उस दिन मैं एक टीवी चैनल पर लाफ्टर शो में एक पाकिस्तानी कलाकार के प्रदर्शन को देखकर यह सोच रहा था कि अब हमारे देश में हास्य के नाम पर पुराने कलाकारों की मजाक उडाना कार्यक्रमों की सफलता के लिए जरूरी होता जा रहा है। उस हास्य कलाकार ने उस दिन शास्त्रीय संगीत को अपना लक्ष्य बना लिया था और यकीनन वह जिस तरह पेश कर रहा था उससे जाहिर हो रहा था कि वह शास्त्रीय सगीत का क ख, भी नहीं जानता होगा और न कभी ऐसे कार्यक्रमों में गया होगा। बोलना सीखते ही भारत चला आया होगा जहाँ के सीरियल निर्माताओं और निर्देशकों को अपने देश में हास्य कलाकारों के नाम पर बदतमीजी करने वाले लोग चाहिए।
सबसे पहले उसने बिना किसी नाम लिए एक शराबी का काल्पनिक किस्सा सुनाया जो कि एक शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में पीकर गया। वहाँ कोई महिला शास्त्रीय संगीत पेश कर रही थी और बहुत देर तक ‘पिया’शब्द ही दोहराती रही। इससे वह क्षुब्ध हो गया. और चिल्लाने लगा-”पिया, तो क्या, अपने बाप का पिया, तुमने मेरा पूरा नशा उतर दिया। पर कोई बात नहीं ऐसे समय के लिए मैं सौ ग्राम हमेशा अपने पास रखता हूँ।”
दूसरा उसने पाकिस्तान के गजल गायक गुलाम अली पर सुनाया। कहने लगा कि”गुलाम अली साहब अपना तानपूरा अपने साथ साइड में ऐसे रखते हैं जैसे किसी का उठाकर लाये हों। गाते हैं तो लगता है कि श्रोताओं की कोई उनको कोई परवाह ही नहीं है अपने अपने आप में ही मस्त रहते हैं। बार-बार कहते हैं’क्या गजल है, क्या गजल है’ अरे भाई हम कहते हैं कि तुम सुनाओ तो ही गजल हम तय करेंगे कि वह कैसी है। ”
उसने भारत के किसी कलाकार का नाम नहीं लिया यह उसकी व्यावसायिक चतुराई का प्रतीक है और पाकिस्तान के कलाकार का नाम लिया और सोचा कि अपने देश के कलाकार का मजाक उडाने का अधिकार है। मैं यहाँ किसी प्रकार से उसके पाकिस्तानी होने को लेकर आपति नहीं उठा रहा क्योंकि इससे मूल विषय का कोई संबंध नहीं है। मैं तो इन नये कलाकारों की बात कर रहा हूँ जिनके पास अपनी कोई कला और उसकी शैली नहीं है। यही कारण है कि उनकी कोई अपनी छबि नहीं है. मीडिया जबरदस्ती कुछ लोगों को स्तर बताता है पर मैं उनकी चर्चा कहीं भीड़ में नहीं सुनता. अभी एक फिल्म में मनोजकुमार की मजाक उडाई गयी उस पर उन्हें दुख पहुंचा तब बस एक खबर देकर सब चैनल चुप बैठ गए और किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की और अब उसके हीरो के क्रिकेट मैच देखने पर बोर्ड के एक अधिकारी ने जब इस पर आपति उठाई तो सब जगह हो-हल्ला मच गया जैसे कोई बहुत बड़ी खबर है. सच तो यह है कि पिछले दिनों रिलीज फिल्में जनता के मन में नहीं बैठ पायीं हैं जैसा कि मीडिया वाले चाहते थे।
इन कलाकारों के चेहरे और प्रदर्शन केवल दूसरों की मजाक उडाने पर टिके हैं. इसका कारण यह है कि आजकल फिल्मों और सीरियलों के लिए जो लेखक लिए जाते हैं उनसे क्लर्क की तरह काम लिया जाता है. वैसे आप निर्माता और निर्देशकों की बात माने तो इस देश में लेखकों की कमी है. ऐसा है नहीं. इन निर्माता निर्देशकों को मालुम ही नहीं कि हिन्दी भाषा में लेखकों की कमी नहीं है पर अपनी रचनाएं आवेदन की तरह लेकर उनके पास फिरने वाले नहीं है और जो उनके पास लेखन का काम मांगने आते है वह अधिक सम्मान न मिलने से क्लर्क की तरह काम करते हैं इसलिए फिल्मों के डायलाग और विषय वस्तू अब प्रभावशाली नहीं बन पाती। यही कारण है कि भव्य साईट और महंगी स्टार कास्ट की बावजूद फिल्में और सीरियल ओंधी मुहँ गिरते हैं। शायद इसलिए ही नये कलाकारों से इसलिए पुरानों का मजाक उडा कर काम चला रहे हैं पर उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि वह शो पीस की तरह है उनके आकर्षण को देखकर देखकर और सुनकर अगले ही क्षण भूल जाते हैं सम्मान तो दूर सराहते तक नहीं हैं जबकि मनोज कुमार हो या गुलाम अली अपने फन के वजह से आज भी लोगों में सम्मान का भाव रखते हैं।
2 Comments
आप के यह विचार निश्चय ही ऐसे हास्य कलाकारॊ के बारे में सोचनें को मजबूर करते हैं।आप की बात सही है कि नामी व सम्मानित कलाकारॊं पर हास्य नही होना चाहिए मैं तो मानता हूँ यदि हास्य कलाकारों को सच में ही हास्य करना है तो इन भ्रष्ट नेताऒं व समाज की सड़ी-गली मान्यताऒं पर करें ताकी जनता का कुछ भला हो।
आप जिस कार्यक्रम की बात कर रहे हैं , वह मैने थोड़ा सा देखा और गुस्से में टीवी बन्द कर दिया, उस मूर्ख कलाकार को क्या पता संगीत का क ख ग!
गुलाम अली साहब के बारे में तो उस मूर्ख ने बहुत कुछ उल्टा सीधा कहा। वे हारमोनियम को ऐसे रखते हैं मानो चोरी का हो आदि!