इंटरनेट के वायरस यानि आजकल के नये भूत- व्यंग्य
कंप्यूटर के वायरस ऐसे ही लगते हैं जैसे प्रेतात्माएं। पहले जैसे हारर फिल्मों में भूतों द्वारा चीजें उठाने और फेंकने के दृश्य देखते थे तो सोचते थे कहीं ऐसा भी होता है। जब कंप्यूटर पर काम करते थे तो सुनते थे कि कोई वायरस भी होते हैं पर इंटरनेट पर काम करते हुए तो यह वायरस बिलकुल प्रेतात्माओं के तरह लगते हैं। पूरी की पूरी मेहनत से लिखी गयी सामग्री अपने सामने लापता हो जाती हैं पर हम उसे बचा नहीं पाते। आजकल हमारे कंप्यूटर में वायरसों का जमावडा लगता है और हम जब इंटरनेट में दाखिल होते हैं तो मानकर चलते हैं कि इन प्रेतात्माओं से बचना चाहिए पर नहीं बच पाते।
होता यह है हम अपने जीमेल से विभिन्न फोरमों में दाखिल होते हैं और वहाँ कोई ब्लोग पढ़ते हैं तो कमेन्ट लगाते हैं और जब वहाँ से विदा होते हैं तो सब कुछ हवा हो जाता है। जीमेल फिर दोबारा नहीं खुलता। एक दिन एक ब्लोग पर कमेन्ट लगाकर दूसरा ब्लोग खोला और उसके लिए बहुत बड़ी कमेन्ट इंडिक पर लिखी और उसे नीचे (minimise) किया तो पता लगा कि सब कुछ बंद हो गया। बहुत देर इन्तजार किया और फिर कंप्यूटर बंद कर दोबारा चालू किया और हमारे द्वारा लिखा गया कमेन्ट अब अपना अस्तित्व खो चुका था।
इसी तरह जब वर्डप्रेस पर जाकर कभी कभी हम व्युज और कमेन्ट देखने जाते हैं और फिर उसे नीचे रखकर इंडिक टूल पर लिखते हैं और कहीं उसे नीचे रखते हैं तो पता लगा कि सब बंद हो गया। एक बार मनु स्मृति के दो श्लोक जो हमने बहुत मेहनत से टंकित किये थे एक बार हवा हुए तो फिर उनको दुबारा लिखने का साहस नहीं हुआ। कल तो मैंने एक बहुत बडा व्यंग्य लिखा और हवा हो गया। कोई वायरस है और हमारी पोस्टों को लील रहा है। अगर केवल इंडिक टूल खोलकर लिखें और उसी फिर अपने कंप्यूटर में सेव करें तो हो जाता है पर अगर किसी दूसरी वेब साईट से लौटें है तो पता लगता है कि कोई ऐसा वायरस है जो माऊस में घुसा बैठा है और वह फिर इंडिक को नीचे(minimise) करने पर पूरे कंप्यूटर पर कब्जा कर लेता है और तब तक नहीं जाता जब तक उसे बंद न कर लें। मतलब यह कि उस प्रेतात्मा को विचार कर ही काम करना पड़ता है अगर किसी जगह से पढ़ लिख कर लौटे हैं तो पहले सारी प्रोग्राम बन कर फिर इंडिक खोलते हैं क्योंकि ऐसे में वायरस से ख़तरा काम हो जाता है अगर कहीं गेमैल भी खुला पडा है और वर्डप्रेस भी साथ में नीचे (minimise) पडा है तो फिर खतरा लगता है।
अभी कंप्यूटर में वायरसों का बोलबाला है और ऐसे में जब अपने मेहनत से लिखे पर पानी फिरते देखता हूँ तो दुख होता है। दुबारा लिखने का मन भी नहीं करता।
मेरे कंप्यूटर इंजीनीयर ने पहले ही बता दिया था कि इंटरनेट के उपयोग से मेरा कंप्यूटर अक्सर खराब हुआ करेगा। मैंने सोचा कि सावधानी से उपयोग करूंगा तो फिर काहेका खतरा! पर अब लगता है कि उसने सही कहा था। इसलिए अब जब लिखता हूँ तो अपनी हर पोस्ट पर लिखते समय यह भय बना रहता है कि वह कोई वायरस उसे न लेकर उडे। कई बार अगर इंडिक के साथ जीमेल खुले होने पर तो उसे अपने कंप्यूटर में विक्पीडिया के टूल में इसलिए सेव नहीं करता कि कहीं इंडिक को नीचे(minimise) करूं और पता लगा कि हेंग हो गया इसलिए जीमेल से किसी ब्लोग पर जाकर सेव करता हूँ ताकि मेहनत निरर्थक न चली जाये। कंप्यूटर का वायरस ऐसी हालत में किसी भूत-प्रेत से कम नहीं लगता। किसी दूसरी वेव साईट और वेब पेज से लौटने पर यह वायरस हमारे पीछे भूत की तरह चला आता है और फिर जब तक इंटरनेट के सब प्रोग्राम बंद नहीं करते वह बना रहता है। शुरुआती दिनों में इंटरनेट पर जिस मनमानी से इधर-उधर विचरण करते थे अब वह नहीं हो पाता और यह वायरस भूत की तरह अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाता है।
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आप ने सही कहा।इस और गूणीजन ध्यान दे ताकी इस से कुछ तो रक्षा हो सके।
दीपक जी
आप विन्डो का लाइवराईटर इन्स्टाल कर लीजिये, और थोड़ा लिखते ही सेव कर लिया करें, बाकी भूतों का तो मुझे कोई पक्का इलाज नहीं है किसी के पास।