रहीम के दोहे:जहाँ उम्मीद हो वहीं जाएं

तासौं ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस

रीते सरवर पर गए, कैसें बुझे पियास

कवि रहीम कहते हैं कि उसी व्यक्ति के पास जाइये जिससे आशा हो। सूखे तालाब के पास जाने से कभी भी किसी जीव की प्यास नहीं बुझ सकती।

संपादकीय अभिमत- इस दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जिनके पास बहुत सारी दौलत है पर वह किसी को कुछ देना नहीं चाहते। उसी व्यक्ति को कुछ देते हैं जिससे कुछ लाभ होने वाला है। ऐसे लोगों के पास जाने का कोई लाभ नहीं है जो किसी को फूटी कौडी भी मदद के रूप में नहीं दे सकते। देखा जाये तो आजकल दुनिया में ऐसे ही लोगों की बहुतायत है जो केवल स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। कहने को बड़ी-बड़ी बातें करेंगे और हम उनके बारे में जानते हैं कि यह किसी भी हालत में मदद नहीं करने वाला फिर भी उम्मीद करते हैं। जब वक्त आता है तो मुहँ फेर जाते हैं और हमारी वाणी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए हमेशा ऐसे लोगों की संगत करनी चाहिये जो वक्त पर मदद करने वाले हों। जिनके बारे में यकीन है कि वक्त पर मदद नहीं करेगा उसका साथ पहले ही छोड़ देना चाहिए जैसे सूखे तालाब को जलचर छोड़ जाते हैं।

मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव

रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

भावार्थ सच्चा दोस्त वक्त पह ही परखा जाता है जिस प्रकार दही मट्ठे में परिवर्तित होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है वैसे ही सच्चा मित्र विपति में अपने मित्र को बचाने के लिए अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है।

भीत गिरी पाखान की, अररानी वहि ठाम
अब रहीम धोखो यहै, को लागे कही काम

कविवर रहीम कहते हैं कि पाषाण की दीवार ढह गयी, अरर शब्द के साथ उसी स्थान पर गिर गयी, अब यह धोखा है कि कौन व्यक्ति किस काम में लगे.

भावार्थ-यह सारा संसार एक धोखा है कब किसका जीवन नष्ट हो जाये पता नहीं इसलिए अपने दिमाग में यह बात ध्यान रखते हुए ही अपना कर्म करना चाहिए कि किसी को दुख न पहुंचे .

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