गुरुनानक जी का सन्देश आज भी प्रासंगिक
आज गुरु नानक जी का जन्मदिन है। इसे प्रकाश पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। मैं जब अपने देश के महापुरुषों के बारे में जब कोई अपना विचार व्यक्त करता हूँ तो उसमें आमतौर से जो बातें कहीं जातीं है उससे अलग हटकर इसलिए लिख पाता हूँ क्योंकि मुझे लगता है की जो आज तक उनके बारे में लिखा जाता है वह एकदम सतही हैं। गुरुनानक देव जी के बारे में मेरा स्पष्ट मत है कि वह भारतीय आध्यात्म के वह स्तंभ है जिन्होंने अपना प्रकाश पूरे विश्व में फैलाया।
श्री गुरुनानक देव जी को सिख धर्म का संस्थापक माना जाता है। आम तौर से कहा जाता है की सिख धर्म का प्रादुर्भाव हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए हुआ है यह सत्य है पर इसका आशय यह नहीं है कि केवल तलवार के आक्रमण से इसकी रक्षा के लिए हुआ है क्योंकि हमारी दुश्मन दूसरों की तलवार कम हमारे अंधविश्वास रूधियाँ अधिक हैं। जिस समय इस देश और धर्म पर तलवार से आक्रमण हुए और उसमें यह देश पराजित हुआ तो केवल शत्रुओं की वीरता से नहीं अपने अंध विश्वास से उपजी कायरता से हारा। शत्रु अपनी तलवार लेकर चला आ रहा था और यहाँ उसका सामना करने के लिए तलवार उठाने के बजाय यज्_ंज-हवं किये जाते थे-इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ हैं जो देश में फैले अंधविश्वास को दर्शातीं हैं। वीरता की कमी नहीं थी पर अंधविश्वास और अति आत्मविश्वास की वजह से कोई रणनीति नहीं बनी और न आपस में एकता हुई और यह देश धीरे-धीरे गुलामी की जंजीरों में जकड़ता गया। अगर आप समझदार लोगों से बाते करें तो वह हिन्दू धर्म को बाहर से कम अन्दर से अधिक खतरा बताते हैं और वह है अंधविश्वास और रूढ़वादिता। पूज्य गुरूनानक जी ने हमेशा ही हिन्दू धर्म में फैले अंधविश्वासों, कुरीतियों, और दोषपूर्ण परंपराओं का विरोध किया।
उनके बारे में कई काथाएं प्रचलित हैं और जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद आती है वह यह कि एक बार गुरुनानक जी घूमते हुए गंगा के किनारे पहुंच गए और उसमे डुबकी लगाने लगे। तब उन्होने देखा कि कुछ लोग अपने अंजुली में पानी भरकर आकाश की तरह उसका रुख कर नीचे गिराने लगे। तब गुरुनानक जी ने एक आदमी से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि ‘अपने पितरों को पानी दे रहे हैं’।
इस महान संत ने थोडी भी देरी नहीं कि और अपने हाथ में पानी लेकर पश्चिम दिशा की तरफ पानी देने लगे तो वहाँ खडे लोग हंसने लगे और उनको बताया कि वह गलत कर रहे हैं तो इस मस्तमौला संत ने उत्तर दिया कि” मैं अपने खेतों को पानी दे रहा हूँ। जब आकाश में स्थित धरती से इतनी अधिक दूर तुम्हारे पितरों तक यह जल पहुंच रहा है तो क्या इस धरती पर स्थित मेरे खेतों तक नहीं पहुंचेगा।”
श्री गुरुनानक जी के दर्शन को इस घटना से समझा जा सकता है। जिस समय उनका जन्म हुआ उस समय इस देश में राजनीतिक और सामाजिक रूप से संक्रमण काल था और भारतीय आध्यात्म सत्य के निकट होते हुए भी विस्मृत हो रहा था और उसकी रक्षा के लिए अंधविश्वासों और रूढियों की स्थापना हो रही थी और उसके उल्टे परिणाम सामने आ रहे थे, विदेशी लोग इन्हीं अंधविश्वासों और रूढियों को अतार्किक और कठिन बताकर अपने मायावी सिद्धांत इसे देश पर थोपते जा रहे थे। श्री गुरुनानक जी बाल्यकाल से आध्यात्म प्रवृति के थे और उन्हें सदा ही इन अंधविश्वासों और रूढियों में दिलचस्पी नहीं थी। मैं सिख नहीं हूँ पर मेरी नानी मुझे कई बार गुरुद्वारे ले जाती और उनके चरित्र के बारे में सुनाती और हम मेरे हृदय में इष्ट के रूप में विधमान हो गए। मैं जब भी अपने घर में उनकी तस्वीर देखता हूँ मेरा मन प्रुफुल्लित हो उठता है। मैं अपने देश के आध्यात्म के प्रभावी होने की बात लिखता हूँ तो उसमें पूज्य गुरुनानक जी के अमृत वचनों से रचा गया दर्शन भी शामिल रहता है। और मेरा मानना है कि जब तक हमारा समाज गुरुनानक जी का सन्देश मानकर अंधविश्वास, रूढ़वादिता, छूआछूत, जाति-पाति और आर्थिक आधार पर भेदभाव जैसी प्रवृतियों से नहीं निकलेगा तब तक वह विजेता नहीं बन सकेगा। खतरे बाहर से काम अन्दर से अधिक हैं। उनका मुकाबाला आत्मिक और वैचारिक स्तर पर हृदय को स्वच्छ और पवित्र बनाकार ही किया जा सकता है। इस देश के धर्म की रक्षा करने और पूरे विश्व में आध्यात्म का प्रकाश बिखेरने वाले ऐसे महान और पवित्र व्यक्तित्व के स्वामी श्री गुरुनानक जी को मेरा नमन।
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दीपक जी गुरू नानक देव जी के बारे में लिखा आप का लेख बहुत शिक्षाप्रद व ज्ञान वर्धन है। पढ़ कर अच्छा लगा। आप को गुरु नानक देव जी के पावन पर्व की बहुत-बहुत बधाई।