देश के सभी भाषियों में प्रिय है अध्यात्मिक विषय
हिंदी भाषा के कई मशहूर लेखक हुए हैं पर इस भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक है इसलिये कई लेखक कहीं प्रसिद्ध हैं तो अन्य कहीं। हिंदी के शुरूआती दौर में उत्तर प्रदेश और बिहार से कई लेखक प्रसिद्ध हुए पर बाद में अन्य प्रदेशों के भी हिंदी लेखक हुए जिन्होंने अपने परचम फहराया। ऐसे में किसी प्रदेश विशेष के किसी प्रसिद्ध लेखक के कोई विचार हिंदी के पूरे इलाक पर लागू हो जरूरी नहीं है।
आज अंतर्जाल पर एक लेखक का नाम लेकर समस्त हिंदी भाषियों के लिये निंदापरक शब्द लिखे देखकर सोच में पड़ गया। वह लेखक मेरे प्रदेश के नहीं थे इसलिये मुझे पर उन शब्दों का प्रभाव नहीं पड़ा। उन लेखक का हाल ही में देहावसान हुआ और उनके बारे में मुझे पूरी जानकारी अंतर्जाल पर ही उपलब्ध हुई। अनेक अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं ने उनके बारे में मैनें भी पढ़ा। मगर हमारे प्रदेश के लोगों में उनका नाम चर्चित नहीं था और मुझे उनके बारे में ज्ञान न होने का कोई अफसोस भी नहीं है। हिंदी एक व्यापक आधार वाली भाषा है और यह जरूरी नहीं है कि हर लेखक का मुझे भान हो। पिछले पैंतीस साल से लिखते हुए मैने भी बहुत लिखा पर मशहूर नहीं हुआ। कहने को कोई भी कह सकता है कि तुम्हारा स्तर क्या है? ठीक है पर जिन लोगों ने मुझे पढ़ा है वह इसकी सराहना करते है।
अब बात करें हिंदी भाषियों के प्रति निंदापरक शब्दों की। कई लेखक अपने लिखे से इस समाज में परिवर्तन होते देखना चाहते है वह न होता देखकर उनका हताशा होती है। दूसरी बड़ी समस्या है कि हिंदी में संस्कृत से अनुवाद कर जो धार्मिक और साहित्य संबंधी सामग्री प्रकाशित की गयी है उसका आधार व्यापक और अक्षुण्ण है। आज भी जब लोग उनका पढ़ते है तो उसमें नवीनता लगती है। भक्ति काल को हिंदी भाषा का स्वर्ण काल कहा जाता है पर उसकी कोई भी रचना तब तक अनेक लोग समझ नहीं सकते जब तक कोई समझाने वाला न हो। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, रहीम तथा अन्य अनेक महान विभूतियां ऐसी रचनाऐ इस समाज को सौंप गयीं कि उनको विस्मृत करना कठिन है। जीवन के अद्भुत सत्यों और ज्ञान के भरे इस खजाने का खत्म होना कठिन है और इसलिये उनके बाद के लेखकों को वह सम्मान नहीं मिल पाता जो वह चाहते हैं। ऐसे में एक प्रश्न और भी होता है कि बाद के लेखकों ने आखिरी किस तरह की रचनाएं कीं और उनका उद्दंश्य क्या था। हम हिंदी के जिस स्वर्णकाल की बात करते है वह सभी भक्ति के सराबोर थे और इसलिए उन्होने जीवन के मूल तत्व और ज्ञान से परिपूर्ण रचनाएं दी। उनसे पहले महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास भी संस्कृत में अपने पवित्र ग्रंथ इस देश को सौप गये। देखा जाये तो इन महर्षियों की रचनाएं सदाबहार है पर भी जहां तक सम्मान की बात है तो स्वर्णकाल के लेखकों कबीर, मीरा, तुलसी, सूरदास और रहीम ने भी कोई कम सम्मान नहीं पाया और वह इसलिये क्योंकि इनका जीवन और रचनाएं सत्य के निकट थी।
अब बाद के लेखकों को संक्षिप्त विश्लेषण करें। इनमें से कई लोगों ने अपनी रचनाओं से हिंदी की विकास यात्रा का आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में वर्तमान संदर्भों में अच्छी प्रस्तुति होने के बावजूद उसमें अध्यात्मिक पुट नहीं है जो हिंदी भाषियों का सबसे प्रिय विषय रहा है। अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष बालक-बूढ़ा और युवा सभी के अंदर अध्यात्म को लेकर एक जिज्ञासा रहती है और जो उनकी इन्हीं भावनाओं को छूता है वही सम्मान पाता है। कुछ लेखक जिन गरीबों की गरीबी को लेकर कहानियां और कविताएं लिखकर समाज से वाह-वाही चाहते है वह भी अपने अध्यात्म के प्रति सद्भावना रखते है। उनके मुद्दे उठाने वाले कतिपय लेखक इस बात से चिढ़ जाते हैं कि जिन गरीबों के लिये लिखते हैं वह भी उनको पूछा नहीं करते तब उनके लिये निंदापरक शब्द कह देते है। हालांकि लेखक हमेशा सदाशयी होते है और अपनी निंदापरक बात कहकर भूल जाते है पर कुछ लोग उनके इन्हीं शब्दों को प्रकाशित कर यह साबित करना चाहते हैं कि देखो हम उस लेखक के प्रशंसक है। मुझे इस पर आपत्ति नहीं पर मैं यह जरूर कहना चाहता हूं कि हिंदी का क्षेत्र बहुत व्यापक है और इस तरह कुछ लोग जरूर उनकी प्रशंसा कर जायें पर कुछ लोग उस लेखक के प्रति भी कुछ का कुछ सोच सकते हैं और यह मृतकात्मा के प्रति कोई अच्छी बात नहीं है।
फिर आज एक और भी सवाल उठ सकता है कि उन लेखक के जीवित रहते ही उनकी रचनाएं और अन्य विचार क्यों नहीं अंतर्जाल पर रखे ताकि उस पर विचार किया जा सके। आखिर मशहूर कवि के जीते जी उनकी रचनाएं रखकर भी उनका सम्मान किया जा सकता था। अब उनके देहावसान पर लोगों की जिन सात्विक भावनाओं को वह छूना चाहते है उनको जीते जी क्यों नहीं उनकी तरफ मोड़ नहीं सकते थे।
हमारे देश के लोग बहुत भावुक हैं और कुछ लोग उनको नहीं समझ पाते तो यह उनका दोष है। हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषियों में अभी तक अपने देश का अध्यात्म ज्ञान बसा हुआ है इसलिए वह केवल उन्हीं रचनाओं और रचनाकारों को अपने हृदय में स्थान देते है जो जीवन के मूल तत्व के निकट होता है। ऐसे में भी उन लेखकों को अपने जीते जी प्रशंसा नहीं मिल पाती ।
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