चाणक्य नीति:प्रेम और व्यवहार बराबरी वाले से करें

१.पर्वत तो बहुत हैं पर यह आवश्यक नहीं है की सभी पर माणिक्य उपलब्ध हो और यह भी जरूरी नहीं है की प्रत्येक हाथी के मस्तक में गजमुक्ता (एक प्रकार का काला मोती )हो. प्रत्येक वन में चन्दन वृक्ष उपलब्ध हो यह भी जरूरी नहीं है.

संकलन करता का अभिमत-आचार्य चाणक्य के इस कथन को समझें तो यह जरूरी नहीं है कि कुछ लोगों में उनके व्यवसाय, शिक्षा और या किसी अन्य विषय में समानता होते हुए भी गुण एक समान हो. धनी हो पर दानी हो जरूरी नहीं है. ज्ञानी हो तो उसमें विनम्रता भी हो और सुन्दर होने के साथ उसकी वाणी भी मीठी हो यह जरूरी नहीं है. हम अपने पास ऐसे लोग देखते होंगे जिनके पास ऊंची उपाधियाँ और पद हैं पर उनके अनुसार उनमें योग्यता नहीं है और अगर हम उनसे कोई विशेष गुण होने कि अपेक्षा करते हैं तो जरूरी नहीं के वह पूरी हो.

२.मूर्खता कष्टकारी होती है और इसके साथ युवावस्था में भी कष्ट उठाने पड़ते हैं पर सबसे अधिक बुरा है जब किसी व्यक्ति के घर विवशता के के कारण ठहरना पड़े.

३.प्रेम और व्यवहार सदैव ही समान स्तर के व्यक्ति व परिवार से रखना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसा नहीं करते उन्हें समाज में अपमान और कष्ट और अपमान झेलने पड़ते हैं.

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