उनके पेट
कभी नहीं भरेंगे
जहरीले हैं,
रोटी की लूट
सारे राह करेंगे
जेब के लिए,
मीठे बोल हैं
पर अर्थ चुभते
वे कंटीले हैं।
————–
फिर आएंगे
वह याचक बन
कुछ मांगेंगे,
दान लेकर
वह होंगे स्वामी
हम ताकेंगे,
हम सोएँ हैं
बरसों से निद्रा में
कब जागेंगे,
सेवक कह
वह शासक होते
भूख चखाते
पहरेदार
अपना नाम कहा
लुटेरे बने
लूटा खज़ाना
आँखों के सामने है
कब मांगेंगे।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.हिन्दी पत्रिका
५.दीपकबापू कहिन
६. ईपत्रिका
७.अमृत सन्देश पत्रिका
८.शब्द पत्रिका
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.हिन्दी पत्रिका
५.दीपकबापू कहिन
६. ईपत्रिका
७.अमृत सन्देश पत्रिका
८.शब्द पत्रिका





![Desire.. [Explored] 22.2.12 Desire.. [Explored] 22.2.12](http://static.flickr.com/7194/6921502699_4cb090c84f_t.jpg)




