पर्दे पर आंखों के सामने
चलते फिरते और नाचते
हांड़मांस के इंसान
बुत की तरह लगते हैं।
ऐसा लगता है कि
जैसे पीछे कोई पकड़े है डोर
खींचने पर कर रहे हैं शोर
डोर पकड़े नट भी
खुद खींचते हों डोर, यह नहीं लगता
किसी दूसरे के इशारे पर
वह भी अपने हाथ नचाते लगते हैं
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चारो तरफ मुखौटे सजे हैं
पीछे के मुख पहचान में नहीं आते।
नये जमाने का यह चालचलन है
फरिश्तों का मुखौटा शैतान लगाते।
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भ्रम को सच बताकर
वह जमाने को बहला रहे हैं।
जज्बातों के सौदागर
दर्द यूं मु्फ्त में नहीं सहला रहे हैं।
आंखें हैं तुम्हारी तरफ
पर हाथ फैले हैं पीछे की तरफ
जहां से बटोर कर नकदी
अपनी जेब में ला रहे हैं
आज के युग में सिद्ध कोई नहीं है
सब खुद को किंग कहला रहे हैं।
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कितना असली और कितना नकली
किसकी पहचान करें।
अपने बारे में ही होने लगे
अब ढेर सारे शक
पहले उनसे तो उबरें।
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
One Comment
hey very good bhut accha likha ha tumne you are good writer .