सुख अनुभूति की शक्ति भी होना चाहिए-आलेख

 

सुख सभी चाहते हैं पर क्या उसकी कभी अनुभूति कोई कर पाता है? कर पाता है तो कितनी? यह प्रश्न अक्सर मेरे मस्तिष्क में आता है।
सुबह सैर को निकले लोग आपस में बाते कर रहे हैं-‘वह मेरा किरायेदार बहुत बदमाश है। उसकी बीबी ढंग से मकान की सफाई नहीं करती।
इस गर्मी में सुबह कुछ पल चलती ठंडी हवा का अहसास तक वह चारों लोग नहीं कर पा रहे। ताजी हवा  उनके अंदर जा रही है पर वह उसके आनंद की अनुभूति उनसे कोसों दूर है।

एक कह रहा है कि-‘‘यार, आजकल के किरायेदार होते ही ऐसे है। हम इतनी मेहनत के मकान बनवाते हैं और वह लोग थोड़ा पैसा क्या देते हैं जैसे अपने आपको मकान मालिक समझने लगते हैं’।

इस समय वह एक ऐसे पेड़ के पास से निकले जहां गुलाब के फूल लगे हैं।  मगर वह उसकी तरफ देख नहीं पाये। उनका मकान उनका पीछा करता हुआ चल रहा है। पक्षियों के चहचहाने की आवाज उनके कानों में जा रही है पर वह क्या उसे सुनकर उसका सुख क्या उठाते है?

सुबह के जो कीमती पल हैं जिसमें पूरे दिन के लिये अपने तन, मन और विचारों के लिऐ ऊर्जा ऐकत्रित की जा सकती है वह उसे गंवाते जा रहे है। सबके चेहरे बुझे हैं क्योंकि चिंताएं सुबह से ही उनके साथ हो गयी है।

वह पार्क में खड़ा है। मै भी खड़ा होकर सुबह की हवा का आनंद ले रहा हूं।  उससे थोड़ा परिचय है। मैं उसे देखकर मूंह फेरने का प्रयास करता हूं। मुझे वहां तालाब के किनारे शांति से घूमने की इच्छा है। वह मेरे पास आता है।

‘आप उधर ही रहते है’? उसने सवाल किया
‘हां’-मैंने संक्षिप्त जवाब दिया।
‘आप यहां घूमने रोज आते होंगे।’उसने फिर पूछा
मैंने कहा-‘नहीं केवल छुट्टी के दिन आता हूं।’
वह बोला-हां, अच्छा करते हैं। लोग कहते हैं कि सुबह घूमने से लाभ होता है, पर मुझे नहीं लगता। मैं रोज हवा खाने निकलता हूं पर मेरा मन नहीं लगता।’

मैंने कहा-‘‘मैं भी पहले रोज आता था। मुझे शांति मिलती थी। हां, अब योग साधना की वजह से देर हो जाती है और अब नहा धोकर मंदिर जाते हुए कभी कभी यहां आता हूं।’
उसने उत्सुकता से पूछा-‘‘योग साधना से मन को शांति मिलती है।
मैने कहा-‘नहीं! बिल्कुल नहीं।
वह हैरान होकर मुझे देखने लगा। मैंने कहा-‘‘दरअसल मैं पूरे दिन शांति और अशांति और दुःख और सुख से परे हो जाता हूं। अपने काम करता रहता हूं। शांति का पता तो तब चले जब अशांति का अनुभव हो। सुख तो तब लगे जब दुःख ने छू लिया हो। मै तो तब भी विचलित नहीं होता जब बुखार मुझे घेर लेता है। मुझे पता है कि यह थोड़ी देर बाद अपने आप उतर जायेगा।

मै चल पड़ा। वह कहने लगा-‘आजकल गर्मी बहुत है। पानी की परेशानी है।’
मैने उससे कहा-‘तुम गर्मी की चिंता इस समय मत करो। इंतजार करा,े सूर्य का ताप बढ़ने वाला है। अभी तो इस ठंडी हवा को अपने मन में आने की जगह दो।
उसने पूछा-‘‘कैसे?’
मैने कहा-‘कल सुबह साढ़े पांच बजे उधर पार्क में चले जाना। वहां लोग योग साधना करते हैं। वह तुम्हें सिखा देंगे। अगर तुम आना चाहो तो मैं भी कल आ जाऊंगा।’

उसने कहा-‘नहीं रात को हम देर से सोते हैं। हालांकि आठ बजे घर आ जाते हूं, पर आपस में बातें करते हुए रात का एक बज जाता है। सुबह सात बजे से पहले मै उठ नहीं पाता। अभी देखिये आठ बजने को हैं।’
मैं उससे कहना चाहता हूं कि जब रात को इतना सुख उठा चुके हो तो फिर सुबह किस सुख की तलाश में यहां आये हो, पर नहीं कह पाता। सोचा बहस ख्वाख्वाह बढ़ जायेगी।
मैं चलते चलते मंदिर की तरफ मुड़ जाता हूं। उससे और अधिक बात करना मुझे ऐसे  लगा जैसे कि वह मेरे को सुबह ही थका देगा। अपनी थकावट वह अपने साथ लेकर निकला है।

कभी फूलों के पास खड़े होकर खुशबू को सूंघ कर देखें। अगर वह नाक से होती हुई पूरे शरीर में घूमती अनुभव न हो, पक्षियों के चहचहाने की आवाज अगर कान से होकर मस्तिष्क के अंतिम छोर तक जाती न लगे और जब हरे-भरे पेड़ों का दृश्य अगर हृदय को प्रभावित न करता लगे तो समझ लो कि सुख तुम्हारी अनुभूति से परे है।

कई बार मन में आता है कि ‘मेरा अमुक काम हो जाये तो मन को शांति मिलेगी‘ या ‘मेरे को अमुक वस्तु मिल जाये तो जीवन सुखमय हो जायेगा‘। बेकार की सोच है। ऐसा होता तो इस समय धरती पर ही स्वर्ग होता। अगर तुम्हारे अंदर  सुख की अनुभूति शक्ति नहीं है तुम्हें कोई सुखी नहीं बना सकता। नाक से आगे सुंगध, आंख से आगे दृश्य और कान से आगे स्वर अगर नही बढ़ता तो इसका मतलब यह है कि आदमी में सुख अनुभव करने की शक्ति नहीं है। इन अंगों को सफाई करने की आवश्यकता है और प्राणायाम के अलावा कोई इस सुख की अनुभूति करने की शक्ति नहीं पा सकता है।

सुबह उठो और पद्मासन में बैठकर सांस को खींचो। अपनी दृष्टि (ध्यान) भृकुटि पर रखो और सांस धीरे-धीरे लेकर छोड़ते रहो। अनुभव करो कि तुम्हारे तन, मन और विचारों के विकास निकल रहे हैं। सुख की अनुभूति की शक्ति अर्जित करने का यही इकलौता साधन है। 

 

2 Comments

  1. Posted 16/05/2008 at 7:28 pm | Permalink

    सत्य वचन. प्रभावित हुए.

  2. dr parveen chopra
    Posted 17/05/2008 at 2:02 am | Permalink

    कल रात में अपनी सतसंग में मन न लगने वाली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी पढ़ने के बाद …आप की यह पोस्ट पढ़ कर होश ठिकाने आ गये..दीपक जी। बस यही कहने को मन कर रहा है…..जो आज्ञा, गुरूदेव।


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