कुछ लोग खो गए इस शहर की भीड़ में-व्यंग्य कविता

अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में

—————————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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2.अनंत शब्दयोग
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4 Comments

  1. sanjayoscar
    Posted 02/11/2008 at 11:17 | Permalink

    hello dear,

    -happy new year , app ka web creation bahoot achha hai…..subject bhi ati sundar hai………………………..wondorfull.
    -visti at : sanjayoscar.wordpress.com
    - see my real life and creatiom.
    -Sanjay Nimavat

  2. Posted 19/12/2008 at 16:11 | Permalink

    अपने कुछ लोग खो गए
    इस शहर की भीड़ में
    उनके पते लिखे हैं
    बहुत से कागजों पर
    जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

    किसे ढूंढें और क्यों
    ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
    किसी से मिलने की वजह
    चाहिए हमको
    जाएं मिलने तो वह भी
    उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
    समय निकला जाता है
    जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

    अपने ही जाल में उलझे लोग
    फुरसत नहीं पाते
    जीवन की इस भागमभाग से
    ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
    कब ले सकते हैं दिल से काम
    नहीं आता समझ में
    खोये हुए है लोग
    अपनी समस्याओं की भीड़ में

    हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
    जो छोड़ नहीं पाते उसको
    डरते हैं अपनी तन्हाई से
    जीतने की क्या सोचेंगे वह
    हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
    अकेले में अपने पहचाने का डर
    उनके मन में रहता है
    खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

    अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
    वहाँ हाँफते और कांपते
    जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
    कभी हमारे तन्हाई पर भी
    हँसते हैं दूसरों के साथ
    दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
    पर हम भी हँसते हैं
    साथी है हमारी यह तन्हाई
    भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में

  3. Posted 27/12/2008 at 04:29 | Permalink

    enjoy

  4. Posted 27/12/2008 at 04:30 | Permalink

    अपने कुछ लोग खो गए
    इस शहर की भीड़ में
    उनके पते लिखे हैं
    बहुत से कागजों पर
    जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

    किसे ढूंढें और क्यों
    ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
    किसी से मिलने की वजह
    चाहिए हमको
    जाएं मिलने तो वह भी
    उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
    समय निकला जाता है
    जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

    अपने ही जाल में उलझे लोग
    फुरसत नहीं पाते
    जीवन की इस भागमभाग से
    ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
    कब ले सकते हैं दिल से काम
    नहीं आता समझ में
    खोये हुए है लोग
    अपनी समस्याओं की भीड़ में

    हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
    जो छोड़ नहीं पाते उसको
    डरते हैं अपनी तन्हाई से
    जीतने की क्या सोचेंगे वह
    हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
    अकेले में अपने पहचाने का डर
    उनके मन में रहता है
    खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

    अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
    वहाँ हाँफते और कांपते
    जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
    कभी हमारे तन्हाई पर भी
    हँसते हैं दूसरों के साथ
    दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
    पर हम भी हँसते हैं
    साथी है हमारी यह तन्हाई
    भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में
    —————————

    दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
    कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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    1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
    2.अनंत शब्दयोग
    3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
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    लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

    Tags: साहित्य, हास्य कविता, हिन्दी शायरी, हिन्दी शेर, bharatdeep, hasya kavita, hindi
    3 Responses to “कुछ लोग खो गए इस शहर की भीड़ में-व्यंग्य कविता”
    1 | sanjayoscar

    November 2nd, 2008 at 11:17 am

    hello dear,

    -happy new year , app ka web creation bahoot achha hai…..subject bhi ati sundar hai………………………..wondorfull.
    -visti at : sanjayoscar.wordpress.com
    - see my real life and creatiom.
    -Sanjay Nimavat

    2 | pankaj

    December 19th, 2008 at 4:11 pm

    अपने कुछ लोग खो गए
    इस शहर की भीड़ में
    उनके पते लिखे हैं
    बहुत से कागजों पर
    जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

    किसे ढूंढें और क्यों
    ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
    किसी से मिलने की वजह
    चाहिए हमको
    जाएं मिलने तो वह भी
    उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
    समय निकला जाता है
    जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

    अपने ही जाल में उलझे लोग
    फुरसत नहीं पाते
    जीवन की इस भागमभाग से
    ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
    कब ले सकते हैं दिल से काम
    नहीं आता समझ में
    खोये हुए है लोग
    अपनी समस्याओं की भीड़ में

    हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
    जो छोड़ नहीं पाते उसको
    डरते हैं अपनी तन्हाई से
    जीतने की क्या सोचेंगे वह
    हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
    अकेले में अपने पहचाने का डर
    उनके मन में रहता है
    खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

    अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
    वहाँ हाँफते और कांपते
    जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
    कभी हमारे तन्हाई पर भी
    हँसते हैं दूसरों के साथ
    दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
    पर हम भी हँसते हैं
    साथी है हमारी यह तन्हाई
    भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में


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