चोरी करना पाप है-हास्य व्यंग्य

बचपन में जब प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे तब हमारे टीचर कहते थे कि ”चोरी करना पाप है”। यह बात सभी छात्रों में इस तरह घर गयी थी कोई किसी की चीज सामने भी उठाता तो उसे साथी छात्र चिढ़ाते थे कि चोरी करना पाप है। बहुत समय तक एक ही गलतफहमी रही कि केवल चोरी करना ही पाप है। आज भी जब कोई काम करना होता है तो हम कहते हैं कि”अपना काम करता हूँ कोई चोरी करता हूँ।”
अभी मुझसे कोई कहे कि तुम ब्लोग पर फालतू बातें क्यों लिखते हो तो मैं यही कहूँगा कि’अपने ब्लोग पर लिख रहा हूँ किसी की चोरी थोडे ही कर रहा हूँ।”

अर्थात चोरी को ही एक अपराध मानते हैं। किसी को डाकू कहो, हत्यारा कहो या बेईमान कहो वह सुन लेगा पर अगर वह चोर कहा तो उखड जायेगा। कहीं वह डकैत और हत्या में संलिप्त व्यक्ति होगा तो वह हमला भी कर सकता है। यानि चोरी ही एक संगीन अपराध है और बाकी अपराध तो बहादुरी की श्रेणी में आते हैं। चोरी तो कायरों और कमजोरों का काम है।

आये दिन सुनने को मिलता हैं भीड़ ने अमुक जगह चोर को पीटकर या तो मार डाला या घायल कर दिया। यही भीड़ अगर कोई डकैत अपना काम कर रहा हो या अपहरण के व्यवसाय में लिप्त कोई उनके सामने ही किसी का अपहरण कर रहा हो तब किंकर्तव्यमूढ़ होकर देखती और सोचती है कि ”यह अपराध है कि नहीं या कहीं यह चोरी से कमतर अपराध तो नहीं है।”
कहीं कोई खुलेआम रिश्वत मांग रहा हो तो लोग उसे शिष्टाचार मान कर देते हैं, उन्हें भला कहाँ स्कूल में पढाया गया कि रिश्वत लेना पाप है। इतने सारे घोटाले हो जाते हैं पर उसमें संलिप्त किसी व्यक्ति को मजाल है कि कुछ कह जाये। अक्सर सुनते हैं कि भीड़ के सामने कत्ल हो गया पर कोई गवाही देने को तैयार नहीं होता हैं। कौन तारीखों पर समय खराब करेगा और पता नहीं कातिल कहीं उनका भी कत्ल कर दे-इस भय से लोग आगे नहीं बढ़ते।
हम बहुत समय तक इसी ग़लतफ़हमी में रहे के बस चोरी अपराध है और अब तो लगता है कि यह तो एक मामूली अपराध है पर अब भी इसलिए बड़ा है क्योंकि बाकी के अपराध बहादुर लोगों द्वारा ही किये जाते हैं और उनके सामने उनके अपराध कहना अपने लिए मुसीबत लेना है।

भीड़ में कोई व्यक्ति रास्ता चलते हुए अगर किसी के लिए चिल्ला पड़े किपकडो!पकडो! चोर! चोर!’ तो वहाँ खडे लोग बिना सोचे-समझे उसे पर टूट पड़ेंगे कि चोर ही तो है क्या कर लेगा?’
मतलब यह है कि किसी के मन में अगर किसी से दुश्मनी का भाव निकालना हो तो वह आसानी से राह चलते हुए उसे चोर-चोर कर पकड़ ले तो उसका काम तो गया तमाम। भीड़ भी हमला कर देगी।
मैं सोचता हूँ कि स्कूलों में यह क्यों नहीं पढाते कि’अपने काम के नियत वेतन के अलावा अन्य प्रकार की रिश्वत लेना पाप है’, जिसका पैसा हो उसे ईमानदारी से दो’। ‘जहाँ भी काम करो लगन से करो’, ‘गरीब पर दया करो’ और कभी भी घोटाला मत करो’ आदि।
मान लीजिये इस सब को अपराध मानते हुए अगर कोई स्कूल इस मामले में पहल करेगा तो लोग अपने बच्चों को उस स्कूल से निकाल कर दूसरी जगह भेज देंगे और जो टीचर ऐसी शिक्षा देगा तो बच्चों के अभिभावक उसकी शिकायत प्रिंसिपल से कर नौकरी से निकलवा देंगे। कहेंगे’क्या इस घोर कलियुग में सतयुग के शिक्षा दे रहा है?” बरसों से चला आ रहा है कि ”चोरी करना पाप है’ फिर उसे विस्तार रूप देने की क्या जरूरत है?भला कौन अभिभावक चाहेगा कि उसके बच्चे में रिश्वत और भ्रष्टाचार विरोधी भावनाएं भरी जाएं। चोरी तक ठीक है कौन हम चाहेंगे कि हमारा बच्चा चोरी जैसा छोटा काम करे ।
डकैती और लूट भी कोई काम अपराध नहीं है पर उनको बहादुर करते हैं इसलिए लोग उनसे डरते हैं क्योंकि इसमें हथियारों का इस्तेमाल होता है और आदमी के सामने उसका माल लूटा जाता है। रिश्वत तो सबसे भयंकर अपराध है और इस मामले में देश की छवि विश्व में खराब है पर मजाल है कि कोई किसी भ्रष्ट आदमी को मुहँ पर कोई कह जाये कि तुम रिश्वत लेते हो क्योंकि उसके हाथ में हथियार नहीं बल्कि उसे काबू में रखने की शक्ति होती है। इसलिए आज भी यही सब जगह पढाया और सुनाया जाता है कि ”चोरी करना पाप है”। लोग नहीं जोड़ते पर हम जोड़ते हैं कि बाकी सब माफ़ है। जिस तरह चोर पिट रहे हैं उससे तो यही लगता है।

One Response to “चोरी करना पाप है-हास्य व्यंग्य”

  1. हा हा, जोड़ते रहिये. आखिर कलयुग है.

Leave a Reply