रहीम के दोहे:सुख में अंहकार दु:ख में कुंठा न पालें

जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोट
रहिमन फूटें गोट ज्यों, परत दुहुन सुर चोट

कविवर रहीम कहते हैं की जब तक इस जगत में जीवन है तब तक सुख-दुख प्रकट रूप से मिलते रहते हैं. रहीम कहते हैं जैसे–चौसर की गोट को गोट पर मारने से दोनों के सिर पर चोट लगती हैं
भावार्थ-इस जीवन में सुख-दुख दोनों ही लगे रहते हैं इसलिए सुख के समय अंहकार और दुख के समय मन में किसी प्रकार की कुंठा नहीं पालना चाहिए.

ज्यों नाचत कठपुतली, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ

कविवर रहीम कहते हैं की जैसे कठपुतली नाचती है, उसी प्रकार जगत में प्राणी के कर्म उसको नचाते रहते हैं, अपने हाथ में कुछ नहें रहता है. उन पर मनुष्य का वश नहीं चलता.

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One Comment

  1. Posted 13/12/2007 at 09:34 | Permalink

    पढ़कर अच्छा लगा .


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