यह प्यार है बाजार का खेल-कविता साहित्य

जगह-जगह नारे लगेंगे
आज प्यार के नारे
बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे
प्यार का दिवस वही मनाते
जो प्यार का अर्थ संक्षिप्त ही समझ पाते
एक कोई साथी मिल जाये जो
बस हमारा दिल बहलाए
इसी तलाश में वह चले जाते

बदहवास से दौड़ रहे हैं
पार्क, होटल और सड़क पर
चीख रहे हैं
बधाई हो प्रेम दिवस की
पर लगता नहीं शब्दों का
दिल की जुबान से कोई हो वास्ता
बसता है जो खून में प्यार
भला क्या वह सड़क पर नाचता
अगर करे भी कोई प्यार तो
भला होश खो चुके लोग
क्या उसे समझ पाते
प्यार चाहिऐ और दिलदार चाहिए के
नारे लगा रहे
पर अक्ल हो गयी है भीड़ की साथी
कैसे होगी दोस्त और दुश्मन की पहचान
जब बंद है दिमाग से दिल की तरफ
जाने का रास्ता
अँधेरे में वासना का नृत्य करने के लिए
प्यार का ढोंग रचाते
यह प्यार है बाजार का खेल
शाश्वत प्रेम का मतलब
क्या वाह जानेंगे जो
विज्ञापनों के खेल में बहक जाते

3 Comments

  1. Posted 14/02/2008 at 16:02 | Permalink

    क्या पते की बात कही है…इस तरह दौड़-भाग से थौड़े ही प्यार मिल जाता है…मगर कौन समझाये आजकल के बच्चों को…

  2. tarun
    Posted 14/02/2008 at 16:52 | Permalink

    dekho des bharat ki bidambna des wasi chillaye…..
    belen tain2…………………………
    t.v. dekhoo. har chenal pe horh machi hai belen tain.2………..
    rakhi sawat natak rachati…. boy frend se apne ko manwati.kahti happy belen tain………………
    kya bole des wasinyo…ko………kya2 kartab nahi dikhate………….
    apni sanskriti ki to khilli udate……
    videshi phoohrta ko gale lagate……
    wasant panchami na koi yowa manate……..
    14 ferwari……….ko…..belen tain chillate…………..
    kesi bidambna hai ye……………….?

  3. Posted 14/02/2008 at 17:29 | Permalink

    मल्टीनैशनल कंपनियों का किया धरा है…..
    ये बरगर पिज़्ज़ा खाने खिलाने वाले क्या जाने कि प्यार नहीं है बच्चों का खेल….
    इसे यूँ ही राह चलते हर किसी से नहीं किया जा सकता…


Post a Comment

Apki email kabhi bhi kisi aur ko diya nahi jata Required fields are marked *

*
*