दूसरे के कहने पर मार्ग बदलना नहीं-आलेख

जब अपने किसी लक्ष्य या उद्देश्य का पता हो और उसी मार्ग पर हमारे कदम बढ़ रहे हों तो किसी के कहने पर आकर वहां से हटना निहायत मूर्खता होती है। संभव है जिस व्यक्ति के कहने पर हम अपना मार्ग या लक्ष्य बदल रहे हैं उसे पूरा पता न हो। संभव है कि वह स्वयं एक भटका हुआ राही हो और उसका लक्ष्य पृथक हो और वह नहीं चाहता हो कि कोई उसके पहले अपने गंतव्य तक पहुंच कर विजय समारोह मनाये।

ययह जीवन एक पथ है जिसमें अनेक छोटे और बड़े लक्ष्य तय करते हुए मनुष्य चलता जाता है। कई बार यह मतिभ्रम हो जाता है कि अमुक व्यक्ति हमसे अधिक ज्ञाता है, और पहले से ही इन राहों पर चल रहा है इसलिये उसे अनुभव है इसलिये अगर वह कह रहा है कि मार्ग बदल लो तो बदल लेना चाहिए। कई ऐसे लोग भी होते हैं जो दूसरे व्यक्ति पर हंसते हुए कहते हैं कि‘तुम जिस लक्ष्य पर निकले हो उसी पर मुझे भी जाना है पर तुम्हारा मार्ग लंबा है और मेरा कम, इसलिये मेरे साथ चलो।’ हो सकता है वह सही हो पर उसकी बातों की सत्यता का परीक्षण किये बिना उसके पीछे चलना अविवेक का परिचायक है। संभव है वह आपको उससे भी अधिक लंबे मार्ग पर चलना पड़े जितना पहली राह पर चलना था। यहां कई लोग ज्ञानी दिखते हैं पर होते नहीं और जो होते हैं वह बघारते नहीं। ऐसे में अपनी राह से हटने से पूर्व अन्य लोगों से भी विचार करें।

इस संसार में सर्वज्ञानी कोई नहंी है पर मनुष्य स्वभाव ऐसा ही है कि वह अपने को दूसरे के सामने ज्ञान बघारकर सुख उठाना चाहता है। किसी में यह भाव अधिक होता है तो किसी में कम। जिनमें अधिक होता है वह न केवल स्वयं भटकते हैं कि बल्कि दूसरे को भी भटकाते है। भले ही अपना लक्ष्य देर से मिलने और मार्ग लंबा होने की संभावना हो किसी अन्य के कहने पर आकर उसे छोड़ना नहीं चाहिए।

3 Comments

  1. Posted 17/07/2008 at 19:29 | Permalink

    सत्य वचन दीपक जी

  2. Posted 17/07/2008 at 19:39 | Permalink

    बिल्कुल सही.

  3. Posted 21/07/2008 at 14:45 | Permalink

    सत्य वचन सही..


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