गुरूजी ने चेले से कहा
‘लोग रामजी का नाम तो
चाहे जब लेते हैं
अपने मन में रावण जैसे
चरित्र को ही जगह देते हैं
रामजी के मंदिर तो बहुत हैं
पर हमें तो सभी जगह
रावण का अस्तित्व नजर आता
समझ में नहीं आता आगे हम कहाँ जायेंगे”
चेले ने कहा
‘गुरूजी मुझसे कह दिया पर
कहीं और मत कहना
गजब हो जायेगा वरना
आपके प्रवचनों में तो
बस अपने घर से
पत्नी द्वारा सताए
और मार-मारकर भगाए
कुछ आदमी ही आते हैं
पत्नी भक्त तो अपने पड़ोस वाले
गुरु के दर्शन करने जाते हैं
अगर आपकी बात
आपके भक्तों को पता चली तो
सब वहीं डेरा जमायेंगे
वह ढूंढते हैं उस किसी कुशल रावण को
जो उनको ऐश करा सके
कहते आप ज़रूर हैं पर
आपने भी रावण कहां देखा है
फ़िर भला उसका
पता हम किस किसको बताएँगे
वैसे तो भक्ति की आड़ में कई
अपने धंधे चल रहे हैं
पर कलियुग में कहीं
सतयुग जैसा खेल शुरू भी करें
तो रावण तो कई मिल जायेंगे
इस युग में कोई असली तो क्या
नकली जंग भी संभव नहीं
पर फिरौती देकर अपनी भार्या को छुडायें
ऐसे लोग कहाँ से लायेंगे
आप चाहे रावण को कितना भी याद रखो
पर लोगों को रामजी का नाम ही जपायेंगे
नहीं तो आप और आपके गुरुभक्त चेले
बुरी तरह पछताएँगे
जो धंधे चल रहे हैं वह भी बंद हो जायेंगे.’