अभी मशहूर नहीं हो सकते-हास्य कविता

घर आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू हमें तुम पर
बहुत तरस आता
लिखते हुए बीत गए कई बरस
पर तुम्हारा नाम
कहीं चमक नहीं पाता
केवल लिखने से तुम मशहूर नहीं हो सकते
देखो लाया हूं
मशहूर होने के हजार नुस्खे बताने वाली किताब
मत पूछना पैसों का हिसाब
इसे पढ़कर जानो कुछ
लिखो अपनी रचना में बड़ो-बड़ो के नाम
उनका करो प्रशस्ति गान
हो गयी कृपा किसी की तो हो जायेंगे पौ-बारह
हो जायेगी भीड़ आगे-पीछे
ऐसे तुम लोगों की आंखों के नूर नहीं हो सकते’

सुनकर पहले सोच में पड़े
फिर नाक पर पसरे चश्में से
आंखे नचाते हुए कहैं दीपक बापू
‘कमबख्त, जब भीड़ होगी तो
क्या खाक लिख  पायेंगें
भेड़ की तरह बड़े नाम वाले
हमको भी हांक ले जायेंगे
लाए हो यह मशहूर करने वाली किताब
क्या उसका लेखक मशहूर है
क्या उसमें लिखने का भी शउर है
लिखने के साथ मैनेजमेंट का
रिश्ता कभी हो नहीं सकता
चंद शब्द लिख कर
बाजार में निकल पड़ें बेचने
यह हमसे हो नहीं सकता
जो मशहूर है वह  भी
अपनी किस्मत को रोते
अपने मन का लिखने से दूर होते 
दाम को देखकर लिख पाते
जितना हुक्म देता बोस
उतना ही दिख पाते
हम अपने से दूर कभी हो नहीं सकते
अंतर्जाल पर मिला है खुलकर
लिखने का मौका
रास्ता बदलकर हम अपना
अभियान चूर नहीं कर सकते
जिन्हें तुम बड़े बता रहे हो
उनका बौना चरित्र हम ही देख पाते
भाषा को बेचते है
शब्दों के अर्थ से उनका क्या वास्ता
उनका तो है बस माया का रास्ता
उनका बाद में होता नहीं नाम लेवा
जो अपनी जिंदगी में मशहूर होते
जिनको पाना होता है कुछ
उनका नाम लेकर
वही उनकी बरसी पर रोते 
शब्दों के रचयिता हैं जो
उनके सौदागर नहीं  हो सकते
जिन पर मन होता है
उनकी प्रशंसा में कमी नहीं रखते
पर गुलाम बनकर लिखें
किसी धनवान का गुणगान
यह हमारे लिए संभव नहीं
 दर्शक बनकर खड़े रहना है मंजूर
किसी के इशारे पर खेलें यह संभव नहीं
अभी शब्दों का  भंडार बहुत है लुटाने को
कभी तो छा जायेंगे
भले ही अभी मशहूर नहीं हो सकते
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अभी मशहूर नहीं हो सकते-हास्य कविता

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