शहर का गुलशन उन्होंने उजाड़ कर
अपने पत्थरों का घर सजा लिया
जब हवाओं ने दिया धोखा तो
साँसों का सिलेंडर लगा लिया
जमाने में लगा दी आग
अब दर्द की महफ़िल सजाते हैं
टिमटिमाते बल्बों की रौशनी के नीचे
अब उस पर बतियाते हैं
कुछ हंसते तो कुछ रोते हैं अमीर वहां
लोगों के घावों को अपनी बातों में सजा लिया
इंसान सभी एक जैसे दिखते हैं
पर कुछ ही होते हैं खुद्दार
बाकी तो बाजार में बिकते हैं
दर्द के धंधेबाजों को किसी से कोई मतलब नहीं
जिसका मिला उसका ही दूकान में सजा लिया
खून की तरह दर्द भी बेचते हैं लोग
कोई बाजार में नहीं देखे इसलिए चेहरा छुपा लिया
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दीपक भारतदीप
One Comment
जब हवाओं ने दिया धोखा तो
साँसों का सिलेंडर लगा लिया ,
bahut badhiya kavita dhanyaawad