दूसरे की लड़की के भागने की फिक्र-लघुकथा

‘अरी, सुनती हो 13 नंबर वालों की लड़की भाग गयी’
‘किसके साथ’’
‘अरे, भागी किसके साथ होगी? तुम्हारे अंदर इतनी अक्ल भी नहीं है। किसी लड़के के साथ भाग गयी। बहुत बनती थी न! मेरी लड़की कंप्यूटर सीख रही है। चित्रकारी सीख रही हैं। सब दिखावा था। अब तो उसका मूंह उतरा हुआ है।’
‘अरे, सब दिखावे की बात है। मन ही मन खुश हो रही होगी कि बिना दहेज के लड़की से पीछा छूटा।’
‘लड़की को बहुत छूट दे रखी थी!’
मोहल्ले की औरतें इसी तरह की बातें कर रही थी। 13 नंबर वाली को कुछ पता ही नहीं। वह अपने काम में लगी रही । दो दिन तक वह बाहर नहीं निकली। अब तो कालोनी की उस लाईन के लोगों का सब्र टूट गया था। आखिर तीस नंबर वाली ताई ने सबका प्रतिनिधत्व करने का निर्णय करते हुए उसके पास जाने का निर्णय किया। बड़ी उमर के कारण उनको अपने मान-सम्मान पर किसी खतरे की आशंका नहीं थी।

यह इस ब्लाग दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका की मूल रचना है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। कहीं अन्यत्र प्रकाशन होने की सूचना इस पते पर दें।
दीपक भारतदीप, लेखक एवं संपादक

वह 13 नंबर वाली के पास पहुंची। वह घर का काम कर थकी होने के कारण सो रही थी। 30 नंबर वाली ताई ने उससे कहा-‘बड़ी बुरा किया तुम्हारी लड़की ने। इस तरह माता पिता का अपमान कर घर से नहीं भागना चाहिये था। अरे, तुम क्या उसकी शादी में दहेज देने की हैसियत नहीं रखते क्या? उसने अपने जन्म देने वाले माता पिता की इज्जत का ख्याल नहीं किया।
13 नंबर वाली ने पूछा-‘मेरी लड़की भाग गयी? कब? किसके साथ?
30 नंबर वाली ने कहा-‘अब छिपाने से क्या फायदा? सबको पता चल गया है। पूरे शहर में हवा फैली है। उस दिन रात को 11 बजे तुम्हारी लड़की घर से अकेली सामान लेकर जाते हमने देखी है। भला कोई जवान लड़की अटैची लेकर रात को जाती है दौड़ती हुई घर से जाती है क्या? तुम भी घर से शर्म के मारे दो दिन से बाहर नहीं निकली।
13 नंबर वाली बोली-अच्छा! अब मैं समझी। उस दिन मेरा भाई रात को दस बजे आया था। वह केवल एक घंटे के लिये इस शहर में आया और मेरी लड़की को साथ ले जाने के लिये यहां रुका था। 12 बजे की उसकी ट्रेन थी। इधर भानजी तैयार हो रही थी वह बाहर आटो कराने के लिये सामान सहित निकल गया। वहां उसने मोबाइन कर अपनी भानजी को कहा कि आटो दूर सड़क पर खड़ा है जल्दी आओ। इसलिये वह सामान लेकर दौड़ती हुई गयी। लड़की ननिहाल में लड़का ताऊ के पास गया हुआ हैं घर में अकेली सारा काम कर रही हूं । पहले दोनों थोड़ हाथ बंटाते थे पर अब अकेले होने के कारण दो दिन से बाहर नहीं निकल रही और अब तो निकलूंगी भी नहीं। बच्चों के जाने पर अकेले में उदासी नहीं आयेगी तो क्या जश्न मनाऊंगी?

30 नंबर वाली ताई का चेहरा उतर गया। वह बोली-‘मुझे क्या पता? बीस नंबर वाली बुआ सबसे यही कह रही है।’
13 नंबर वाली ने कहा-‘ बीस नंबर वाली के पास जाऊंगी तो वह कहेगी कि चालीस नंबर वाली चाची कह रही थी। यहां तो सब ऐसे ही हैं कि दूसरों की लड़की घर से भागे और उस पर चर्चा कर मजे लें। मैंने सबको देखा है और सबको इसलिये मना भी करती हूं कि वह समझ लें कि बच्चे सबके हैं ओर किसी में दोष देखने से अपने बच्चे में भी दोष आ सकता है। यहां तो लोग अपनी कम दूसरे की लड़की के लड़की के भागने की फिक्र अधिक करते हैं।’
30 नंबर वाली ताई अपना मूंह लेकर लौट गयी।

10 Comments

  1. Posted 23/07/2008 at 19:11 | Permalink

    बहुत खूब. भारतीय “समाज” का खूब चित्रण किया है आपने.

  2. ranju
    Posted 24/07/2008 at 14:06 | Permalink

    सही चित्रण किया है आज कल दूसरो की फ़िक्र कुछ ज्यादा ही हैं लोगों को बहुत अच्छी लगी मुझे यह कहानी

  3. Posted 29/07/2008 at 14:20 | Permalink

    एक कहावत है दुनिया अपने दुख से कम दुखी पड़ोसी के सुख से ज्यादा दुखी है। मजेदार लेख है। वैसे एक बात समझ नहीं आई आपने आलेख के बीचोबीच ये प्रकाशन अनुमति न होने की चेतावनी क्यों प्रकाशित कर रखी है?

  4. Posted 29/07/2008 at 16:04 | Permalink

    अतुल जी
    कुछ वेब साईट ने चालाकी की है। मेरी पोस्ट बिना कट पेस्ट के अपने यहां खींचने का इंतजाम किया है। उसमें मेरा नाम पोस्ट में न होने के कारण यह पता ही नहीं लगता कि यह किसका लिखा है। इसलिये मैंने यह सब लिखा है। जो साथी ब्लाग लेखक हैं उनके लिये कोई प्रतिबंध नहीं हैं। आखिर आप बतायें इतनी मेहनत के बाद लिखी पोस्ट कोई मेरे नाम के बिना अपने लिये इस्तेमाल करे कैसे सहा जा सकता है। बस, इसलिये लिखा है। एक एक से लडते रहने की बजाय यही बेहतर लगा कि अपनी पोस्ट पर ही ऐसा इंतजाम किया जाये। आशा है आप मेरे उत्तर को सहृदयता पूर्वक स्वीकार करेंगे।
    दीपक भारतदीप

  5. Posted 29/07/2008 at 16:38 | Permalink

    lajabab post badhai swikaar kare.

  6. ahmad salem
    Posted 03/08/2008 at 07:52 | Permalink

    yeh kahani nahin samaaj ki sacchaee hai.

  7. Posted 23/08/2008 at 06:26 | Permalink

    Wakai maza aa gaya padhkar bhai. badi hi sacchi tasveer dikhayi aapne deepak ji. Badhai sweekar karein aur is tarah likhte rahein.
    Regards
    Utpal Kumar
    http://www.brandbihar.com

  8. subhash
    Posted 26/10/2008 at 17:56 | Permalink

    very good story
    samaj ka ekdam sahi chitran kiya hai apne
    thanks for this

  9. islam khan
    Posted 17/04/2009 at 14:18 | Permalink

    WARRY GOOD MY NO 00966557940199

  10. Posted 29/04/2009 at 16:20 | Permalink

    Hi, I would like to know which is the right word in hindi – ग्रामस्थ, or ग्रामस्त? व्यापारस्थ, or व्यापारस्त? Kindly mail me the reply… or post it here.


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