सच के परे बहस बेकार-कविता

औरत पर अनाचार का प्रश्न
उठता है कई बार
अभी तक अनुत्तरित है एक प्रश्न
कौन करता है उस पर वार

दुनियां में पुरुष प्रधान समाज
वही परिवार का मुखिया कहलाता है
पर बाहर शेर की तरह दहाड़ने वाला
क्या अपने घर में भी चीख पाता है
अपने दबंग होने के अहसास से
जमाने भर को डराने वाला
क्या घर में अपना रौब रख पाता है
क्या वही करता है स्त्री पर प्रहार

स्त्री को पर्दे में
रहने के लिये बाध्य करने वाला
पुरुष अपने घर में स्त्री द्वारा ही
स्त्री का सताने का
अपने ऊपर लेकर इल्जाम
एक स्त्री की करतूत को
क्या छिपा  नहीं जाता
सारे आरोप अपने ऊपर लेकर
क्या उसे बचा नहीं जाता 
एक स्त्री की करतूत को
पर्दे में क्या छिपा  नहीं  जाता
मान जाता सबके सामने अपनी हार

पुरुष को स्नेह, प्रेम और ममता
देने वाली ममतामयी स्त्री
अपनी बेटी और बेटे में
क्या भेद नहीं कर जाती
फिर जमाने से छिपाती
अपनी बेटी पर लाज की
चादर ओढ़ने वाली
क्या परायी की बेटी 
पर अनाचार नहीं करवाती
अपने पुत्र को क्या
उसके खिलाफ नहीं उकसाती
जब ढहता कोई घर
तब पुरुष पर हंसता जमाना
मजबूरी है पुरुष की
अपने घर की स्त्री की लाज बचाना
और झेलना जमाने के प्रहार

जमाने को दोष देकर
टाल रहे है सब सवालों के जवाब
औरत की भलाई पर बहस करने वाले
नारों की डोली में शब्दों की दुल्हन को
उठा लेकर चल रहे हैं कहार
आज के वार्ताकार हों या चित्रकार
सच से परे करते बहस बेकार

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3 Responses to “सच के परे बहस बेकार-कविता”

  1. दीपक बाबु वो चो… अरे इतनी अच्छी ओर सच्ची बाते करो गे तो वो चो… वाली जिन्दा नही छोडे गी, भाई कविता तो बहुत अच्छी लिखी हे, ओर साथ मे सच भी हे, लेकिन आज के जमाने मे सच चलता नही हे

  2. दीपक जी , कविता पढकर बहुत विचार आये थे ,पर राज भाटिया का कमेंट देख कर लगता है कि यह पोस्ट सार्थक बातें कहने या विचार करने के लिए नही है ।

  3. सुजाता जी
    मैं आपसे माफ्री चाहता हूँ, आपके मन में वेदना हुई यह देखकर मुझे आघात लगा. आप गंभीर लेखिका हैं और जरूरी नहीं सब इस बात को समझते हों. मुझे राज भाटिया की कमेन्ट देखकर थोडी चिंता हुई थी पर मुझे लगा कि वह आपके प्रति सहृदयता का भाव रखते हैं शायद इसलिए ऐसा लिख गए. आपने देखा होगा कि मैं कभी ऐसी कमेन्ट नहीं रखता. जहाँ तक पोस्ट की सार्थकता एक कमेंट से समाप्त हो जाने से की बात है तो आपका यह विचार सही लगता है. कई बार अनेक ब्लोग पर गंभीर पोस्ट देखकर उस पर लगे अगंभीर कमेन्ट ऐसा सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं. मेरा एक आग्रह है जो हो गया उसकी उपेक्षा कर दीजिये.
    दीपक भारतदीप

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