सब मिल गया फिर उन्हें और क्या चाहिए-हास्य व्यंग्य

वह क्रिकेट खेले और विश्व कप जीतकर प्रतिष्ठा का वह इतना शिखर छू लें-जो एक आदमी के लिए दिवास्वप्न हो। वह चौके-छक्के मैदान पर लगाकर अपना बैंक बेलेंस बढा लें और अपने रहने के लिए महल बना लें जिसमें आधुनिक जीवन व्यतीत करने की सुविधा हो। उन्हें और क्या चाहिए?

वह फिल्मी दुनिया में करतब दिखाते हुए बादशाह बन जाएं। ऐसे व्यक्तित्व के मालिक हों जिसकी कल्पना देवलोक के देवताओ से ही मिलती हो। इस मायावी दुनिया में जो सुख गिनाए जाते हैं वह सब मिल गए हों। अपने और बेटे की प्रसिद्धि और साथ में खुशहाल परिवार। कोई कमी नहीं। रोज किसी अख़बार या टीवी चैनल पर उनके फिल्मों की चर्चा होती हो। खुद काम करें और बाद में अपने बेटों को भी इस लाइन में लाकर अभिनेता या निर्माता बना दें और वह भी चमकता सितारा हो। अगर बच्चे छोटे हों तो भी उनकी चर्चा मीडिया में होती हो उन्हें और क्या चाहिए।

फिर भी उनकी कुछ मजबूरियाँ हैं। उनको धार्मिक दिखना है और समाज के लोगों के सामने उसका प्रदर्शन करना है और ऐसे नहीं किसी एक धर्म का बल्कि दूसरे धर्म का भी सम्मान करते दिखना है। इस देश में धर्म की ताकत को सब जानते हैं। माया नहीं मिली तो भी सर्वशक्तिमान के घर आदमी जाता है और मिल जाती है तो भी धन्यवाद देने जाता है। सर्वशक्तिमान के घर सब मांगने नहीं जाते कुछ तो केवल अपने हृदय का भक्ति भाव अपना कर्तव्य समझ कर उसे व्यक्त करते हैं तो कुछ यह अपने को दिखाने जाते हैं की हम भक्ति करते हैं।

चलिए सब ठीक। पर एक पशु की बलि। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी का विश्व कप जीता जो कि एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी उस पर तो कप्तान ने कुछ नहीं किया। तब किसी से मन्नत क्यों नहीं मांगी। उसका महत्त्व नहीं मालुम था। वह तो उचट कर लग गयी। उसमें मेहनत नहीं की। सोचा-’यह भी कोई टूर्नामेंट है जो मन्नत मांगें।’
उस जीत में उनका कोई योगदान नहीं था। वह तो देश के लाखों क्रिकेट प्रेमियों की दुआएं थी तो सर्वशक्तिमान उनको विश्व का जितवा दिया।उनके अब इस व्यवहार से कम से कम अब तो ऐसा ही लगता है। जब जीतकर लौटे तो लोगों ने सिर आंखों पर बिठा लिया। वह कहीं भी मत्था टेकने नहीं गए क्योंकि उसमें सर्वशक्तिमान की कोई भूमिका उनको नजर नहीं आयी। कोई पशु बलिदान होने से बच गया।
अपने वरिष्ठ खिलाडियों के सन्यास से कमजोर हो रही आस्ट्रेलिया की टीम को हराने के लिए मन्नत मांगी। वह पूरी हो गयी। उसमें साथी खिलाडियों का कोई योगदान नहीं था क्योंकि वह तो मन्नत की वजह से उनमें शक्ति आ गयी थी। मन्नत के लिए जिस पशु का वध होना था उसकी बदकिस्मती से जीते कोई अपनी किस्मत थोडे थी।

किसका नाम लें और किसका नहीं! बडे हो जाते हैं पर चरित्र बौना ही रहता है। जिन्हें नयी पीढी को अपने कर्म पर विश्वास कर आगे बढ़ने का सन्देश देने का जिम्मा है वही उसे अन्धविश्वास के अँधेरे में धकेल रहे हैं। हर तरह के दरबारों में हाजिरी लगाते हैं। संदेह होता है कि भगवान को खुश कर रहे हैं या कोई और लोग हैं जिनको खुश कर अपना काम चला रहे हैं। इधर टूथपेस्ट, साबुन, कार, और गाडी का प्रचार और उधर हर तरह की दरबार में गुहार! यह तालमेल समझ में नहीं आता।

वैसे भी भक्ति कोई दिखाने की नहीं होती-भक्ति का मतलब है एकांत साधना। जो दिखाते हैं वह ढोंग होता है।आजकल लोग शिक्षकों से पढ़ते हैं पर जीवन के लिए कोई गुरु करते नहीं है इसलिए वह क्रिकेट और फिल्म से जुडे लोगों को अपना आदर्श मान लेते है। वह लोग शिखर पर होते हैं और समाज अपने शिखर पुरुषों का ही अनुकरण करता है। इसलिए बडे लोगों के ढोंग भी समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लोग इसलिए किसी दरबार में नहीं जाते कि वहाँ अपने भक्ति भाव व्यक्त करना है बल्कि उनका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि हम भक्त हैं। ऐसे में किसे दोष दें और किसे नहीं।

7 Responses to “सब मिल गया फिर उन्हें और क्या चाहिए-हास्य व्यंग्य”

  1. दीपक जी आपने बिलकुल सही कहा , आज के समय मे लोगो को देख कर लगता है कि लोगो के पास द्दिगरिया तो बहुत है लेकिन ग्यान का पता नही कि है या नही है, तभी तो आज कई पद्दे लिखे लोग(चाहे वह पी.एच. दी हो या इन्जीनिअर हो ,या उच्च शिच्चित हो) आपको पाचो उन्ग्लियो मे रतन पहने मिल जायेगे जैसे कि रतन पहनने मे सार है बाकी सब बेकार है. आज हर एक बद्दे मन्दिर मे (हमने भगवान को भी बात दिया है) मे वी.आई.पी लाइन अलग होती है शायद वी.आई.पी लोगो की नजर मे भगवान की औकात ५०० या १००० रुपये है ये लोग समझ्ते है कि भगवान इतने मे तो मान ही जायेगा (वैसे कभी कभी मुझे लगता है कि शायद मान भी जाता है. फिर भी अगर नही माना तो अगली बार दुगना कर देन्गे.) क्यो कि ये सब जानते है क्यो कि ये लोग उच्च शिद्दित लोग है . वैसे मुझे लगता है कि दीपक जी आप कभी अकेले मे धोनी से पूद्देगे तो वो भी यही कहेन्गे कि यार बली वली तो सब चूतियाई है . लेकिन क्या करे यार करना परता है.क्योकि—————-

  2. a

  3. ap ke is lekh ko mera man vyangya manne ko sahamat nahin hai ye kewal Actors and players ki alochna matr hai’ please mujhe maph karna

  4. आप सही कह रहे हैं मुझे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि मैं हाथ से लिखता हूँ या हिन्दी टाईप से. अब यहाँ बडे व्यंग्य तो लिख नहीं सकते और सादा फॉण्ट में इंटरनेट पर कुछ दिखेगा नहीं, सीधे लिखता हूँ इसलिए मौलिक रूप से नहीं लिख पाता. अभी पाठक भी अधिक नहीं है जब हो जायेंगे तो दिन में लिख कर शाम को टाईप करूंगा तब आपको भी मजा आयेगा. फिलहाल तो मुझे ऐसे ही मजे-मजे के साथ लिखना है और हो सकता है ऐसी ही हाथ साफ हो जाये.
    दीपक भारतदीप

  5. ap bura man gaye ham ne suna tha :nindak niyre rakhie’ ye bhi suna tha ki lekhak alochna se khush hota hai is liye likh diya tha ; bat ye hai ki 89 se 99 tak nai duniya indore ke :adhbeech: column men likhta tha so thoda itrane laga tha usi hekdi men likh diya tha ;bahut sharminda hun aur muafi chahta hun thanks

  6. बृजमोहन जी मैंने बिलकुल बुरा नहीं माना, पता नहीं आपको ऐसे कैसे लगा. हाँ मुझे एक ख्याल आया जब आप अंग्रेजी टाईप जानते हैं हो क्यों नहीं आप गूगल का यह हिन्दी टूल इस्तेमाल करते. यहाँ टाईप कर कट पेस्ट करिये और अगर आप लिखते हैं तो बहुत काम आयेगा. नीचे उसका लिंक दे रहा हूँ, इसे डेस्कटॉप पर सेव कर लीजिये. आप भी कोई ब्लोग बनाएं और जैसा लिख सकते हैं लिखिए. मैं अभी ऐसे ही काम चला रहा हूँ और आप भी लिखें तो बढिया रहेगा. वैसे आप जिस तरह पढ़ते हैं उससे लगता है कि आप लिखते अच्छे होंगे. आपकी टिप्पणियों में कुछ भी गलत नहीं है. मेरा अपने आलेखों के बारे में भी वही ख्याल है. हो सकता है की आपकी आलोचना से मेरे अन्दर का लेखक जाग जाये. हाँ पर यह सन्देश मैं आपको हिन्दी टूल के इस्तेमाल के आग्रह के साथ भेज रहा हूँ.
    आपका शुभेच्छु
    दीपक भारतदीप
    http://www.google.com/transliterate/indic/

  7. right , i agree 100% with your veiw.

Leave a Reply