भ्रम कितना भी चमके, सच की तरह नहीं टिकता-हास्य कविता

काला बाजार में अब कुछ नहीं दिखता
सारा काला माल खुले बाजार में बिकता
काला पैसा अब कोई सम्मान की बात नहीं
क्योंकि उस पर भी गोरा रंग चढा दिखता
इज्जतदार खानदान तो अब वही कहलाता
जिसका हर सदस्य बाजार में महंगा बिकता
चलता है समाज उन्हीं के इशारे पर
जिनके हाथ में खूनी खंजर दिखता
धर्म अब वह नहीं जिस पर चलना
जाते लोग वहीं जहाँ स्वर्ग के लिए टिकट बिकता
पर तुम अपना रास्ता नहीं बदलना, चाहे जो हो
भ्रम कितना भी चमके, सच की तरह नहीं टिकता
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