चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता

हाथ में डंडे और मुहँ में नारे
चले हैं संस्कृति बचाने बिचारे
ऐसा लगता है सच्चे हितचिन्तक हैं
सारे समाज की रक्षा के लिए
जंग लड़ने निकले हैं सारे के सारे

संस्कृति और संस्कारों की
पहचान नहीं जानते
अपने अन्दर होना चाहिए
धैर्य के संस्कार
यह भी नहीं मानते
ज़रा ज़रा सी बात पर भौहें तानते
पर समाज बचाने के नाम पर
जुलूस बनाकर चले जाते भ्रम के मारे

बाजार का विस्तार
पूरी दुनिया में सब तरफ हुआ
जजबातों का व्यापार सब जगह
खुले आम हुआ
जिसका नाम विज्ञापन से नहीं होता
विरोधी के कर्मों से सबकी जुबान पर होता
जुलूस होता एक तरफ
दूसरी तरफ लोग जाते सारे

कहैं दीपक बापू
जिससे नफरत हो उससे मुहँ फेर लो
लोगों के मन तुम्हारे काबू में
कभी आ नहीं सकते
जो अक्ल से पैदल उसे समझा नहीं सकते
नाम लेकर तुम अपनी नापसंद का
नाम खुले आम क्यों करते
अपने लोगों के मन में ही
खुशियों की सौगात क्यों नहीं भरते
शहरों पर कब्जे अब अस्त्र-शस्त्र से नहीं
धन की ताकत और अक्ल से सब करते
अगर चाहते हो जंग जीतना तो
अपने मन के किले मजबूत करो
अक्ल के अस्त्र-शस्त्र का लगाओ भण्डार
चतुराई से अपनी मुट्ठी में कर लो लोग सारे
प्यार के भ्रम में वह भटके
मोबाइल के एस एम् एस में अटके
तुम शाश्वत प्रेम का मतलब उन्हें समझाओ
वह हैं अपने मन के अँधेरे के मारे
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3 Responses to “चतुराई से मुट्ठी में कर लो-हास्य कविता”

  1. सही कहा!!! चतुराई से अपनी मुट्ठी में कर लो

  2. बिलकुल सही बात…सीधी बात को कोई नहीं मानेगा…….

    तौर तरीका बदलना ही होगा….

  3. हास्य में ही बिल्कुल ठीक बात कह दी।

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