हादसों के शहर-कविता

गाँव बढ़ते हुए शहर हो जाते
हादसे उनका एक हिस्सा बन जाते
गाँव से ऊबे लोग
चलें शहर की ओर
हरियाली और शांति की तलाश में
शहरी भी ढूढ़ते कोई प्यारा गाँव
जब हो जाते पत्थर के जंगल में बोर
चलती है उथल-पुथल
जब थमता है कहीं यह सिलसिला तो
झगडे बढ़ जाते

सरहद कोई तय नहीं है
सभी चलते अपनी राह
मिल जाये ढूँढने से
अमन कोई ऐसी शय नहीं है
शहर में सुख हैं यह गाँव का आदमी समझे
गाँव में चैन बसता यह शहरी समझे
गाँव की रात हैं अंधियारी
वहाँ है रोशनी प्यारी
सांस लेते तकलीफ से शहरी
गाँव की आबोहवा लगती उनको दुलारी
बैचैन आदमी इधर से उधर जाते

गाँव की सीमाओं में उकताए लोग
मेलों में शहर जाते
शहर से थके लोग पिकनिक मनाने
गावों की राह पर गाडी भगाते
भागमभाग से हादसे भी हो जाते
गाँव की हादसों की खबर कहाँ पहुंचती
शहर के हादसे
सुर्खियों में जगह बनाते
शायद इसलिए शहर हादसों के शहर भी कहलाते
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