संत कबीर वाणी:मूर्ख को समझाना, गाँठ से ज्ञान गंवाना

कोयला भी हो उजला, जरि-जरि हैं सेव
मूरख होय न ऊजला, ज्यों कालर का खेत

संत शिरोमणि कबीरदास ही कहते हैं कि कोयला भी उजला हो जाता है जब भली भांति जल कर उसमें सफदी आ जाती है. परन्तु मूरख का सुधारना उसी प्रकार नहीं होता जैसे ऊसर खेत में बीज नहीं उगते.

मूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठि का जाय
कोयला होय न ऊजला. सौ मन साबुन न लाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ख को उपदेश देने से अपने पास का ज्ञान चला जाता है, और वह मूर्ख तो कोयले के समान है जो सौ मन साबुन से धोने पर भी उजला होने वाला नहीं है.

Leave a Reply