सब समान जुटाकर निकले सफर पर
ख़त्म हो गया तो लौटे अपने ही घर
रास्ते बदलते गए, हम चलते गए
कुछ देखा और नहीं भी देखा मगर
चलना जिन्दगी है यह तो है कायदा
तब भी चलना है जब पता न हो डगर
जागते हुए नींद में सपने देखना ठीक
जब तक न देखा हो कड़वे सच का नगर
किसी के आसरे उम्मीद का आकाश टिकाना
बन जाता है कभी-कभी अपने लिए जहर
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sach kaha luch bhi ho,koi bho dagar,chalna zindagi hai. very nice one.
sach kaha kuch bhi ho,koi bho dagar,chalna zindagi hai. very nice one.