चाणक्य नीति:जिससे कुछ मिलने की आशा हो उससे मधुर व्यवहार करें

1.जिसके मन में पाप है, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जल पर भी शुद्ध नहीं होता.
*यहाँ चाणक्य के कथन का आशय यह है कि बाहरी स्नान करने से मन मन शुद्ध नहीं होता, जब तक मन में पवित्रता नहीं हो.
2.जिसके प्रति सच्चा प्रेम हैं वह दूर रहते हुए भी समीप रहता है। इसके विपरीत जिससे लगाव नहीं है वह आदमी पास रहते हुए भी दूर रहता है। यह एक वास्तविकता है कि मन के लगाव के बिना आत्मीयता का भाव बन ही नहीं सकता है।
3.जिस किसी व्यक्ति से मिलने की संभावना है उससे सदैव मधुर व्यवहार करना चाहिऐ। उदाहरण के लिए मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसके आसपास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है ।
4.अगर तुम्हें लोगों में अपना सम्मान बनाए रखना है तो किसी के सामने किसी की बुराई नहीं करो .

5.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।
6.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ

One Comment

  1. mehhekk
    Posted 02/02/2008 at 19:01 | Permalink

    hmmmmmmmm so great thoughts,but i dont agree with one,hume sabse madhur vyavahar karna chahiye na,jisase kuch milne ki umeed ho ur jisase nahi bhi.


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