अभी चल रही प्रतियोगिता में क्रिकेट मैचों के दौरान ‘चीयर गर्ल’ की भूमिका पर अनेक लोग सवाल उठा रहे हैं। कई लोग ऐसे देश की संस्कृति के विरुद्ध तो कई इसे क्रिकेट खेल से इतर बता रहे हैं। मुझे लगता है कि ऐसा करने वाले लोग संभवतः केवल इसमें क्रिकेट को देखना चाहते हैं-शायद यही वजह है कि वह ऐसी आपत्तियां उठा रहे है। मुझे लगता है कि ऐसी आपत्तियां उठाने की कोई वजह नहीं हैं।
मैं बरसों से क्रिकेट खेल देख रहा हूं और अब कभी कभार देखता हूं। पहले लगन के साथ पूरा मैच देखता था पर अब मन में आता है और जब भारत के जीतने की आशा लगती है तब देखता हू। मतलब यह कि पहले जैसा कोई लगाव नहीं है पर अंतर्राष्ट्रीय मैचों में थोड़ी दिलचस्पी रहने के बावजूद मैने एक भी मैच नहंी देखा है। इस बारे में खबरें अक्सर समाचार पत्रों और टीवी पर दिख जातीं है और उनसे नजरे बचाना मुश्किल है। मैच के दौरान नृत्य पेश करने को लेकर अनेक लेख मैने सब जगह देखे हैं और मुझे इसके विरोध का आधार अभी तक मजबूत नहीं दिखाई दिया।
अभी जब भारत ने ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप प्रतियोगिता में विजय हासिल की तो देश में जिस तरह जश्न मनाया गया तो उसी समय मैने यह अपना विचार लिख दिया था कि बाजार इसे भुनाने का प्रयास करेगा क्योंकि उसको यहां अपने लिये कमाई का एक जरिया दिख रहा है। उस प्रतियोगिता में भी ऐसे नृत्य थे और लोगोंं ने इसे देखा पर शायद राष्ट्रप्रेम के जज्बे में इसकी अनदेखी करते रहे। इसके बाद भी देश में एक ट्वंटी-ट्वंटी का मैच हुआ उसमें भी वह सब दिखाया गया-अब चूंकि प्रतियोगिता लंबी है इसी कारण यह चर्चा का विषय बना। मतलब इस प्रतियोगिता के शुरू होने से पहले ही यह सबको पता था कि ऐसा होगा फिर अचानक उसका विरोध शुरू होना मेरी समझ से परे है। दरअसल यह नृत्य कार्यक्रम एक तरह से ट्वंटी-ट्वंटी का हिस्सा बन गया है और देखा जाये तो बिना राष्ट्रप्रेम के जज्बे के इन मैचों के लिये मैदान और टीवी चैनलों पर भीड़ जुटाना शायद बाजार वालों के लिये कठिन होता। फिर इसमें किसी प्रदेश या देश की भावना नहीं जुड़ी और इन टीमों के अंतर्राट्रीय खिलाड़ी होने के बावजूद इन मैचों का कोई खास महत्व नहीं है। ऐसे में बाजार मे मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ जानते हैं कि इन मैचों में अतिरिक्त कुछ जोड़कर ही इनको लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
प्रचार माध्यम भी कई बार टीमों के साथ फिल्मी हीरो और हीरोइन का नाम जोड़कर अप्रत्यक्ष रूप से लोगों को यह संदेश देते नजर आते हैं कि इनके साथ कोई राष्ट्रप्रेम या प्रदेशप्रेम के जज्बात जोड़ना ठीक नहीं होगा। पहले कई अवसरों अंतर्राष्ट्रीय मैचोंे में अनेक विवाद उठ चुके हैं तब देश के नाम की आड़ लेकर मुद्दा उठाया जाता था पर अब इसमें यह संभव नहीं है। यह पूर्णतः मनोरंजक क्रिकेट है और इसमें प्रतिस्पर्घा की भावना खिलाडि़यों में धन को लेकर है न कि देश के नाम को लेकर। कई क्रिकेट प्रेमी इन मैचों की परवाह नहीं कर रहे क्योंकि वह देश के नाम पर होने वाली प्रतिस्पर्धा को देखने के इतने आदी है कि उनको इसमें मजा नहीं आ सकता है।
कुल मिलाकर इन मैचों पर लोग विवाद खड़े कर उसे और अधिक लोकप्रिय बना रहे हैं। जहां तक सार्वजनिक रूप से नृत्य दिखाने का प्रश्न है तो कई स्टेडियमों में इस तरह के कार्यक्रम होते रहते हैं फिर इसे क्रिकेट के साथ दिखाने पर आपत्ति उठाना कोई तार्किक नहीं लगता। क्रिकेट अब दो भागों के बंट चुका है एक है प्रतिस्पर्धात्मक क्रिकेट और दूसरा है मनोरंजक क्रिकेट। यह दूसरा वाला रूप है और इसमे केवल क्रिकेट खेल पर शायद दर्शक जुटाना शायद कठिन होता इसीलिये यह मनोरंजक कार्यक्रम इसका हिस्सा बनाया गया है। जिसे देखना है वह देख रहा है जिसको नहीं देखना वह मूंह फेर रहा है। मेरा आशय यह नहीे कि ऐसा होना ठीक है बल्कि मेरा विचार है कि अपनी विचारधारा किसी पर नहीं थोपना चाहिए। मुझे यह मैच प्रभावित नहीं कर पाता इसलिये नहीं देख रहा और जो देख रहे उन पर कोई आपत्ति व्यक्त करने की इच्छा भी नहीं है। इस तरह के बदलाव देखने की आदत मुझे है और मैं मानता हूं कि आगे चलकर एक दिवसीय और टेस्ट मैचों में भी यह दिखाई दे तो आश्चर्य नहीं होगा।
One Comment
DEEPAK SIR , MAIN AAPKE BAATON SE SEHMAT HOON. YEH CRICKET KA MANORANJAN WALA PEHLU HAI . CHEERLEADERS DANCE ISKA EK HISSA HAI.JAB CRICKET SE AAPATTI NAHI TO IS DANCE SE KYON AAPATTI. JISE DEKHNA HAI DEKHE VARNA NA DEKHE . KOI KISI KO MAZBOOR NAHI KAR RAHA HAI AUR JAHAN TAK CULTURE KA SAAWAL HAI TO SIRF DANCE HI NAHI BALKI CRICKET BHI HAMARI CULTURE KA HISSA NAHI HAI .MERE VICHAAR MEIN TO CRICKET KHELNE, DEKHNE AUR ISKE TV PAR BHI PRASAARAN BANDH HONA CHAYHIYE . CRICKET EK NASHAA HAI. ——– SAY NO TO DRUGS , SAY NO TO CRICKET.