अंतर्जाल पर हिन्दी में कमाई का प्रश्न-आलेख
अंतर्जाल पर हिन्दी में कमाई से मेरा आशय यह है कि किसी एक ब्लोग लेखक को उस पर अपने पूरे घर खर्च के स्त्रोत निर्माण से है। क्या यह संभव है कि बहुत जल्दी कोई ऐसा ब्लॉग लेखक हम अपने सामने देखें जो इससे आय अर्जित कर अपना नाम कमाए-याद रखने वाली बात यह है कि कोई कितना अच्छा लिखता हो, उसके पास व्यूज और हिट्स हों पर अगर उसके पास आर्थिक परिलब्धि नहीं है तो उसे सफल नहीं माना जा सकता। और बात तो छोडिये हमारे यहाँ संतों और साधुओं के सम्मान का बहुत गुणगान किया जाता है पर अगर कोई अपने शिष्यों से भारी भरकम रकम वसूल न करे तो उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। ऐसा कोई आज से नहीं सदियों से हो रहा है।
अंतर्जाल पर हिन्दी के लेखकों की उज्जावन आर्थिक भविष्य को लेकर कुछ वरिष्ट ब्लॉगर बहुत आशावादी हैं। मैं यह बात कहूँगा कि उन्होने भले ही आर्थिक दृष्टि से वरिष्ठ ब्लोगोरों को अपेक्षित जगह नहीं मिल पाई पर वह किसी दूसरे को ऐसा करते देखना चाहते हैं और उनकी नीयत पर मुझे कोई संदेह भी नहीं हैं। इसमें कितना समय लगेगा यह कहा नहीं जा सकता।
वैसे अगर हम इस समय देश में हिन्दी के लेखकों की बात करें तो मौलिक लेखन में बहुत कम लेखकों को पूरी तरह इस की आय पर निर्भर देखा जा सकता है। कई बढ़िया अनुवाद लेखक भी है और उन्होने कई भाषाओं से अनुवाद कर व्यासायिक संस्थानों को सौंपे हैं पर वह भी बहुत मुश्किल से काम चला रहे हैं। यहाँ हिन्दी में पढ़ना हर कोई चाहता है पर लिखने वालों को आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से केवल उनकी आर्थिक उपलब्धि के आधार पर सम्मान मिलता है इसीलिए हिन्दी के लेखकों को स्वांत सुखाय ही होना पड़ता है।
मैं पिछले डेढ़ साल से यहाँ लिख रहा हूँ और मुझे लगता है की यहाँ भी बाहर से अधिक अच्छी स्थिति बनती नहीं दिखती। अंतर्जाल हो या उसके बाहर हिन्दी के लेखक के लिए संघर्ष करने और उससे मिले अनुभव पर रचनाएँ लिखने के अलावा और कुछ नहीं है। सच तो यह है की हिन्दी के लेखकों की मनोदशा को कोई समझ नहीं पाया। बोलने और लिखने में बहुत फ़र्क होता है। बोलने में कोई दस झूठी कहानी सुना सकता है लिखना सबके बूते का नहीं होता। इसके बावजूद बोलने वाले लिखने वालों के बारे में कई तरह की बकवाद कर जाते हैं।
आपने फिल्मों से जुडे कई लोगों की बातें सुनी होंगीं। कहते हैं यहाँ हिन्दी पटकथा की कमी है। कभी कई पुस्तकों प्रकाशक कहते हैं कि हिन्दी के अच्छे लेखक नहीं मिलते। इन फिल्म वालों को अपने परिवारों में हीरो, हीरोइन और निर्देशक जिनसे जनता में नाम जाता है वह मिल जाते हैं पर पटकथा लेखक नहीं मिलते। आप समझ सकते हैं की सरस्वती की कृपा सब पर नहीं होती। लक्ष्मी की तो सभी पर थोड़ी-बहुत होती हैं-चाहे अमीर हो या गरीब पर सरस्वती का वरदान सबको नहीं होता, इसलिए लक्ष्मीपुत्र अपनी इसी कमज़ोरी को छिपाने के लिए ऐसे बयान देते हैं। सभी जगह यही रोना है की हिन्दी में अच्छे लिखने वाले नहीं मिलते। वजह? आर्थिक दृष्टि से संपन्न लोग चाहते हैं कि सरस्वतीपुत्र अपने कंधे पर झोला लटकाए, नंगे पाँव और फटे कपड़े पहन कर अपनी रचनाएँ उनके द्वार पर लाए और हम उसको कबाड़ के भाव खरीद सकें। इधर जो जोरदार लेखक हैं वह उनकी तरफ देखते भी नहीं है क्योंकि वह लिखने में व्यस्त रहते हैं पर उनके पास अपनी रचनाओं के व्यवसायिक प्रबंधन का कोई ज्ञान नहीं होता। । मैने कई जोरदार लेखक अपने मित्रों में देखे हैं और इन ब्लॉगरों में भी देख रहा हूँ। जिसको अच्छी रचनाओं की ज़रूरत है अगर वह उनके पास जाए तो उसे पता लगे कि किस तरह हिन्दी में लिखा जा रहा है या अगर वह किसी में संभावना देखें और उस पर विनिवेश करें तो वह और भी बेहतर लिख सकते हैं। बात वही अपने देश के लक्ष्मीपुत्र कभी हिन्दी के लेखकों को ऐसा सम्मान नहीं दे सकते।कोई भी लक्ष्मी पुत्र ऐसा नहीं करेगा। अख़बार, टीवी चैनल और अन्य प्रचार माध्यमों पर इन्हीं लक्ष्मीपुत्रों का कब्जा है और उनका आर्तनाद यही है”हिन्दी में अच्छा लिखने वालों की कमी है।’
मैं इसके उलट अपनी बात कहता हूँ कि”हिन्दी भाषा से लूटने के लिए बहुत पैसा बिना प्रयास के मिल रहा है-हिन्दी के नाम पर उसमें अंग्रेजी और उर्दू के शब्द जबरन ठूंस कर अपने कार्यक्रम परोस रहे हैं। वह किसी शुद्ध हिन्दी भाषी लेखक पर क्यों तरस खाएँगे।देश में अंग्रेजी का विरोध बहुत होता है पर अगर अंग्रेज कुछ दिन और रह जाते तो शायद हिन्दी का वजूद ही मिट जाता। इस देश पर पूरी तरह अंग्रेजी स्थापित हो जाती तो क्या यह हिन्दी सिनेमा कोई देखता जो तकनीकी दृष्टि से पश्चिमी देशों के मुक़ाबले बहुत पीछे है। हम सब हालीवूड की फिल्में ही देखते हैं और सच तो यह है की कोई हालीवूड की अच्छी फिल्म हिन्दी में डब होती है तो मैं उसे देखना चाहता हूँ। उनकी कथा और पटकथा इसलिए जानदार होती है क्योंकि उसके लिए वह अच्छा भुगतान करते हैं।
अंतर्जाल पर अब हिन्दी के पाठकों का बाजार नहीं है और जब हम ब्लॉगर इसका निर्माण करेंगे तब भी शायद ही उसका फायदा मिले, क्योंकि हिन्दी के ब्लॉग लेखकों को कौन भारी रकम देना चाहेगा। हो सकता है कि तब अनुवादकों को लाकर यहाँ खड़ा किया जाए और उनसे विदेशी लेखकों की रचनाएँ अनुवाद कराई जाएँ। वैसे भी हम यहाँ शब्दों के उत्पादक नहीं बल्कि उपभोक्ता की तरह हैं। इसकी संभावना कम ही लगती है की भारतीय पृष्ठभूमि पर कहानी, व्यंग्य और आलेख लिखने वालों को कोई धनपति प्रायोजित करना चाहेगा। बाजार की नज़र हम पर है तो उसका आशय यहा कतई नहीं है कि हमसे उसका फायदा होने वाला है बल्कि बाजार यहाँ उपभोक्ता ढूँढ रहा है। डोमेन लेकर वेब साईट बनाने का मतलब यह है कि हमने पैसे का भुगतान किया और आगे भी करेंगे। आख़िर यह सिलसिला कोई हमारे लिए थोड़े ही है।
मैं इस खेल को देख रहा हूँ और लेखक और अर्थशास्त्र का ज्ञान होने के कारण मेरी दृष्टि उस हर चीज़ पर जाती है जिसका मेरे से संबंध होता है। अपने १२ ब्लॉग पर जब व्युज देखता हूँ तो लगता है कि बाजार बन रहा है पर शायद ही इसका मुझे कोई लाभ हो क्योंकि जो लक्ष्मीपुत्र हैं उनकी ताकत बहुत बड़ी है, वैसे मेरे दिमाग़ में अंतर्जाल पर हिन्दी के तीव्र विकास के लिए योजनाएँ हैं पर उन्हें फोकट में बताने का कोई लाभ नहीं है क्योंकि तब भी उसे पढ़कर तत्काल कई लोग उसमें जुट जाएगे और मुझे पूछेंगे भी नहीं।
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बहुत सुलझी हुई और बेबाक टिप्पणी के लिए बधाई लीजिए.
इस मुद्दे पर एक दूसरे कोन से भी तो विचार किया जाना चाहिए. अगर हम ब्लॉग को कमाई का जरिया न मान कर आत्माभिव्यक्ति का एक साधन मात्र समझें तो?
बहुत बढ़िया लेख