जिन्दगी का सफर

सब समान जुटाकर निकले सफर पर
ख़त्म हो गया तो लौटे अपने ही घर
रास्ते बदलते गए, हम चलते गए
कुछ देखा और नहीं भी देखा मगर
चलना जिन्दगी है यह तो है कायदा
तब भी चलना है जब पता न हो डगर
जागते हुए नींद में सपने देखना ठीक
जब तक न देखा हो कड़वे सच का नगर
किसी के आसरे उम्मीद का आकाश टिकाना
बन जाता है कभी-कभी अपने लिए जहर

2 Comments

  1. mehhekk
    Posted 06/01/2008 at 12:24 | Permalink

    sach kaha luch bhi ho,koi bho dagar,chalna zindagi hai. very nice one.

  2. mehhekk
    Posted 06/01/2008 at 12:24 | Permalink

    sach kaha kuch bhi ho,koi bho dagar,chalna zindagi hai. very nice one.


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