चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए। वे साहन के साह
कविवर रहीम का कहना है कि इस संसार में जिसकी चिंताएं और आकांक्षाएं ख़त्म हो गयीं है। वह निश्चित और बेफिक्र है वह तो मालिकों का भी मालिक है।
चारा चारा जगत में, छाला हित कर लेय
ज्यों रहीम आता लगे, त्यों मृदंग स्वर देय
कविवर रहीम कहते हैं कि भोजन ही इस विश्व में सबको प्यारा है, अत: दूसरों की भूख के लिए कष्ट सहन करना चाहिए। जिस प्रकार मृदंग की थाप पर लगा आटा मधुर स्वर उत्पन्न करता है उसी प्रकार परिश्रम करें भले ही हाथों में छालें हो जाएं।











और इसीलिए कहा जाता है परिश्रम का फल मीठा होता है।
bahut sahi,parishram ke baad grahan kiya bhojan sachhi trupti deta hai.
रहीम जी कुछ भी कहें चाह और चिंता न किसी की गई हैं न जा सकती है ; तुलसी जी को भी कहना पड़ा की चिंता सापिन काह न खाया =चाह और चिंता जाना भी नहीं चाहिए इनके विना जीवन ही बे मानी है चाह आदमी को कुछ करने की प्रेरणा देती है और परिवार की समाज की चिता न करना पलायन वादी वाली बात है =वर्तमान युग में यह कदापि सम्ब्हब नहीं है न किसी युग में रहा है =अजगर करे न चाकरी वाली बात -या चाह गई वाली बात आदमी के मन में नहीं होना चाहिए /काम क्रोध लोभ मद मोह ये सब मानव की स्वभाबिक ब्रत्तियां है /अति मात्रा में बड़कर बीमारी का रूप धारण न करले इस हेतु सचेत रहनाचाहिये =ज्यादा हों अथवा बिल्कुल न हों =मनोचिकित्सक की ज़रूरत है
wow!its nice thank u for u r help
it is very good and interesting poem.it must be appricated.
mujhe parishram par dohe chahiye
thats givess a motivation to us
thank you rahim ji
sach me ye bahut prernadey dohe hai….:)
excellent dohe
thanks a lot !