सुनो सबकी करो मन की

जिनके पास नही कोई ज्ञान
वही पा रहे ज्ञानी का सम्मान
वैद, पुराण और शास्त्र जिन्होंने कभी
समझना तो दूर पढे भी न होंगे
लोगों में करते उनका बखान

कभी सुनकर हैरानी होती है कि
क्या वह सब लिखा है ग्रंथों में
जो सुनते उनका ज्ञान
या कुछ हमसे ही पढने में छूट गया
या चूक गया हमारा ध्यान
कभी कभी तो शक होता है कि
हम कोई और ग्रंथ पढे थे
या तथाकथित ज्ञानियों ने
तथ्य अपने मन से गढे थे
कहीं हम तो नहीं भूल जाते
अपने ही दर्शन का ज्ञान

कहैं दीपक बापू
अपने ही हाथ हैं जिस तरह जगन्नाथ
वैसे ही हमारी बुद्धि है हमारे साथ
किसी के सुने पर इतनी आसान से
यकीन नहीं करते
जब तक जब तक उसकी पुष्टि ना कर लें
खुद ही पढ़कर ग्रंथ करते हैं
प्राप्त करते हैं ज्ञान
कह गए बडे-बुजुर्ग सुनो सबकी
करो वही जो मन रहा है मान
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One Response to “सुनो सबकी करो मन की”

  1. सही है….सबकी सुनते जाओ और अपने मन की करते जाओ…
    सामने वाला भी खुश और हम भी खुश…

    आदमी को वही कार्य करना चाहिए जो उसकी निगाह में सही हो…वर्ना बाद में पछताता फिरेगा कि दूसरे की बातों में आ के गलत किया

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