चाणक्य नीति-आदमी चाहे तो गधे, सिंह,कौवे, बगुले और मुर्गे से भी सीख सकता है


               अक्सर लोग आपसी वार्तालाप में एक दूसरे के लिये उपहास या घृणावश कौआ, गधा, बगुला या मुर्गा जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जबकि शेर शब्द का उपयोग सम्मान या प्रशंसा के लिये किया जाता है। माया के चक्कर में फंसा आदमी शायद ही कोई आदमी हो जो अपने साथ ही इस धरती पर विचर रहे पशु, पक्षियों तथा अन्य जीवों के गुणों की पहचान कर उनसे सीखना चाहता है। चूंकि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे लोगों को रखा गया है शायद इसलिये हम देख रहे हैं कि हमारे यहां खिचड़ी संस्कृति का निर्माण हो गया है जिसमें आदमी आनंद अंदर नहीं बाहर ढूंढ रहा है। प्रेम नाम की जीव हृदय में नहीं है पर वासना का प्रदर्शन सरेआम कर उसे ईश्वर उपासना का प्रतीक बना दिया गया है।
                   कौआ पक्षी होने के बावजूद छिपकर अपनी प्रेमलीला करता है पर आजकल हम देख रहे हैं कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में सार्वजनिक रूप से छात्र छात्रायें अपनी प्रेमलीला का प्रदर्शन करते हैं। इससे अन्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी परवाह नहीं करते। कहीं कहीं तो ऐसी घटनायें भी हुई हैं एक युवक से प्रेम करने वाली युवती पर दूसरे ने नाराज होकर हमला कर दिया। लोग कहते हैं कि प्यार करने की आजादी होना चाहिए पर हमारा दर्शन कहता है कि उसके सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करने के खतरे को भी समझना चाहिए।
आचार्य चाणक्य का कथन है कि
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सिंहादेकं वकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्
वायसात्पञ्च शेक्षेच्च षट् शुनस्वीणि गर्दभात्।।
          ‘‘मनुष्य को शेर से एक, बगुले से एक तथा मुर्गे से चार, कौऐ से पांच, कुत्ते से छह और गधे से तीन गुण ग्रहण करना चाहिए।’
प्रभूतं कार्यमल्पं चन्नर, कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्य सिंहादेकं प्रचक्षते
             ‘‘बड़ा हो या छोटा कार्य उसे संपन्न करने के लिये पूरी शक्ति लगाना शेर से सीखना चाहिए।’’
इंद्रियाणि च संयम्य वकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्।।
             ‘‘बगुले की भांति अपनी इंद्रियों को वश मे कर देश काल अपने बल को जानकर ही अपने सारे कार्य करना चाहिए।’
‘‘प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बंधुषु
स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।।
      ‘‘ठीक समय पर जागना, सदैव युद्ध के लिये तैयार रहना, बंधुओं को अपना हिस्सा देना और आक्रामक होकर भोजन करना मुर्गे से सीखना चाहिए।
गूढमैथनचरित्वं च काले काले च संग्रहम।
अप्रमत्तमविश्वासं पञ्च शेक्षेच्च वायसात्।।
               ‘‘छिपकर प्रेमालाप करना, ढीठता दिख्.ाना, नियम समय पर संग्रह करना सदा प्रमादरहित होकर जागरुक रहना तथा किसी पर विश्वास न करना ये पांच गुण कौऐ से सीखना चाहिए’’
बह्वाशी स्वल्पसंतुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः।।
          ‘‘बहुत खाने की शक्ति रखना, न मिलने पर भी संतुष्ट हो जाना, खूब सोना पर तनिक आहट होने पर भी जाग जाना, स्वामीभक्ति और शूरता यह छह गुण कुत्ते से सीखना चाहिए।
सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं न च पश्यति।
संतुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्।।
       ‘‘बहुत थक जाने पर भी भार उठाना, सर्दी गर्मी से बेपरवाह होन और सदा शांतिपूर्ण जीवन बिताना यह तीन गुण गधे से सीखना चाहिए।
              एक बात याद रखने लायक है। आदमी गुणों के वशीभूत होकर वैसे ही काम करता है जैसे कि अन्य जीव! हम आदमी से देवता होने की अपेक्षा हमेशा नहीं कर सकते। अपने जीवन में सतर्कता, दृढ़ता, और नैतिकता के साथ जीने का प्रयास करना है तो हमें पशु पक्षियों से भी सीखना चाहिए। इसके अलावा अपने किस काम को सार्वजनिक रूप से दिखायें और किसे नहीं इस पर भी विचार करना चाहिए। जब हम अपने वैभव, प्रेम और गूढ़ रखने वाले रहस्यों को सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं तो इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देखने वालों में कोई पशुवृत्ति को प्राप्त होकर हमें हानि भी पहुंचा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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टिप्पणियाँ

  • Gurderp singh  On 06/04/2012 at 20:08

    Lo g sher word pr bhi jabab hazir he
    Ak baar ak tagde aadmi ne garib aadmi
    Se kha ,
    Oy tu mujhe nhi jaanta mera naam sher singh
    He or mujhme taakat bhi sher jitni he !!
    Garib bola sahib mujhe toh bs itna bta dijiye
    K sher ghar aaya tha ya aapki maa jangal me
    Gai thi !!! Hahaha!!!!!

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