वादे करने और भूलने का सिलसिला

पूरे करने होते काम तो
वादे किए ही क्यों जाते
खाने के लिए कसम होतीं हैं
कोई रिश्ते निभाए नहीं जाते
एक दिन हाथ जोड़कर
मिल जाता है बरसों के लिए सिंहासन
इसलिए वादे कर भी
कभी काम नहीं किए जाते
चार दिन पैदल चलकर
कई बरस हो जाता है महल में बसेरा
फ़िर क्यों दें लोगों के घर का फेरा
जिनसे वादे किए नहीं
उन्हें ही साथ लिया जाता है
जिनसे किए उन्हें भूल जाते
कमाल का है हमारा देश
याददाश्त कमजोर होती है आदमी की
पर यहाँ तो उसे भी नहीं पाते
बरसों के वादे करने और भूलने का
अंतहीन सिलसिला कहीं थमते नहीं पाते

One Response to “वादे करने और भूलने का सिलसिला”

  1. वाह । यहां मेरी अभिव्‍यक्ति आपके शव्‍दों व भावो का रूप ले रही है । शुक्रिया ।

    आरंभ

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