मोबाइल और ध्यान-हास्य कविता

फंदेबाज ने राह चलते हुए
रोक लिया और लगा गुस्सा होने
‘दीपक बापू यह क्या बात हुई
हम जब भी तुम्हारा मोबाइल खटखटाते
उसका स्विच आफॅ पाते
स्कूटर की डिग्गी में भला
कहीं ऐसे मोबाइल बंदकर क्यों ले जाते
हम तुम्हारे दोस्त हैं
तुम्हारे फ्लाप ब्लाग अगर हिट हो जायें तो
इसकी खबर पहले सुनने के लिये ही
रोज तुम्हारे मोबाइल की घंटी बजाते
तुम सुबह अपने ब्लाग की दशा
देखकर ही जरूर घर से बाहर जाते
मालुम है मिलते तो वह तुम्हें
हमेशा फ्लाप ही हैं पर
तुम फिर भी कहां बाज आते
तुम्हारी चिंता कम हुई हो
यह जानने के लिये ही
हम तुमसे करते हैं सुबह संपर्क
पर तुम्हार रवैया देख कर खफा हो जाते’

सुनकर बोले महाकवि दीपक बापू
‘हमारे फ्लाप होने की चिंता बहुत हैं तुमको
इसलिये सुबह से शाम तक
मिस काल ही लगाते
कभी काम पड़ता है तभी
करते हो मोबाइल पर बात
पर कभी ब्लाग के बारे में पूछते हो
याद हमें नहीं आता
तुम्हें हमारे मोबाइल बंद होने से अधिक
फिक्र इस बात की है कि
हम क्यों नहीं अपने साथ
राह पर यह संकट भी ले जाते
जिससे चाहकर भी तुम निजात नहीं पाते
पर तुमसे नहीं सीखना मोबाइल का उपयोग
दिमाग में नहीं भरना रोग
याद रखना
सारी दुनिया मानती है कि
भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है
मोबाइल वालों को कहां इसका ज्ञान है
राह पर वाहन चलाते हुए
कितने मोबाइल वाले दूसरे की गाडि़यों में
घुस कर दम तोड़ गये
खबरों के लिये सनसनी छोड़ गये
हमें मोबाइल पर पद्मश्री मिलने की
खबर मिलने की संभावना हो तब भी
रास्ते में उसे बंद ही रखेंगे
कहीं तुम्हारे मिस काल पर आया ध्यान
स्कूटर कहां घुस जाये इसका नहीं रहेगा भान
जिंदा रहते तो नहीं फैला सके लिखकर सनसनी
न मिला सम्मान
घुस गये किसी गाड़ी में
तो बन जायेगी एक खबर हमारे नाम की
फैलायेंगे खबरची तमाम सनसनी
इसलिये मोबाइल को खोलकर साथ नहीं ले जाते

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One Comment

  1. Posted 17/08/2008 at 05:10 | Permalink

    वाह अनायास ही निकला आता है!


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