित्रों, पाठकों और प्रशंसकों को बधाई।  हां, प्रशंसक भी जोड़ने पड़ेंगे क्योंकि अनेक लोग अक्सर लिखते हैं कि हम आपके लेखकीय रूप के प्रशंसक  हैं।  जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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गलत समय पर बोलने से बृहस्पति को भी अपमान झेलना पड़ सकता है-विदुर नीति के आधार पर हिंदी चिंत्तन लेख

          कुछ लोगों का आदत होती है कि वह हमेशा ही कुछ बोलना चाहते हैं।  हम आपसी वार्तालाप में यह देखते हैं कि अनेक लोग एक तो फालतु बातें करते हैं या फिर असमय ऐसा विषय उठाते हैं जिस पर चर्चा करना व्यर्थ लगता है।  आज के आधुनिक युग में अभिव्यक्ति के साधनों का दायरा बढ़ा है तो यह भी देखने में आ रहा है कि कोई भी किसी भी विषय पर कुछ भी बोल सकता है।  कभी कभी तो कुछ लोगों के बोलने पर हंसी आ जाती है।   हमेशा विज्ञान पढ़ने वाले अर्थशास्त्र पर बोलते हैं तो गणित पढ़ने वाले अध्यात्मिक विषय पर अपना ज्ञान बघारते हैं।
       अगर किसी ने साधु का वेश घारण किया या  समाजसेवक का चोला पहन लिया तो समझ लीजिये वह अपने आपको हर विषय में पारंगत मान लेता है।  आम आदमी की बात छोड़िये समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों में काम करने वाले बुद्धिमान तक उनके दावे को स्वीकार कर उनकी बातों को महत्व देते हैं। यह अलग बात है कि यह बातें विवादास्पर होती हैं जिन पर चर्चा करने से विज्ञापन का समय आसानी से पास होता है।
    आजकल वेश और पद एक तरह से महाविद्वान होने का प्रमाण पत्र बन गये हैं।  सबसे ज्यादा हंसी अध्यात्मिक तथा सामाजिक विषयों पर बोलने वालों पर आती है।  कई लोग तो ऐसे हैं कि जिन्होंने अध्यात्म का ज्ञान रटने के बाद  उसे सुनाने के लिये मैदान में उतर पढ़ते हैं।  कुछ तो शिष्यों का संग्रह कर समाज को सुधारने के लिये अभियान भी छेड़ देते हैं।  उनका सारा प्रयास नारों के सहारे होता है।  यही कारण है कि हमारे देश में कोई धार्मिक या सामाजिक अभियान कभी निर्णायक नहीं बन सका।
महाराज विदुर का कहना है कि

—————

अप्राप्तकालं वचं बृहस्पतिरपि ब्रुवन।

लभते बृदध्यवज्ञानामानं च भारत।।

      हिन्दी में भावार्थ-असमय अगर स्वयं बृहस्पति भी बोलें तो उन्हें अपमान झेलना पड़ेगा और उनको अपनी बुद्धि का तिरस्कार होगा।

 


द्वेष्यो न साधुर्भवति न  मेधावी न पण्डितः।


प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेषये पापानि चैव ह।

 


हिन्दी में भावार्थ-जिससे मन में द्वेष हो जाता है वह साधु,
विद्वान और बुद्धिमान हो तो भी  भारी दोषों से युक्त प्रतीत होता है। जो
प्रिय है उसमें ढेर सारे दोष होने पर भी नहीं दिखते पर जिसके शत्रु भाव है
उसके सारे काम पापमय दिखते हैं।
               अनेक लोग शोक के अवसर पर हास्य का भाव पैदा करते हैं तो हास्य के भाव पर रुदन करते हैं।  एक दूसरी भी प्रवृत्ति देखी जाती है कि अधिकतर  लोग अपने भावनात्मक दुराग्रहों के साथ जीते हैं।  जिससे स्वार्थ पूरा होता है वह चाहे दुष्ट भाव वाला क्यों न हो, उनके लिये देव है पर  जिससे कोई स्वार्थ नहीं है वह उनके लिये महत्वहीन है।  अगर कोई विद्वान भी किसी व्यक्ति के अहंकार पर बौद्धिक प्रहार करता या  मानसिक आघात पहुंचाता है तो एक तरह वह शत्रु ही मान लिया जाता है।  असली दवा कड़वी होती उसी तरह अहंकार से भरे मनुष्यों के लिये सत्य सुनना कठिन है।  ऐसे में जिन लोगों ने अपने विद्वान होने का प्रमाण पत्र जोड़ लिया है उनसे सत्य पर बहस करना व्यर्थ है।
       बहरहाल जिन लोगों को अपना जीवन संवारना है उन्हें अपने विवेक से काम लेना चाहिये।  अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर ज्ञान और विज्ञान का मस्तिष्क में संग्रह कर अपने जीवन में उस पर अमल करना सहज जीवन जीने का एक सहज उपाय है।  टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अनेक ऐसे विद्वान भी प्रकट होते हैं जो ज्ञानी हैं पर यकीनन वह अधिक प्रचार नहीं पाते।  वह निर्विवाद तक देते हैं जबकि आज के प्रचार माध्यम विवादास्पद विद्वानों को तरजीह देते हैं ताकि उनके निरर्थक बहसों के चलते उनके साथ बने रहें।
       कहने का अभिप्राय यह है कि हमें स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिये। उचित समय पर बोले और जिस विषय पर आधिकारिक ज्ञान हो उसी पर बोले।  ऐसा न करने पर तिरस्कार और अपमान झेलना पड़ता है।
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मनु स्मृति-खाने पीने के भी नियम होते हैं

                         भोजन करने के भी नियम होते हैं।  यह नहीं कि पेट भरना है तो चाहे जब खा  लिया और चाहे जब भूखे रह लिये। स्वास्थ्य वैज्ञानिक आजकल खानपान की बदलती प्रवृत्तियों को स्वास्थ्य के लिये खतरनाक बता रहे है।  आजकल आधुनिक युवा वर्ग बाज़ार में बने भोज्य पदार्थों के साथ ही ठंडे पेय भी उपयोग कर रहा है जिसकी वजह से बड़ी आयु में होने वाले विकार अब उनमें भी दिखाई देने लगे है।  जहां पहले युवा वर्ग को देखकर यह माना जाता था कि वह एक बेहतर स्वास्थ्य का स्वामी है और चाहे जो काम करना चाहे कर सकता है।  मौसम या बीमारी के आक्रमण से उनकी देह के लिये कम खतरा है पर अब यह सोच खत्म हो रही है।  अपच्य भोज्य पदार्थों और ठंडे पेयो के साथ ही  रसायनयुक्त तंबाकू की पुड़ियाओं का सेवन युवाओं के शरीर में ऐसे विकारों को पैदा कर रहा है जो साठ या सत्तर वर्ष की आयु में होते हैं।
मनु स्मृति में कहा गया है कि

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न भुञ्जीतोद्धतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत्।

नातिप्रगे नातिसायं न सत्यं प्रतराशितः।।

         हिन्दी में भावार्थ-जिन पदार्थों से चिकनाई निकाली गयी हो उनका सेवन करना ठीक नहीं है। दिन में कई बार पेट भरकर, बहुत सवेरे अथवा बहुत शाम हो जाने पर भोजन नहीं करना चाहिए। प्रातःकाल अगर भरपेट भोजन कर लिया तो फिर शाम को नहीं करना चाहिए।


न कुर्वीत वृथा चेष्टा न वार्यञ्जलिना पिवेत्

नोत्सङ्गे भक्षवेद् भक्ष्यान्नं जातु स्वात्कुतूहली।।

               हिन्दी में भावार्थ-जिस कार्य को करने से कोई लाभ न हो उसे करना व्यर्थ है। अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए और गोद में रखकर भोजन नहीं करना चाहिए।

           हम देख रहे हैं कि समाज में एक तरह से बदहवासी का वातावरण बन गया है।  दुर्घटनाओं, हत्यायें तथा छोटी छोटी बातों पर बड़े फसाद होने पर युवा वर्ग के लोग ही सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। युवाओं की मृत्यु दर में वृद्धि का कोई आंकड़ा दर्ज नहीं हुआ है पर जिस तरह के समाचार नित आते हैं वह इसका संदेह पैदा करते हैं।  कहा जाता है कि जैसा खाया जाये अन्न वैसा होता है मन। युवाओं में भोजन की बदलती प्रवृत्ति उनमें बढ़ते तनाव का प्रमाण तो पेश कर ही रही है।  जिस तरह बच्चों की बीमारियों पर अनुसंधान किया जाता रहा है उसी तरह अलग से युवा वर्ग के तनावों और विकारों का भी शोध किया जाना चाहिये।

स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे  भोजन का परंपरागत स्वरूप ही स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त है।  इस संबंध में श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि रस और चिकनाई युक्त, देर तक स्थिर रहने वाले तथा पाचक भोजन सात्विक मनुष्य को प्रिय होता है।  यह भी कहा गया है कि न तो मनुष्य को अधिक भोजन करना चाहिए न कम।  इसकी व्याख्या में हम यह भी मान सकते हैं कि ऐसा करने पर ही मनुष्य सात्विक रह सकता है। हम जब आजकल के दैहिक विकारों की तरफ देखते हैं तो पता लगता है कि चिकित्सक बीमारी से बचने के लिये चिकनाई रहित और हल्का भोजन करने की सलाह देते हैं।  तय बात है कि इससे मनुष्य की मनोदशा में सात्विकता की आशा करना कठिन लगता है।  हालांकि यह भी सच है कि इस तरह का भोजन करने पर शारीरिक श्रम अधिक कर उसको जलाना पड़ता है पर आजकल के रहन सहन में इसकी संभावना नहीं रहती। मगर यह सच है कि खानपान का मनुष्य जीवन से गहरा संबंध है और उसमें नियमों का पालन करना चाहिए।

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चाणक्य नीति-आदमी चाहे तो गधे, सिंह,कौवे, बगुले और मुर्गे से भी सीख सकता है

               अक्सर लोग आपसी वार्तालाप में एक दूसरे के लिये उपहास या घृणावश कौआ, गधा, बगुला या मुर्गा जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जबकि शेर शब्द का उपयोग सम्मान या प्रशंसा के लिये किया जाता है। माया के चक्कर में फंसा आदमी शायद ही कोई आदमी हो जो अपने साथ ही इस धरती पर विचर रहे पशु, पक्षियों तथा अन्य जीवों के गुणों की पहचान कर उनसे सीखना चाहता है। चूंकि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे लोगों को रखा गया है शायद इसलिये हम देख रहे हैं कि हमारे यहां खिचड़ी संस्कृति का निर्माण हो गया है जिसमें आदमी आनंद अंदर नहीं बाहर ढूंढ रहा है। प्रेम नाम की जीव हृदय में नहीं है पर वासना का प्रदर्शन सरेआम कर उसे ईश्वर उपासना का प्रतीक बना दिया गया है।
                   कौआ पक्षी होने के बावजूद छिपकर अपनी प्रेमलीला करता है पर आजकल हम देख रहे हैं कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में सार्वजनिक रूप से छात्र छात्रायें अपनी प्रेमलीला का प्रदर्शन करते हैं। इससे अन्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी परवाह नहीं करते। कहीं कहीं तो ऐसी घटनायें भी हुई हैं एक युवक से प्रेम करने वाली युवती पर दूसरे ने नाराज होकर हमला कर दिया। लोग कहते हैं कि प्यार करने की आजादी होना चाहिए पर हमारा दर्शन कहता है कि उसके सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करने के खतरे को भी समझना चाहिए।
आचार्य चाणक्य का कथन है कि
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सिंहादेकं वकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्
वायसात्पञ्च शेक्षेच्च षट् शुनस्वीणि गर्दभात्।।
          ‘‘मनुष्य को शेर से एक, बगुले से एक तथा मुर्गे से चार, कौऐ से पांच, कुत्ते से छह और गधे से तीन गुण ग्रहण करना चाहिए।’
प्रभूतं कार्यमल्पं चन्नर, कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्य सिंहादेकं प्रचक्षते
             ‘‘बड़ा हो या छोटा कार्य उसे संपन्न करने के लिये पूरी शक्ति लगाना शेर से सीखना चाहिए।’’
इंद्रियाणि च संयम्य वकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्।।
             ‘‘बगुले की भांति अपनी इंद्रियों को वश मे कर देश काल अपने बल को जानकर ही अपने सारे कार्य करना चाहिए।’
‘‘प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बंधुषु
स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।।
      ‘‘ठीक समय पर जागना, सदैव युद्ध के लिये तैयार रहना, बंधुओं को अपना हिस्सा देना और आक्रामक होकर भोजन करना मुर्गे से सीखना चाहिए।
गूढमैथनचरित्वं च काले काले च संग्रहम।
अप्रमत्तमविश्वासं पञ्च शेक्षेच्च वायसात्।।
               ‘‘छिपकर प्रेमालाप करना, ढीठता दिख्.ाना, नियम समय पर संग्रह करना सदा प्रमादरहित होकर जागरुक रहना तथा किसी पर विश्वास न करना ये पांच गुण कौऐ से सीखना चाहिए’’
बह्वाशी स्वल्पसंतुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः।।
          ‘‘बहुत खाने की शक्ति रखना, न मिलने पर भी संतुष्ट हो जाना, खूब सोना पर तनिक आहट होने पर भी जाग जाना, स्वामीभक्ति और शूरता यह छह गुण कुत्ते से सीखना चाहिए।
सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं न च पश्यति।
संतुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्।।
       ‘‘बहुत थक जाने पर भी भार उठाना, सर्दी गर्मी से बेपरवाह होन और सदा शांतिपूर्ण जीवन बिताना यह तीन गुण गधे से सीखना चाहिए।
              एक बात याद रखने लायक है। आदमी गुणों के वशीभूत होकर वैसे ही काम करता है जैसे कि अन्य जीव! हम आदमी से देवता होने की अपेक्षा हमेशा नहीं कर सकते। अपने जीवन में सतर्कता, दृढ़ता, और नैतिकता के साथ जीने का प्रयास करना है तो हमें पशु पक्षियों से भी सीखना चाहिए। इसके अलावा अपने किस काम को सार्वजनिक रूप से दिखायें और किसे नहीं इस पर भी विचार करना चाहिए। जब हम अपने वैभव, प्रेम और गूढ़ रखने वाले रहस्यों को सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं तो इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देखने वालों में कोई पशुवृत्ति को प्राप्त होकर हमें हानि भी पहुंचा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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धर्मग्रंथों के अध्ययन से ज्ञान मिलता है-चिंत्तन लेख (dharam granthon ke adhyayan se gyan-hindi chitan lekh)

        इस संसार में भांति भांति प्रकार के लोग हैं, जिनमें कुछ तो मन की शुद्धता के लिए धर्म कर्म करते हैं तो कुछ दिखावा करते हैं।  कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भक्ति   तथा यज्ञ करते नहीं दिखते हैं और न ही भक्त होने का पाखंड रचते हैं जबकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो धर्म के नाम पर कर्मकांड अथवा यज्ञ करने के लिये दबाव बनाते हैं। अनेक लोग बिना किसी दिखावे के सात्विक जीवन जीते हैं पर चूंकि वह हवन तथा यज्ञ आदि नहीं करते तो लोग उनको नास्तिक होने का ताना देते हैं। सच बात तो यह है कि यज्ञ तथा हवन आदि करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हृदय में तत्व ज्ञान धारण करे। इसके लिये प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करने से जिज्ञासा बढ़ती है और अभ्यास से तत्वज्ञान का अनुभव हो जाता है।
              इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
                   ————————————-
             यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
              तथातथा विज्ञानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
            ‘‘जैसे जैसे कोई व्यक्ति शास्त्र का अभ्यास करता है वैसे ही उसे गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी प्रवृत्ति और जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान में बढ़ती जाती है।’’
              एक बात निश्चित है कि हमारे पुराने ग्रंथों में ज्ञान के साथ विज्ञान भी अंतर्निहित है। कुछ लोग आज विज्ञान के युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को हेय मानते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि विज्ञान का आधार भी तत्वज्ञान है जिसके कारण हमारे प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथ विज्ञान के विषय में सामग्री से परिपूर्ण हैं।
कुछ लोग मंदिर न जाने या यज्ञों तथा हवनों में सक्रिय भागीदारी न करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हैं पर यह उनका ही अज्ञान है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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‘‘शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ यज्ञादि नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपनी अध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि करते हैं। उनके लिये लिये नाक, जीभ, त्वचा, तथा कान पर संयम रखना ही एक तरह से महायज्ञ है।
                सच बात तो यह है कि धर्म तभी ही प्रशंसनीय है जब वह आचरण तथा कर्म में दृष्टिगोचर हो न कि केवल कर्मकांड और दिखावे में। कुछ लोग जो प्रतिदिन मंदिर जाते हैं वह दूसरों को अभक्त समझते हैं जो कि उनके अज्ञान का प्रमाण है। इतना ही नहीं कुछ तो लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन पूजा आदि करते हैं पर व्यवहार में ऐसा अहंकार दिखाते हैं जैसे कि वही भगवान के इकलौते भक्त हों। जो वास्तव में भक्त और ज्ञानी हैं वह दिखावे से अधिक आत्मनियंत्रण तथा आचरण से उसे प्रमाणित करते हैं।
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शास्त्रों 
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पतंजलि योग विज्ञान-संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा धन (patanjali yoga vigyan-santosh jivan ka dhan)

शौचात्स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शौच करने से अपने अंगों में वैराग्य तथा दूसरों से संपर्क न रखने की इच्छा पैदा होती है।
सत्त्वशुद्धिसौमनरस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च।।
हिन्दी में भावार्थ-
इसके सिवा अंतकरण की शुद्धि, मन में प्रसन्नता, चित की एकाग्रता, इंद्रियों का वश में होना और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता की अनुभूति भी होती है।
संतोषादनुत्तसुखलाभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
संतोष से उत्तम दूसरा कोई सुख या लाभ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम जब योग साधना करते हैं तब अपनी देह के समस्त अंगों की क्रियाओं को देख सकते हैं। हम अपनी खाने पीने तथा शौच की क्रियाओं को सामान्य बात समझ कर टालते हैं जबकि जीवन के आनंद का उनसे घनिष्ठ सम्बंध है। इसका अनुभव तभी किया जा सकता है जब हम योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप करें। हम जब शौच करते हैं तब अपनी देह से गंदगी निकलने के साथ ही अपने अंदर सुख का अनुभव करें। अगर ऐसा न हो तो समझ लेना चाहिए कि अभी हमारी देह में अनेक प्रकार के विकार रह गये हैं। जब हम शौच के समय अपने अंदर से विकार निकलने की अनुभूति होती है तब मन में एक तरह से वैराग्य भाव आता है और साथ ही मन में यह भी भाव आता है कि जितना हो सके अपने खान पान में सात्विक भाव का पालन किया जाये। ऐसी वस्तुऐं ग्रहण की जायें जो सुपाच्य तथा देह के लिये कम तकलीफदेह हों। इतना ही नहंी कम से कम भोजन किया जाये ताकि देह और मन में विकार न रहें यह अनुभूति भी होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि शौच से निवृत होने पर देह के स्वस्थ होने की अनुभूति होना चाहिए। इसके विपरीत अगर शरीर में थकावट या कमजोरी के साथ मानसिक तनाव का अनुभव तो समझ लेना चाहिए कि हमारी देह बिना योगसाधना के विकार नहीं निकाल सकती।
इतना ही नहीं अपनी देह की हर शारीरिक क्रिया के साथ हमें अपने अंदर संतोष का अनुभव हो तभी यह मानना चाहिए कि हम स्वस्थ हैं। इस संसार में संतोष ही सुख का रूप है। अपने मन में असंतोष से अपना ही खून जलाकर कोई सुखी नहीं रह सकता।

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पतंजलि योग साहित्य-तप, स्वाध्याय तथा भक्ति हैं क्रियायोग (patanjali yoga sahitya-tap, swadhayay tathaa bhakti is kriya yog)

तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधान क्रियायोगः।।
हिन्दी में भावार्थ-
तप, स्वाध्याये तथा ईश्वर के प्रति प्राण केंद्रित करना तीनों ही क्रियायोग हैं।
समाधिभावनार्थः क्लेशतनुरणर्थश्च।।
हिन्दी में भावार्थ-
समाधि में प्राप्त सिद्धि से अज्ञान तथा अविद्या के कारण होने वाले क्लेशों का नाश होता है।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांचों क्लेश है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें समाधि का अत्यंत महत्व है। समाधि ध्यान का वह चरम शिखर है जहां मनुष्य इस दैहिक संसार से प्रथक ईश्वरीय लोक में स्थित हो जाता है। उसका अपने अध्यात्म से इस तरह योग या जुड़ाव हो जाता है कि उसकी देह में स्थित इंद्रिया निष्क्रिय और शिथिल हो जाती हैं और जब योगी समाधि से वापस लौटता है तो उसके लिये पूरा संसार फिर नवीन हो जाता है क्योंकि वह मन के सारे विकारों से निवृत होता है।
योगासन तथा प्राणायाम के बाद परम पिता परमात्मा के प्रति ध्यान लगाना भी योग हैं और इनको क्रियायोग कहा जाता है। इसमे सिद्धि होने पर किसी विषय का अध्ययन न करने या उसमें जानकारी का अभाव होने पर भी उसको जाना जा सकता है। ऐसे में अविद्या और अज्ञान से उत्पन्न क्लेश नहीं रह जाता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि योग साधना की सीमा केवल योगासन और प्राणायाम तक ही केंद्रित नहीं है बल्कि ध्यान और समाधि भी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है। मनुष्य का अपना संकल्प भी इसमें महत्व रखता है।
सच तो यह है कि मनुष्य मन के इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक तो है सहज योग जिसमें मनुष्य स्वयं संचालित होता है। दूसरा है असहज योग जिसमें मनुष्य अज्ञान तथा अविद्या के कारण इधर उधर प्रसन्नता तलाश करते हुए केवल तनाव ही पाता है। पूर्ण रूप से योग साधना का ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य तत्व ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तब उनका प्रयोजन इस नश्वर संसार से अधिक नहीं रह जाता है। योगासन तथा प्राणायाम करने वाले कुछ लोग अपने आपको सिद्ध समझने लगते हैं और तब वह दूसरों को चमत्कार दिखाकर अपनी दुकानें जमाते हैं। दरअसल वह योग का पूर्ण रूप नहीं जानते। जिन लोगों को योग साधना का पूर्ण ज्ञान होता है वह समाधि के द्वारा सिद्ध तो प्राप्त करते हैं पर उसकी आड़ में कोई धंधा नहीं करते क्योंकि उनके लिये इस संसार में कोई भी कार्य चमत्कार नहीं रह जाता।
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भर्तृहरि नीति शतक-वाणी और धन के रोगियों से दूर रहें (bhartrihari neeti shatak-vani aur dhna ke rogi se door rahem)

पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में तीन प्रकार के लोग पाये जाते हैं-सात्विक, राजस और तामस! श्रेष्ठता का क्रम जैसे जैस नीचे जाता है वैसे ही गुणी लोगों की संख्या कम होती जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि तामस प्रवृत्ति की संख्या वाले लोग अधिक हैं। उनसे कम राजस तथा उनसे भी कम सात्विक होते हैं। धन का मद न आये ऐसे राजस और सात्विक तो देखने को भी नहीं मिलते। जिन लोगों को भगवान ने वाणी या जीभ दी है वह उससे केवल आत्मप्रवंचना या निंदा में नष्ट करते हैं। किसी को नीचा दिखाने में अधिकतर लोगों को मज़ा आता है। किसी की प्रशंसा कर उसे प्रसन्न करने वाले तो विरले ही होते हैं। इस संसार के वीभत्स सत्य को ज्ञानी जानते हैं इसलिये अपने कर्म में कभी अपना मन लिप्त नहीं करते।
विलासित और अहंकार लिप्त इस संसार में में यह तो संभव नहीं है कि परिवार या अपने पेट पालने का दायित्व पूरा करने की बज़ाय वन में चले जायें, अलबत्ता अपने ऊपर नियंत्रण कर अपनी आवश्यकतायें सीमित करें और अनावश्यक लोगों से वार्तालाप न करें। उससे भी बड़ी बात यह कि परमार्थ का काम चुपचाप करें, क्योंकि उसका प्रचार करने पर लोग हंसी उड़ा सकते हैं। सन्यास का आशय जीवन का सामान्य व्यवहार त्यागना नहीं बल्कि उसमें मन के लिप्त न होने देने से हैं। अपनी आवश्यकतायें कम से कम करना भी श्रेयस्कर है ताकि हमें धन की कम से कम आवश्यकता पड़े। जहां तक हो सके अपने को स्वस्थ रखने का प्रयास करें ताकि दूसरे की सहायता की आवश्यकता न करे। इसके लिये योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान करना एक अच्छा उपाय है।

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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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मनुस्मृति-अन्य लोगों का अपमान करने वाली नष्ट होता है (admi ka apman na karen-manu smriti)

सुखं द्वावमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिनन्मन्ता विनश्तिं

हिन्दी में भावार्थ-अन्य व्यक्तियों द्वारा अपमान किये जाने पर उनको माफ करने वाला मनुष्य सुखी की नींद लेनें के साथ संसार में सहजता से विचरता है परंतु दूसरों का अपमान करने वाला मनुष्य स्वयं ही नष्ट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन को अगर दृष्टा भाव से देखा जाये तो यकीनन उसके प्रति सहजता का बोध होता है। मान और अपमान से परे होकर विचार करें तो फिर जीवन का एक अलग ही मजा है। श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों में तथा इंद्रिया ही इंद्रियों में बरत रही हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि देह पर जो तत्व प्रभाव डालते हैं उनको अमृतमय या विष से व्याप्त होने का प्रभाव भी मनुष्य पर पड़ता है। जो गंदा खाते पीते हैं उनकी वाणी और विचार उसी अनुरूप होते हैं इसलिये उनसे सद्व्यवहार की अपेक्षा ज्ञानियों को नहीं करना चाहिए। अगर वह अपमान करते हैं तो उसकी अनदेखी कर देना ही उचित है। क्योंकि अगर उनका प्रतिकार उनकी शैली में ही किया जाये तो अपना ही रक्तचाप भी बढ़ जाता है। फिर स्वयं वाणी में कटुता और आंखों में विष व्याप्त होता जाता है। इसलिये अच्छा यही है कि अपने अपमान करने वालों को माफ कर दें। उसके बाद चिंतन और ध्यान करें तो इस बात का अहसास होगा कि हमने ठीक किया।
एक बात निश्चित यह है कि हर आदमी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है और जो दूसरों का अपमान करते हैं वह तनाव की अग्नि में स्वयं का मन और तन जलाते हैं। उनकी शक्ति और बुद्धि धीरे धीरे पतन की तरफ बढ़ती है और अंततः नष्ट हो जाते हैं। अतः अपने मन में क्षमा का भाव हमेशा धारण करना चाहिए।

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें (kotilaya ka arthashastra-safalta ke liye janvirodhi kaam na karen)

आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।
श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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भर्तृहरि नीति शतक-असिधारा व्रत का पालन करें (bhartrihari neeti shatak-asidhara vrat)

सन्तपन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव प्रसते दिवाकर निशा प्रापोश्वरौ भास्करौ भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
आसमान में बृहस्पति समेत अनेक शक्तिशाली ग्रह हैं किन्तु पराक्रम में दिलचस्पी रखने वाला राहु उनसे कोई लड़ाई मोल नहीं लेता क्योंकि वह तो पूर्णिमा और अमावस्या के दिन अति देदीप्यमाान सूर्य तथा चंद्र को ही ग्रसित करता है।
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्यारूया वतिर्मलिनमसुभंगेऽप्यसुकरं।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां सतां केनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
सदाशयी मनुष्यों के लिये कठोर असिधारा व्रत का आदेश किसने दिया? जिसमें दुष्टों से किसी प्रकार की प्रार्थना नहीं की जाती। न ही मित्रों से धन की याचना की जाती है। न्यायिक आचरण का पालन किया जाता है। मौत सामने आने पर भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महान पुरुषों के आचरण की ही अनुसरण किया जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य को अपने पराक्रम में ही यकीन करना चाहिए न कि अपने लक्ष्यों को दूसरों के सहारे छोड़कर आलस्य बैठना चाहिए। इतना ही नहीं मित्रता या प्रतिस्पर्धा हमेशा अपने से ताकतवर लोगों की करना चाहिये न कि अपने से छोटे लोगों पर अन्याय कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।
अनेक मनुष्य अपने आसपास के लोगों को देखकर अपने लिये तुच्छ लक्ष्य निर्धारित करते हैं। थोड़ा धन आ जाने पर अपने आपको धन्य समझते हुए उसका प्रदर्शन करते हैं। यह सब उनके अज्ञान का प्रमाण है। अगर स्थिति विपरीत हो जाये तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है और दूसरों के कहने पर अपना मार्ग छोड़ देते हैं। अनेक लोग तो कुमार्ग पर चलने लगते हैं। सच बात तो यह है कि हर मनुष्य को भगवान ने दो हाथ, दो पांव तथा दो आंखों के साथ विचारा करने के लिये बुद्धि भी दी है। अगर मनुष्य असिधारा व्रत का पालन करे-जिसमें दुष्टों ने प्रार्थना तथा मित्रों से धना की याचना न करने के साथ ही किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों का पालन किया जाता है-तो समय आने पर अपने पराक्रम से वह सफलता प्राप्त करता है।

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-आलस्य छोड़कर नियत समय पर काम प्रारंभ करना श्रेयस्कर

न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। 

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