सहज भाव के बिना नहीं बनता काम-कविता साहित्य
गुस्से में लिखे और बोले
शब्दों को जो देखा अंजाम
जिनके मुहँ से निकले थे
जिनके हाथ से लिखे थे
याद नहीं रहा उनका नाम
मुहँ फेर लिया उनसे
नहीं किया उनको फिर पढ़ने का काम
मुख से निकले शब्द लौटकर नहीं आते
लिखे शब्दों पर कोई पैबंद नहीं लग पाते
जो शब्द गुर्राते हैं
उसने नहीं बनता कोई काम
गुस्से की कोई लंबी उम्र नहीं होती
फिर भी सुबह के भद्दे शब्द
पीछा नहीं छोड़ते चाहे हो जाये शाम
शाम को जो दागे गए
तोप के गोले की तरह दागे गए शब्द
कर देते रात की नींद हराम
बंद मुट्ठी अधिक देर तक
कभी रखी नहीं जा सकती
गुस्से की रचना कभी भी
लंबी उम्र पा नहीं सकती
क्यों न शब्दों की माला
प्रेम के धागे से पिरोई जाये
जिसे धारण करे जो
वही प्रसन्न चित हो जाये
गाली देना आसान है
पर सहज भाव के बिना कभी
नहीं बन सकता कोई काम
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