जैसा हम कहैं वैसा ही दिख-कविता साहित्य

लोगों का समूह एकत्रिक कर
उसमें फूँकने के लिए जजबात
उनका सन्देश है
”तू उधर से इधर आया है तो
इधर जैसा ही हमको दिख
हम जिस भाव कहैं उस भाव बिक”

एक हाथ में झंडा
दूसरे हाथ में डंडा
घुमा रहे
जो दिखे अकेला उसे धमका रहे
”आजा इधर और जैसा हम कहते हैं वैसा दिख”

रंग-बिरंगी दुनिया में से
चुन लिया एक रंग
चल पड़े उसके संग
बाकी रंगों पर पोता अपना रंग
जो चेहरे बचे हैं उनको करते तंग
नीतिशास्त्रों की बातें तो बहुत बडी-बड़ी
न्याय के बोलबाले का दावा
सब बन जाता है एक दिखावा
जब खडा हो जाता सामने अपना प्यारा रंग
सन्देश यही देते
”जिसमें हम कहें उसी रंग में दिख’

कागज़ पर लिखे नियम मंजूर नही
पर उसमें खींची रेखाओं के
इर्द-गिर्द ही सिमटा है उनका काम
उनका सन्देश यही है
”तू रेखा के उस पार से आया
इस पार है हमारी बस्ती
यहाँ है हमारी हस्ती
वर्जित होगी तेरी मस्ती
जब हम कहैं तब ही हंसता दिख”

रीति-रिवाजों के बोझ तले
उखड रही है हर कॉम
जलते खंडहरों पर तापते आग
आज तो जगह-जगह है नीरो
जगह-जगह बस गया है रोम
ऐसे में सन्देश उनका यही है की
”जैसा हम कहें वैसा दिख
भले ही तू दूसरी जगह से आया
पर यहाँ तू हम जैसा दिख
जिस भाव कहैं उसमें तू बिक”

दिल हैं कायर
इसलिए थके-हारे
रास्ते पर चलते लोगों पर बरसते
लोहे के महलों में जो बैठे हैं जो लोग
उनके तो दर्शनों को भी तरसते
दावा यह कि अपनी कॉम के लोगों की
गरीबी किसी भी तरह हटाएँगे
पर सबूत के लिए एक भी अपने रंग के
किसी गरीब को सामने नहीं लायेंगे
उनके कल्याण का नारा लगायेंगे
सन्देश यही है कि
”जैसा हम कहैं वैसा दिख
हम जिस भाव कहैं उस भाव बिक’

पर कब तक चलेगा
यह समाज पुराने वाद और नारों पर
यह नहीं बतलायेंगे
सोच में गहराई नही
नीयत में सफाई नहीं
अपने रास्ते का भी नहीं पता
उन्हें तो चाहिए समाज पर सता
इसलिए बस एक ही नारा
‘जैसा हम कहैं वैसा ही दिख
जिस भाव कहैं उसमें ही बिक”
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