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ham copy nahe kar sakta par likh to sakta ha n .This is a very good !
दोस्तों , योग से मेरा पुराना लगाव रहा है , इसकी जिज्ञासा में मैंने बर्ष 2010 में वकालात में 15 बर्ष व्यतीत करने के बाद योग विज्ञान में परास्नातक डिप्लोमा प्राप्त करने की ठानी और उसे सफलता पूर्वक पूरा किया । जिसके परियोजना लेखन में मैने षटकर्म बिषय षोधन क्रियाएॅं एवं इनका मानव जीवन पर प्रभाव लिया और उस पर जो खोजा व लिखा उसे धारावाहिक रूप में अन्य जनउपयोगार्थ प्रस्तुत करने का विचार आया है । जिसका श्री गणेश उसकी प्रस्तावना के साथ कर रहा हॅू आशा है उसका स्वाध्याय योग पथ के पथिकों को फलीभूत करेगा । षोधन षब्द से अभिप्रेत है षुद्व, निर्मल करना अर्थात देह (मानव षरीर ) को षुद्व ,निर्मल व स्वच्छ एंव षारीरिक मलों से निर्मल करने वाली क्रियाएं षोधन क्रियाएं हठयोग के अंर्तगत कही जाती है । ( ैीवकींद दृ जीम ंबज व िबसमंतपदह एचनतपलिपद ) हठयोग के प्रर्वतक योग ऋशियों – महशियों ने मानव देह के बाह्य अंगों के साथ आंतरिक अंगों की षुद्वि के लिए जिन क्रियाओं को अनभूत कर प्रतिपादित किया वे शटकर्म के नाम से जाने जाते है ।
हठयोग के अंतर्गत आने वाले शटकर्म अर्थात छह प्रमुख क्रियाओं के माध्यम से मानव षरीर के षोधन की जो प्रक्रिया हमारे ऋशि मुनियों ने प्रतिपादित की है वह अद्वितीय है । यह प्रक्रियायें यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के लिए सहज नहीं है फिर भी इनको योग प्रषिक्षक के सानिध्य में अभ्यास करने से यह साधक के लिए सहजप्रायः बन जाती है ।
शटकर्म की आवष्यकता वास्तव में षरीर में कुपित होने वाले प्रमुख दोशों के निवारण के लिए ही हमारे ऋशि मुनियों व योगाचार्यों ने प्रतिपादित की । षरीर में उत्पन्न होने वाली व्याधियों का प्रमुख कारण आयुर्वेद षरीर में त्रिधातु अर्थात वात, पित्त और कफ का कुपित होना मानता है । मानवीय षरीरों की प्रकृति ( तासीर ) अलग – अलग होती है । जैसे किसी व्यक्ति के षरीर में वातप्रधानता होती है तो किसी में पित्त प्रधानता और किसी में कफ की प्रधानता पाई जाती है । वात प्रधान षरीरों में आहार – विहार के दोशों से प्रायः वातवृद्वि हो जाती है । जबकि पित्त प्रधान षरीरों में पित्त विकृति और कफ प्रधान षरीरों में कफ की प्रधानता पाई जाती है ।
वात प्रधान षरीरों में आहार – विहार के दोशों से प्रायः वातव्ृद्धि हो जाती है । पित्त प्रधान षरीरों में पित्तविकृति और कफ प्रधान षरीरों में कफ – प्रकोप हो जाता है । कफ धातु के विकृत होने से दूशित ष्लेश्म आमवृद्धि या मेदका संग्रह हो जाता है जिससे इन मलों के कुपित होने से अनेकानेक प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होने लगते है । इन बीमारियों को उत्पन्न न होने देने के लिए और यदि उत्पन्न हो जाये ंतो उनके निवारण के साथ षरीर को पुनः स्वस्थ्य व निरोग बनाने के लिए षोधन अर्थात शटकर्म क्रियाओं की महत्वता को समझते हुए ऋशियों ने इसका प्रतिपादन किया है जो मानव के लिए अत्याधिक उपयोगी व निरापद है ।
हठयोग के अंतर्गत आने वाले शटकर्म अर्थात छह प्रमुख योगिक क्रियाओं के माध्यम से मानव षरीर के षोधन की जो प्रक्रिया हमारे ऋशि मुनियों व योगाचार्यो ने प्रतिपादित की है वह अत्यंत उपयोगी व निरापद है । यह प्रक्रियायें यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के लिए सहज नहीं है फिर भी इनको कुष्ल योग प्रषिक्षक के सानिध्य में अभ्यास के माध्यम से सीखा जा सकता है । षोधन क्रियाओं ,धौति , बस्ती ,नेति , लौलकी ,त्राटक व कपालभॉंति है । ये क्रियाएं आयुर्वेद में वर्णित पंचकर्म चिकित्सा जिसके अंतर्गत स्नेहपान , स्वेदन , वमन , विरेचन और वस्ति के सदृष ही है । जिनके निरंतर अभ्यास से न केवल षरीरिक व मानसिक निरोगिता प्राप्त की जा सकती है , वरन योग की उच्चावस्था प्राप्त करने का मार्ग भी प्राप्त किया जा सकता है । क्योंकि षोधन कियाओं के अभ्यास से मानव षरीर को दिव्यता प्राप्त कराने वाले चक्र जाग्रत होते है।
यद्यपि शटकर्मो के माध्यम से प्राप्तव्य लाभ अश्टांग योग के अंतर्गत प्राणायाम से भी प्राप्त किये जाते है ,किन्तु षरीर में संचित कुछ ऐेसे भी मल होते है जिनका निवारण प्राणायाम से भी संभव नहीं हो पाता है उसके लिए शटकर्मों का सहारा लेना पड़ता है । हठ योग प्रदीपिका में शटकर्मों की महत्वता को निम्न ष्लोक में व्यक्त किया गया है ।
म्ेादः ष्लेश्माधिकः पूर्व शट् कर्माणि समाचरेत् । अन्यस्तु नाचरेत्तानि दोशाणं समभावतः ।।
(हठयोग प्रदीपिका 2.21 )
अर्थात जिस मानव षरीर के मेद और ष्लेश्मा अधिक हो वह पुरूश प्राणायाम से पहले इन शटकर्मा को करें । अर्थात शटकर्मों के लाभ असीमित है और इसे कोई स्वीकार नहीं कर सकता है। मानव देह को निरोग बनाने व योग पथ के उच्चाकांक्षी साधकों को इसका अभ्यास अवष्य करना चाहिए।
राजेष कुमार देवलिया Lalitpur