नाम, छद्मनाम और बेनाम-आलेख
नाम दोस्तों के होते हैं और वह पहचान लिए जाते हैं इसलिए जब वह किसी को निपटाना चाहते हैं तो उसकी कमिया किसी और को बता देते हैं. अंतर्जाल पर तो उसकी जरूरत नहीं है. बेनाम हो जाओ और अपने दोस्त को जमकर गालिया दे आओ तो कौन पहचानता है और अधिक परेशान करना हो तो दोस्त का नाम लेकर किसी और से झगडा कर आओ. ईमेल हो या ईमेल का विस्तार ब्लोग दोनों काम आसानी से किये जा सकते हैं.
अंतर्जाल पर तो आजकल ब्लोगरों के अनाम वाले कमेन्ट कम बेनाम अधिक होते जा रहे हैं-यह स्थिति ब्लागस्पाट.कॉम के ब्लोग पर है तो वर्डप्रेस के ब्लोग पर छद्म नाम रखकर यह काम किया जाता है. ब्लोग जगत में हमारे जो दोस्त हैं जिनकी संख्या तीन चार से अधिक नहीं और वह हमारी तरह ही हैं. हाँ कुछ ऐसे दोस्त भी हैं जिनके नाम वह नहीं है जो बताते हैं पर उन्होने कभी हमसे कोई बदतमीजी नहीं की. अब यह कहना मुश्किल है कि वह एक ही है या चार. कभी तो लगता है कि ब्लोगजगत के ही कोई एक या दो प्रतिबद्ध ब्लोगर हैं जो सोचते हैं कि इस बिचारे के पास कोई अधिक कमेन्ट होते हैं नहीं और दो चार नाम से बोर हो जाता होगा इसलिए नाम बदलकर इसका मन बनाए रखें. एक-दो ब्लोगर हैं जिनके बारे में हमारा विश्वास(संदेह नहीं) है कि वह हो सकते हैं.
आम तौर से मैं सीमित मात्रा में ही कमेन्ट लगा पाता हूँ इसलिए मुझे कमेन्ट भी कम मिलते हैं. जो भी मिलते हैं उनको भी मैं ऐसे ही मानता हूँ जैसे कि मित्रों की दुआ सलाम. हाँ कुछ पोस्टें जो बहिर्मुखी (जो ब्लोगिंग के विषयों से हटकर होतीं हैं) उन पर कुछ लोग अपने को रोक नहीं पाते और अपनी बात अधिकार से कह देते हैं और मुझे उन पर विचार करना पड़ता है कि क्या वह मेरे से सहमत हैं या नहीं और उसके अलावा उनमें कोई नयी जानकारी तो नहीं है. बेनामों से वास्ता तब पड़ता है जब ब्लोग स्पॉट पर कोई विवादास्पद पोस्ट हो. वैसे बदतमीजी करने वाले तो नाम लिखकर भी कर गए हैं उनमें दो तो मित्र हो गए हैं पर एक हैं जिसका नाम मेरे जेहन में है और किसी दिन पोस्ट लिखकर उसको निशाने पर लूंगा. अफ़सोस इस बात का है कि उसकी ईमेल मैंने हटा दिए हैं-इस बात की संभावना है कि वह फिर गलती करेगा क्योंकि वह एक कुंठित विद्वान है. जवाबी शाब्दिक प्रहार के उसका कोई इलाज मुझे नजर नहीं आता.
कभी तो लगता है कि कुछ अच्छे ब्लोगर अब बोर होकर अपने को बेनाम हो रहे हैं ताकि हिन्दी ब्लोग जगत में रस बना रहे तो कुछ ऐसे भी हैं जो अच्छी नियमित कमेन्ट लिखते हुए बोर हो गए हैं और अब वह बेनाम होकर कोई नया सुधार लाना चाहते हैं. असल बात यह है कि एग्रीगेटरों के फोरमों पर वही पोस्ट हिट रहती है जो ब्लोग सिर्फ ब्लोग के विषय पर लिखी होती है ऐसे में कुछ ब्लोगर उससे नाखुश हैं और वह कुछ ऐसा चाहते हैं जो उनको बदलाव की तरफ ले जाये.
मैंने जब लिखना शुरू किया था तो मुझे यह पता नहीं था कि कोई कमेन्ट भी यहाँ होती है. इसलिए ब्लोग बनाने के दो महीने तक मैं ऐसे ही लिखता रहा. आज के अपने मुख्य ब्लोग पर मैं सादा हिन्दी फॉण्ट में पोस्ट रख रहा था और यूनिकोड में कुछ कवितायेँ दो ब्लोग पर रख दी थी. एक महिला ब्लोगर ने मुझे कई सन्देश लिखे थे और वह जानना चाहती थी कि मेरी पोस्ट पढाई क्यों नहीं आ रही हैं. मैंने उसे रोमन हिन्दी में ईमेल किये तो वह फिर उसने पूछा कि मैं कौनसे फॉण्ट में लिख रहा हूँ. मैंने उसे अपने दो ब्लोग के पते दिए और बताया कि वहाँ मेरी कवितायेँ हैं आप पढ़ सकतीं है. उसका उत्साहजनक सन्देश आया तब मैंने यूनिकोड के रास्ते पर चलने का फैसला किया पर वह महिला ब्लोगर मुझे दिखाई नहीं दी. कालांतर में मुझे लगा कि वह कोई छद्म नाम था और मुझे बडे प्यार से इस रास्ते ले गया था. उसके बाद मैंने उसे कई ईमेल किये पर जवाब नहीं आया. आज जब कहीं बेनाम शब्द पढता हूँ तो उसका नाम याद आता है. नाम था पर छद्म नाम और वैसे भी छद्म नाम और बेनाम में अंतर क्या है?
अगर वह छद्म नाम था और वह वास्तविक रूप में मेरे सामने आये तो मेरे से सम्मान पाएगा. एक बात और वह महिला नाम था इसलिए मैंने यूनिकोड में लिखना शुरू नहीं किया था बल्कि नारद से मिली धमकी की बाद मैंने एकला चलो के रास्ते पर चलने का निर्णय किया था और यूनिकोड में भी तब तक मेरी तीस पोस्टें मेरे उन ब्लोग पर थी. मतलब मुझे तो लिखना ही था नारद पर आने से मित्रों का मिलना मेरे लिए एक बोनस की तरह रहा और उसका श्रेय उसे छद्म नाम को जाता है.
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एकला चलो –यही सही है बाकि तो कारवां बन जायेगा अपने आप.
चलिए किसी बहने सही आपने लिखना तो जारी रक्खा।
और हाँ कल की उन्मुक्त जी वाली आपकी पोस्ट पर हम टिप्पणी नही कर पा रहे थे। हर बार वो पास वर्ड की गलती बता रहा था। वैसे हम पहले भी आपके उस ब्लॉग पर टिप्पणी करने मे असफल रहे थे ।
आप के लेखों की लोग कद्र करते हैं उनको पढ़ते हैं तभी तो कमेंट्स करते हैं यदि कोई गुमनाम या दूसरे नाम से कमेंट्स कर भी देता है तो आप जैसे बिद्वान को बुरा नहीं मानना चाहिए बल्कि उसे नज़र अंदाज़ कर देना चाहिए आप का ये सोच की कभी मोका आने पर आप उसका जवाब देंगे एक महान लेखक के नाते अच्छी बात नहीं है शहर में जब हाथी निकलता है तो ………..