ब्लाग पर लिख गया एक
कमेंट एक पाठक
‘ दीपक बापू जब क्रिकेट खेल फ्लाप हो चला था
तब आपके ब्लाग पर हास्य कविता पढ़ने को
हमारा मन मचला था
अब फिर शुरू हो गया है
शोरशराबे के साथ यह खेल
मन हमारा कंप्यूटर की बजाय
टीवी पर देता है हमको ठेल
मैं तो पढ़ना चाहता हूं
मैच देखते हुए आपकी कविता
पर पत्नी खोल देती है वायलूम तेज
बहने लगती है घर में संघर्ष सरिता
आपकी कविता पढ़ने को
मेरा मन बहुत करता है
पर पूरा घर मैच पर मरता है
आप तो फ्लाप थे पहले ही
हमारा आपका हिट देखने का
सपना लगता है अधूरा ही रहेगा
क्रिकेट अब फिर जमकर रहेगा
आप ही बतायें
कैसे इस मुसीबत से निजात पायें’
पढ़कर हैरान हुए
अपने ब्लाग केा सुपर फ्लाप
देखकर पहले ही चकराये थे
लोग भाग रहे है क्रिकेट की तरफ
इसी कारण हुआ है
यह बद से बदतर हाल
अब यह समझ पाये थे
अपनी टोपी घुमाकर कहें दीपक बापू
‘अपने घर से लड़कर कभी
हमारी हास्य कविता तो पढ़ना भी नहीं
लगे रहो क्रिकेट में
अधिक दिन मन में नहीं बसेगा
25 वर्ष तक रहा हमारे मन भी
अब तो ख्याल भी नहीं आता है
इधर हम भी मुक्त होकर लिख रहे हैं
यह सोचकर कि कोई नहीं पढ़ने वाला है
तो चाहे जैसे लिखते जाओ
कौन रोकने टोकने वाला है
फ्लाप होकर भी हम खुश हैं
क्रिकेट ने किया है बुरा हाल
पर फिर भी चंद पढ़ने वाले बचे हैं
उनके लिये लिखते जा रहे हैं
अफसोस तुमसे हिट नहीं पा रहे हैं
पर तुम फिक्र न करो
हमारा लिखा तो बना रहेगा अंतर्जाल पर
इसलिये जब फिर ऊब जाओ
तो इधर का रुख कर लेना
अपने हिट का कोटा पूरा कर देना
ब्याज में अपने परिवार का भी
हिसाब व्यूज में भर देना
हमारा यह ब्लाग कोई अखबार नहीं है
जो कबाड़ में बिक जायेगा
या कोई किताब नहीं है जो
अल्मारी में लगी चीजों की भीड़ में खो जायेगा
बनी रहेगी इस ब्लाग की काया
जब तक अंतर्जाल की है माया
जिसको हमने भी अभी तक नहीं समझ पाया
भला तुम्हें और क्या समझायें