रहिमन बहु भेषज करत, व्याधि न छांडत साथ
खग मृग बसत अरोग बन, हरि अनाथ के नाथ
कविवर रहीम कहते हैं कि बहुत से पैसों से इलाज करवा लिया परन्तु रोग काया को नहीं छोड़ता. अनेक पशु, पक्षी वन में निरोग तथा स्वस्थ निवास करते हैं. ईश्वर तो अनाथों के भी स्वामी है.
संपादकीय अभिमत-यहाँ रहीम जी बहुत गंभीर चिंतन व्यक्त कर रहे हैं. पशु-पक्षी अपने काम नियम से करते हैं बशर्त है मनुष्य उसे करने दे. वह अपने निर्धारित समय पर उठकर भोजन और पानी ग्रहण करते हैं. उनकी निद्रा, भ्रमण और अन्य कार्यों के समय और नियम निश्चित हैं. मुर्गा सुबह उठकर बांग देता है, गाय सायंकाल अपने समय पर जब घर लौटती हैं उसे ही गोधूलि बेला कहते हैं. सुबह दाने की तलाश में अपने घरोंदों से निकले पक्षियों को अपने छत पर आवाज करते आप देख सकते हैं. इसलिए उन्हें कभी चिकित्सा की आवश्यकता नहीं पड़ती है. तथाकथित विकास और आधुनिकता ने हमें जीवन के नियमों और समय से परे कर दिया है-इस अनियमित दिनचर्या ने ही हमारे जीवन में मानसिक तनाव पैदा किया और जो कि कई बीमारियों को उत्पन्न करता है.
टीवी, कंप्यूटर, कार, फ्रिज़ और वातानुकूलित कमरों की उपलब्धता ने हमें प्राकृति से दूर कर दिया है और इसलिए आज सब जगह अस्पतालों में इतनी भीड़ है कि डाक्टरों को समय नहीं है कि वह सब मरीजों को देख सकें इसलिए जो अधिक धन देते हैं उन्हें ही देखते हैं. अमीर हो या गरीब सबके जीवन प्राकृति से दूर विषैली गैसों के बीच सांस ले रहे हैं. मतलब यह कि हमारे तकलीफों का मुख्य कारण नियम और समय से परे होकर जीवन के लिए साँसे लेना है. इसलिए आज के समय में हमारे महापुरुषों के सन्देश अधिक प्रासंगिक हो गये हैं.