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	<title>Comments on: कुछ लोग खो गए इस शहर की भीड़ में-व्यंग्य कविता</title>
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	<description>दीपक बापू कहिन का सहयोगी चिट्ठा-यहाँ मेरी मौलिक रचनाएं प्रकाशित है और इसके कहीं अन्य व्यवसायिक प्रकाशन के लिए मेरे से पूर्व अनुमति एवं पारिश्रमिक देना अनिवार्य होगा जो प्रति रचना दो हजार रूपये है । कोई लेखक इसका पूर्ण या आंशिक उपयोग कर सकता है पर उसके लिए उसे सूचना देना चाहिए ऐसा आग्रह है । ब्लोग लेखको के लिए कोई बंदिश नहीं है।दीपक भारतदीप, ग्वालियर</description>
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		<title>By: komal</title>
		<link>http://deepakraj.wordpress.com/2008/10/30/kuchh-log-kho-gaye-is-bheed-men/#comment-697</link>
		<dc:creator>komal</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Dec 2008 04:30:59 +0000</pubDate>
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		<description>अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में 

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में 

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में 

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में 

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में 
—————————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Tags: साहित्य, हास्य कविता, हिन्दी शायरी, हिन्दी शेर, bharatdeep, hasya kavita, hindi
3 Responses to &quot;कुछ लोग खो गए इस शहर की भीड़ में-व्यंग्य कविता&quot;
1 &#124; sanjayoscar

November 2nd, 2008 at 11:17 am 


hello dear,

-happy new year , app ka web creation bahoot achha hai…..subject bhi ati sundar hai………………………..wondorfull.
-visti at : sanjayoscar.wordpress.com
- see my real life and creatiom.
-Sanjay Nimavat

2 &#124; pankaj

December 19th, 2008 at 4:11 pm 


अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में 

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में 

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में 

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में 

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपने कुछ लोग खो गए<br />
इस शहर की भीड़ में<br />
उनके पते लिखे हैं<br />
बहुत से कागजों पर<br />
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में </p>
<p>किसे ढूंढें और क्यों<br />
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने<br />
किसी से मिलने की वजह<br />
चाहिए हमको<br />
जाएं मिलने तो वह भी<br />
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने<br />
समय निकला जाता है<br />
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में </p>
<p>अपने ही जाल में उलझे लोग<br />
फुरसत नहीं पाते<br />
जीवन की इस भागमभाग से<br />
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव<br />
कब ले सकते हैं दिल से काम<br />
नहीं आता समझ में<br />
खोये हुए है लोग<br />
अपनी समस्याओं की भीड़ में </p>
<p>हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको<br />
जो छोड़ नहीं पाते उसको<br />
डरते हैं अपनी तन्हाई से<br />
जीतने की क्या सोचेंगे वह<br />
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से<br />
अकेले में अपने पहचाने का डर<br />
उनके मन में रहता है<br />
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में </p>
<p>अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको<br />
वहाँ हाँफते और कांपते<br />
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए<br />
कभी हमारे तन्हाई पर भी<br />
हँसते हैं दूसरों के साथ<br />
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ<br />
पर हम भी हँसते हैं<br />
साथी है हमारी यह तन्हाई<br />
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में<br />
—————————</p>
<p>दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</p>
<p>अन्य ब्लाग<br />
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका<br />
2.अनंत शब्दयोग<br />
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका<br />
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका<br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</p>
<p>Tags: साहित्य, हास्य कविता, हिन्दी शायरी, हिन्दी शेर, bharatdeep, hasya kavita, hindi<br />
3 Responses to &#8220;कुछ लोग खो गए इस शहर की भीड़ में-व्यंग्य कविता&#8221;<br />
1 | sanjayoscar</p>
<p>November 2nd, 2008 at 11:17 am </p>
<p>hello dear,</p>
<p>-happy new year , app ka web creation bahoot achha hai…..subject bhi ati sundar hai………………………..wondorfull.<br />
-visti at : sanjayoscar.wordpress.com<br />
- see my real life and creatiom.<br />
-Sanjay Nimavat</p>
<p>2 | pankaj</p>
<p>December 19th, 2008 at 4:11 pm </p>
<p>अपने कुछ लोग खो गए<br />
इस शहर की भीड़ में<br />
उनके पते लिखे हैं<br />
बहुत से कागजों पर<br />
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में </p>
<p>किसे ढूंढें और क्यों<br />
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने<br />
किसी से मिलने की वजह<br />
चाहिए हमको<br />
जाएं मिलने तो वह भी<br />
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने<br />
समय निकला जाता है<br />
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में </p>
<p>अपने ही जाल में उलझे लोग<br />
फुरसत नहीं पाते<br />
जीवन की इस भागमभाग से<br />
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव<br />
कब ले सकते हैं दिल से काम<br />
नहीं आता समझ में<br />
खोये हुए है लोग<br />
अपनी समस्याओं की भीड़ में </p>
<p>हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको<br />
जो छोड़ नहीं पाते उसको<br />
डरते हैं अपनी तन्हाई से<br />
जीतने की क्या सोचेंगे वह<br />
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से<br />
अकेले में अपने पहचाने का डर<br />
उनके मन में रहता है<br />
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में </p>
<p>अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको<br />
वहाँ हाँफते और कांपते<br />
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए<br />
कभी हमारे तन्हाई पर भी<br />
हँसते हैं दूसरों के साथ<br />
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ<br />
पर हम भी हँसते हैं<br />
साथी है हमारी यह तन्हाई<br />
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में</p>
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		<title>By: komal</title>
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		<pubDate>Sat, 27 Dec 2008 04:29:59 +0000</pubDate>
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		<description>enjoy</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>enjoy</p>
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		<title>By: pankaj</title>
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		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Dec 2008 16:11:43 +0000</pubDate>
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		<description>अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में 

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में 

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में 

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में 

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपने कुछ लोग खो गए<br />
इस शहर की भीड़ में<br />
उनके पते लिखे हैं<br />
बहुत से कागजों पर<br />
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में </p>
<p>किसे ढूंढें और क्यों<br />
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने<br />
किसी से मिलने की वजह<br />
चाहिए हमको<br />
जाएं मिलने तो वह भी<br />
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने<br />
समय निकला जाता है<br />
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में </p>
<p>अपने ही जाल में उलझे लोग<br />
फुरसत नहीं पाते<br />
जीवन की इस भागमभाग से<br />
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव<br />
कब ले सकते हैं दिल से काम<br />
नहीं आता समझ में<br />
खोये हुए है लोग<br />
अपनी समस्याओं की भीड़ में </p>
<p>हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको<br />
जो छोड़ नहीं पाते उसको<br />
डरते हैं अपनी तन्हाई से<br />
जीतने की क्या सोचेंगे वह<br />
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से<br />
अकेले में अपने पहचाने का डर<br />
उनके मन में रहता है<br />
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में </p>
<p>अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको<br />
वहाँ हाँफते और कांपते<br />
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए<br />
कभी हमारे तन्हाई पर भी<br />
हँसते हैं दूसरों के साथ<br />
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ<br />
पर हम भी हँसते हैं<br />
साथी है हमारी यह तन्हाई<br />
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में</p>
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		<title>By: sanjayoscar</title>
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		<dc:creator>sanjayoscar</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Nov 2008 11:17:26 +0000</pubDate>
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		<description>hello dear,

-happy new year , app ka web creation bahoot achha hai.....subject bhi ati sundar hai.............................wondorfull.
-visti at : sanjayoscar.wordpress.com
- see my real life and creatiom. 
-Sanjay Nimavat</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>hello dear,</p>
<p>-happy new year , app ka web creation bahoot achha hai&#8230;..subject bhi ati sundar hai&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..wondorfull.<br />
-visti at : sanjayoscar.wordpress.com<br />
- see my real life and creatiom.<br />
-Sanjay Nimavat</p>
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