वह भगवान् बुद्ध की प्रतिमा से क्यों डरते हैं
चीन की सेना ने भारतीय सीमा में घुसकर बुद्ध के प्रतिमा नष्ट की है ऐसी खबर अख़बार में छपी हैं। क्योंकि दोनों के बीच अभी कोई सीमांकन नहीं हुआ है इसलिए ऐसी घुसपैठ हो जाती है ऐसा सरकार का मानना है। मैं यहाँ घुसपैठ की बात नहीं कर रहा क्योंकि उसका कोई आधार प्रमाणिक नहीं है पर मैं भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड जाने की खबरों को देखकर हैरान हो जाता हूँ। यह कोई पहली घटना नहीं है और अफगानिस्तान के बामियान शहर में तो उनकी पहाड़ को काटकर बनायी गयी प्रतिमा को तोपों से उड़ाया गया था। अब पिछले दिनों पाकिस्तान के सीमाप्रान्त में भी भगवान बुद्ध की प्रतिमा को तोडा गया था और उसके पीछे आतंकवादियों का हाथ माना गया था। अब जब चीनी सेना के द्वारा इस तरह प्रतिमा तोड जाने की खबर आयी तो हैरानी हुई क्योंकि जब बामियान में बुद्ध की प्रतिमा तोडी जा रही थी तो बुद्ध धर्म का बाहुल्य होने से लोगों को यह अपेक्षा थी की चीन उसका विरोध करेगा पर उसने नहीं किया पर अब समझ में आ रहा है की लाल रंग में रंगा चीन भी उसी तरह बुद्ध के दर्शन ने भय खाता है जैसे आतंकवादी।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं से वह क्यों घबडा रहे हैं? भगवान बुद्ध के दर्शन से वह लोग क्यों खौफ खा रहे हैं? अगर वह ऐसा प्रचार के लिए कर रहे हैं तो इसके लिए और भी तरीके हो सकते हैं। दरअसल बुद्ध का दर्शन कहता है कि सब लोग समान है और किसी को हिंसा में लिप्त नहीं होना चाहिए। उन्हें अहिंसा का प्रवर्तक भी माना जाता है। जब आदमी के मन में अहिंसा का भाव आता है तो वह दुनिया भर के पाप, लोभ। लालच और चाटुकारिता की प्रवृति से दूर हो जाता है और केवल निरंकार ईश्वर की आराधना में लग जाता है।
एक समय बुद्ध धर्म अफगानिस्तान तक फैला था पर उसकी सीमा के बाहर रहने वाले मठाधीशों को यह मंजूर नहीं था। अधिकतर हमले मध्य एशिया से हुए जहाँ प्रकृति की दया भारत से कम ही है। और इतिहासकार मानते हैं कि वहाँ की गरीबी और अशिक्षा से भरे समाज के लोगों पर राज करना आसान नहीं है इसलिए उन्हें युद्धों में व्यस्त करने के लिए वहाँ के राजाओं ने भारत भूमि पर हमले किये। जब यहाँ शांति के पाठ पढे लोगों की ताकत देखी तो अपने लोगों को अशांति और हिंसा का पाठ पढाकर युद्ध के लिए यहाँ लाये।
फिर इस देश के लोग जिनके पास अपने भगवान अनेक स्वरूपों में ह्रदय में इस क़द्र मौजूद हैं और राज्य किसी का भी हो उसके अधिपति को भगवान मानने को तैयार नहीं हुए तो उनकी मूर्तियाँ तोडी गयीं। अफगानिस्तान में बुद्ध मठों में रहने वाले भिक्षु धीरे-धीरे पलायन कर गए और आक्रमणकारी और आगे बढ़ते रहे। उन्होने इस देश पर हमले किये पर इस देश की आत्मा को नहीं जीत सके। वह मिट गए पर उनकी वर्तमान पीढियां अब भी उस काम को अंजाम दे रहीं हैं। तात्पर्य यही है कि जिसके लिए हम कहते हैं उसे भगवान मानो। लाल रंग से रंगा चीन भी अपने लाल पुरुष भारत में पूजते देखना चाहता है। यह संभव नहीं है।
जिन लोगों की दाल नहीं गली और बरसों से भारत में ही प्रज्वलित धर्म की ज्योति को कोई बुझा नहीं पाया तो वह मूर्तियों पर हमला करते हैं। सच तो यह है कि मूर्तिपूजा का विरोध दो ही कारणों से होता है एक तो अज्ञान की वजह से दूसरा अहंकार की वजह से। जो मूर्ति पूजा करते हैं वह भी जानते हैं कि मूर्ति तो किसी प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तु से बनीं हुई है पर उसमें वह ध्यान लगाकर अपना मन साफ करने में सफल रहते हैं। मेरा मानना है कि मूर्ति पूजा अगर शुद्ध मन से की जाये तो वह भी ध्यान जैसे लाभ देती है।
बात हम बुद्ध प्रतिमाओं को तोड़ने की कर रहे हैं तो उनके विरोधी अपने मन में व्याप्त अज्ञानता और अंहकार के वशीभूत होकर निराशा के घनघोर अंधेरों में रहते हैं। उन्हें अपने राज्य में भूखे और नंगों से बड़ा डर लगता है और कहीं वह जीवन का सत्य जानकर उनसे विमुख न हो जाएं उन्हें ऐसी प्रतिमाओं को तोड़ने के लिए उकसाते हैं। वह गरीबी और शोषित को धन और समाज में सम्मान दिलाने का भ्रम दिखाकर उसे संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं और फिर अपना राज्य कायम करते हैं। फिर भी उनका मन नहीं भरता और हर पल उन्हें कोई न कोई चीज अपने लोगों के सामने एक दुश्मन की तरह रखनी पड़ती है ताकि वह उनका राज्य बनाए रखें।
उनका अज्ञान और अन्धकार उन्हें हमेशा जीवन में त्रस्त किये रहता है। उन्हें पता ही नहीं प्रतिमा टूटने से भगवान बुद्ध द्वारा खोजा गया सच टूट नहीं सकता। विश्व के लोगों के मन में जो उनकी प्रतिमा है उसे कोई तोड़ नहीं सकता। यह उनके अज्ञान का प्रतीक है और उन्हें यह अंहकार है कि उनकी प्रतिमा टूटने से लोग उनको भूल जायेंगे और वह भी नहीं होता तो भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं की और प्रतिमाओं को तोड़ने लगती हैं क्योंकि वह चाहे कुछ भी कर लें न वह खुद न उनके नकली भगवान उन जैसे नहीं बन सकते यह सच उन्हें और डरा देता है और वह और उग्र हो जाते हैं।
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बुद्ध की प्रतिमाएँ तोड़ना बहुत दुखद है ।
घुघूती बासूती