बड़ी मछली का छोटी पर शासन तो फिर भी रहा

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इस दुनियां को सबसे बड़ा सच रोटी है। आर्थिक ढंग से सोचने वालो ने उनकी इस खोज को एक नई खोज मानते हुए उनकी पूंजी किताब  को गरीबों और मजदूरों का पवित्र ग्रंथ मान लिया । अगर उनकी दृष्टि को देखें तो आदमी जीवन केवल खाने के लिये है और उसके बाद उसे और कुछ नहीं करना चाहिए। खेलो तो रोटी के लिये, लिखो तो रोटी के लिये, गाओ तो रोटी के लिये।  हम अपने प्राचीनतम अध्यात्मिक ज्ञान  की दृष्टि से देखे तों वह माया को सर्वोपरि मानते हैं। यही कारण है कि भारतीय जनमानस में उनका विचार कभी लोकप्रिय नहीं हो पाया।
भारतीय अमीर हो या गरीब,  बूढ़ा हो या जवान स्त्री हो या पुरुष इस बात की परवाह नहीं करते कि भगवान ने उनको क्या दिया है और अपनी सामर्थ्यानुसार  उसकी आराधना करते है।  इसके बावजूद कुछ लोग मायावी विचारों को  अपना आधार बनाकर समाज कल्याण  का काम करते हैं तो केवल इसलिये कि इस धरती पर सत्य के साथ माया को भी  रहना ही है। ऐसे में कुछ लोग हैं जो अपनी रोजी रोटी कमाते हुए बिना किसी की परवाह किये हंुए भक्ति में लगे रहते हैं।  वह किसी प्रकार वैचारिक वाद-विवाद में नहीं पड़कर अपनी एकांत साधना में लगे रहते है।

आजादी के बाद बहुत समय तक यह देश शांति से चलता रहा पर जैसे ही बाजार में आधुनिक और सुविधाजनक सामग्रियों का प्रचलन बढ़ा तो  लोगों के जीवन स्तर का स्वरूप भी बदला और उपभोग की आधुनिक सुविधाओं से जहां परिश्रम की भावना में कमी आयी तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने भी अपना दायरा बढ़ा लिया । ऐसे माया का स्वरूप इस तरह बदल गया कि कहना मुश्किल  है कोई विचारधारा उसका  इस रूप में उसका प्रतिकार कर  सकती है।।  आप पूरे संसार में देख लें गरीबों और किसानों के लिये बहुत सारे अच्छे काम हो रहे है पर फिर भी उनकी परेशानियां कम नहीं हो रहीं है। इसकी वजह यह है कि कार्ल मार्क्स ने और कुछ किया हो या नहीं पर एक वैचारिक अविष्कार तो लोगों को शासन करने के इच्छुक लोगों को  दे ही दिया  कि गरीबों और मजदूरों के हित की बात किये बिना आप यहां लोकप्रिय हो नही  सकते-यानि आप नारे लगाकर शासन करते रहो। अब कोई भी किसी भी विचारधारा को मानने वाला हो वह समाज के निचले तबके के कल्याण की बात अव’य करता है। पूरे विश्व में दबा कुचला समाज कहीं न कही जरूर है। उनके इतिहास भी सब जगह ऐक जैसे है। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है  यह नियम केवल समंदर पर लागू नहीं होता बल्कि आकाश और धरती पर भी लागू होता है। जंगल और शहर  पर भी इसका प्रभाव एक समान परिलक्षित होता है।  किसी भी समंदर या तालाब में देख लें-वहां बड़ी मछलियां संख्या में कम होती हैं पर छोटी मछलियां अधिक होने के बावजूद उनका शिकार बनतीं हैं। जंगल में एक शेर होता है(अब होता है कि नहीं यह जानकारी मुझे भी नहीं-क्योंकि उसकी उपस्थिति मैने केवल चिडियाघर में देखा है) पर बाकी छोटे जानवर उसका शिकार  बनते है। कुल मिलाकर छोटे लोगों की संख्या अधिक होती है पर शासन तो बड़े लोगों का ही होता है।

ऐसे में जब शासन  की बात हो और उसके लिये  छोटे आदमी के सहयोग की  आवश्यकता पड़ती है  तो बडे लोगों के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं रहता कि वह छोटे आदमी के कल्याण की बात करें और उसका सहारा लेकर फिर उस पर शासन चलायें। फिर शासन  जो होता है वह आप देख ही रहे है। शासन  हमेशा छोटे पर होता है और यह   हमारी शिकायत कि छोटों पर ही क्यों सारे नियम  लागू होते हैं कोई मायने नहीं रखता। छोटे होते ही शासित होने के लिये है। हां इस बात पर जरूर संतोष करना चाहिए कि कम से कम छोटे लोगों की दुहाई देकर ही तो यह शासन बनाया जाता है और कम से कम एक दिन तो ऐसा आता है कि जब  हमें अपने पक्ष में बोलता हुआ कोई दिखता है और वह  भी कौन जो समाज में बडा आदमी है। बड़े आदमी छोटे आदमी के हित की बात तो करते हैं यही संतोष का विषय है। कार्ल मार्क्स की विचारधारा आने से पहले  कोई ऐसा नहीं करता था।
 
कार्ल मार्क्स ने दुनियां के जिस मायारूपी सत्य को बताया  उसे हमारे देश के लोग बहुत समय से जानते है।  रोटी यानि माया देह के लिये जरूरी है  फिर भी एक मन है जिसमें इस माया को हराने की क्षमता है अगर उस पर नियंत्रण किया जा सकता है और अगर वह  अनियंत्रित है तो फिर रोटी भी उसका पेट नहीं भर सकती। गरीबों के मसीहा बहुत बन गये है पर अपने मन में दूसरों पर शासन करने की भूख शांत करने के लिये। कहते हैं कि आज की दुनियां विकसित है पर उसका मतलब क्या है? क्या रोटी से पेट भरने की बाद क्या आदमी की भूख खत्म हो जाती है और क्या जिनको आधी रोटी मिलती है वह रात को चैन की नीद सोते नहीं  है?

सच तो यह है कि भारतीय अध्यात्म द्वारा उदघाटित जीवन रहस्यों से छिपने के लिये माया रूपी राक्षस को खड़ा किया गया है ताकि बड़े लोगों का छोटे लोगों पर शासन चलता रहे। अगर सब लोग योगी और ज्ञानी हो जायेंगे तो फिर माया के शिखर पर बैठे लोग किस पर शासन करेंगे। इसलिये ऐसी विचाराधाराओं का विकास किया गया जिससे वह छोटा आदमी दिगभ्रमित होता रहे और कल्पित सुखों की तलाश में भटकता रहे ताकि उस पर नियंत्रण किया जा सके। जितनी तेजी से आधुनिक साधनों का विकास हुआ लोगों में उपभोग की प्रवृति बढ़ी है और वह अध्यात्म से परे हुए  है और इसी कारण आर्थिक और सामाजिक शिखर पर बैठे लोगों को शासन करने की सुविधा मिल गयी है। हां अब उनको गरीबों, मजदूरों, किसानों और शोषितों के हित की बात तो करनी ही पड़ती है। (क्रमशः)

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