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	<title>Comments on: चाणक्य नीति:विपरीत स्वभाव वालों का मेल  नहीं होता</title>
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	<description>दीपक बापू कहिन का सहयोगी चिट्ठा-यहाँ मेरी मौलिक रचनाएं प्रकाशित है और इसके कहीं अन्य व्यवसायिक प्रकाशन के लिए मेरे से पूर्व अनुमति एवं पारिश्रमिक देना अनिवार्य होगा जो प्रति रचना दो हजार रूपये है । कोई लेखक इसका पूर्ण या आंशिक उपयोग कर सकता है पर उसके लिए उसे सूचना देना चाहिए ऐसा आग्रह है । ब्लोग लेखको के लिए कोई बंदिश नहीं है।दीपक भारतदीप, ग्वालियर</description>
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		<title>By: naresh jariwala</title>
		<link>http://deepakraj.wordpress.com/2007/11/21/chankya-neetiviprit-svbhaav-vaalon-ke-mel-naheen/#comment-360</link>
		<dc:creator>naresh jariwala</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 24 Nov 2007 08:04:58 +0000</pubDate>
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		<description>कर्म की गाथा ............nareshbhai jariwऐक बार ऐक राजा के यहा राजकुवर का सादी था, उस समय राजा के गुरु महाराज पधारे गुरु महाराज का उतारा राजकुवर के baju के रूम मे  उतारा दीया, राजकुवर का सादी धाम धूम से हो गई रात मे रूम मे राजकुवर ओर राजकुमारी सोने गए आधी रात मे राजकुँमारी की आँख खुल गई उनका पलंग दिवाल के साथ था ओर दिवाल के उपर तलवार लटकी हुई थी, राजकुमारी ने सोचा की ये राजकुमार तलवार असली या नकली रखते हे या नही ये सोच कर राजकुमारी तलवार लेने के लिए राजकुमार के सिर के पास दो पांव रख कर तलवार निचे उतरने लगी तलवार हाथ मे लेकर तलवार की धार देख ने लगी एसेमे राजकुवारी के हाथ से तलवार छुट गई ओर राजकुमार के गर्दन धुस गई ओर राजकुमार मर गया अब  सोच ने लगी की राजा को मालूम पड़ेगा तो राजा हमे फांसी पे लटका देगा अब मे क्या करू इतने मे उन्हें विचार आया की बाजु के रूम मे गुरु महाराज हे ओर राजकुमारी कुछ सोचकर गुरु महाराज के रूम का दरवाजा खट khtane लगी जेसे गुरु महाराज ने दरवाजा खोला की राजकुवारी चिल्ला ने लगी ओंर अपने कपडे फाड़ने लगी की बचावो बचावो गुरु महाराज ने मेरी इज्जत लुटी ओंर राजकुमार को मार डाला इतने मे सब सिपाई डोदते हुए आ गए ओंर गुरु महाराज को पकड़ कर राजा के सामने रजु  किया राजा कहा की अभी गुरु महाराज को जेल मे बंध कर दो  कल प्रजा के सामने न्याय होगा दूसरे दिन राजा ने राज महल के मेदान बिच मे खडा किया ओंर कहा की ये तो हमारे पूर्वजो के गुरु महाराज हे फांसी तो हम दे सकते नही इनका दो हाथ का पंजा कापते हे ओंर देश नीकाल करते हे राजा ने फेंसला सुना दीया ओंर गुरु महाराज का हाथ का पंजा कांत डाला ओंर राजा ने देश निकाल कर दीया गुरु महाराज सोच ने लगे की मेने ऐसा कोनसा  पाप किया हे की मेरी साथ ऐसा हुआ ऐसा सोचते सोचते चल दिए ओंर ऐक बहुत दूर गाँव मे ऐक ब्रह्मण रहेता था वो आ जनम ओंर दूसरे जनम का भविष्य जानता था गुरु महाराज उनके पास पूछ ने के लिए चल दिए के मेने तो ये जनम मे कोई पाप किया नही हे तो ये कोन से जनम का हे जब  गुरु महाराज 
ब्रह्मण के घर के पास आ गए तो देखा की ब्रह्मण की पटनी मतलब गोंरानी ब्रह्मण को झाडू से ब्रह्मण के सिर पर मार रही थी ओंर बहुत बोल बोल करती थी ओंर ब्रह्मण अपने धार्मिक पुस्तक पढ़ ने मे लगा था ये नजारा देख कर गुरु महाराज सोच ने लगे की ये क्या हमारा भविष्य बताएगा फिर भी चलो देखते हे के क्या होता हे ओंर गुरु महाराज ब्रह्मण के पास गए तब ब्रह्मण कहा बेठो महाराज,ब्रह्मण अपना पूजा पाठ पुरा करके महाराज के पास आये ओंर बोले महाराज हुकम करिये तब महाराज बोले की मे तो मेरा भविष्य जानने के लिए आया हू परन्तु आपको देख कर मेरा दुख भूल गया हू,आपने ऐसा कोनसा पाप किया हे की आपको ऐसी पत्नी मिली तब ब्रह्मण बताया की मे पिछले जनम मे कोंवा था ओंर ये मेरी पत्नी गधी थी,गधी की पीठ पकी हुई थी ओंर मे उसकी पीठ पर चोच मार रहा था ओंर मजा ले रहा था, बस उसका बदला ये जनम मे ले रही हे ये जनम मे मेरी पत्नी बनकर मेरेसे बदला ले रही हे,अखा दिन कोंवा की तरह का का कर रही हे,परन्तु महाराज आप बताये केसा आना हुआ, गुरु महाराज बोले की मेने तो ये जनम मे कोई पाप किया नही हे तो ये सजा मुजे केसी मिली, तब 
ब्राह्मण बतया की महाराज आप पिछले जनम मे आप सुबह मंदिर जा रहे थे आप एक गली से गुजर रहे थे तब अचानक एक गाय दोदती हुई आ रही थी ओंर उसके पीछे कसाई आ रहा था कसाई बोल रहा तह की पकडो पकडो आप ने गाय का दो सिंग पकड़ लिया ओंर गाय रुक गई ओंर कसाई पकड़ लिया बस ओंर गाय कसाई वादे जाकर कतल हो गया,बस उसका फल के स्वरूप मे ये जनम मे आप को ये हाथ कटना पड़ा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कर्म की गाथा &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;nareshbhai jariwऐक बार ऐक राजा के यहा राजकुवर का सादी था, उस समय राजा के गुरु महाराज पधारे गुरु महाराज का उतारा राजकुवर के baju के रूम मे  उतारा दीया, राजकुवर का सादी धाम धूम से हो गई रात मे रूम मे राजकुवर ओर राजकुमारी सोने गए आधी रात मे राजकुँमारी की आँख खुल गई उनका पलंग दिवाल के साथ था ओर दिवाल के उपर तलवार लटकी हुई थी, राजकुमारी ने सोचा की ये राजकुमार तलवार असली या नकली रखते हे या नही ये सोच कर राजकुमारी तलवार लेने के लिए राजकुमार के सिर के पास दो पांव रख कर तलवार निचे उतरने लगी तलवार हाथ मे लेकर तलवार की धार देख ने लगी एसेमे राजकुवारी के हाथ से तलवार छुट गई ओर राजकुमार के गर्दन धुस गई ओर राजकुमार मर गया अब  सोच ने लगी की राजा को मालूम पड़ेगा तो राजा हमे फांसी पे लटका देगा अब मे क्या करू इतने मे उन्हें विचार आया की बाजु के रूम मे गुरु महाराज हे ओर राजकुमारी कुछ सोचकर गुरु महाराज के रूम का दरवाजा खट khtane लगी जेसे गुरु महाराज ने दरवाजा खोला की राजकुवारी चिल्ला ने लगी ओंर अपने कपडे फाड़ने लगी की बचावो बचावो गुरु महाराज ने मेरी इज्जत लुटी ओंर राजकुमार को मार डाला इतने मे सब सिपाई डोदते हुए आ गए ओंर गुरु महाराज को पकड़ कर राजा के सामने रजु  किया राजा कहा की अभी गुरु महाराज को जेल मे बंध कर दो  कल प्रजा के सामने न्याय होगा दूसरे दिन राजा ने राज महल के मेदान बिच मे खडा किया ओंर कहा की ये तो हमारे पूर्वजो के गुरु महाराज हे फांसी तो हम दे सकते नही इनका दो हाथ का पंजा कापते हे ओंर देश नीकाल करते हे राजा ने फेंसला सुना दीया ओंर गुरु महाराज का हाथ का पंजा कांत डाला ओंर राजा ने देश निकाल कर दीया गुरु महाराज सोच ने लगे की मेने ऐसा कोनसा  पाप किया हे की मेरी साथ ऐसा हुआ ऐसा सोचते सोचते चल दिए ओंर ऐक बहुत दूर गाँव मे ऐक ब्रह्मण रहेता था वो आ जनम ओंर दूसरे जनम का भविष्य जानता था गुरु महाराज उनके पास पूछ ने के लिए चल दिए के मेने तो ये जनम मे कोई पाप किया नही हे तो ये कोन से जनम का हे जब  गुरु महाराज<br />
ब्रह्मण के घर के पास आ गए तो देखा की ब्रह्मण की पटनी मतलब गोंरानी ब्रह्मण को झाडू से ब्रह्मण के सिर पर मार रही थी ओंर बहुत बोल बोल करती थी ओंर ब्रह्मण अपने धार्मिक पुस्तक पढ़ ने मे लगा था ये नजारा देख कर गुरु महाराज सोच ने लगे की ये क्या हमारा भविष्य बताएगा फिर भी चलो देखते हे के क्या होता हे ओंर गुरु महाराज ब्रह्मण के पास गए तब ब्रह्मण कहा बेठो महाराज,ब्रह्मण अपना पूजा पाठ पुरा करके महाराज के पास आये ओंर बोले महाराज हुकम करिये तब महाराज बोले की मे तो मेरा भविष्य जानने के लिए आया हू परन्तु आपको देख कर मेरा दुख भूल गया हू,आपने ऐसा कोनसा पाप किया हे की आपको ऐसी पत्नी मिली तब ब्रह्मण बताया की मे पिछले जनम मे कोंवा था ओंर ये मेरी पत्नी गधी थी,गधी की पीठ पकी हुई थी ओंर मे उसकी पीठ पर चोच मार रहा था ओंर मजा ले रहा था, बस उसका बदला ये जनम मे ले रही हे ये जनम मे मेरी पत्नी बनकर मेरेसे बदला ले रही हे,अखा दिन कोंवा की तरह का का कर रही हे,परन्तु महाराज आप बताये केसा आना हुआ, गुरु महाराज बोले की मेने तो ये जनम मे कोई पाप किया नही हे तो ये सजा मुजे केसी मिली, तब<br />
ब्राह्मण बतया की महाराज आप पिछले जनम मे आप सुबह मंदिर जा रहे थे आप एक गली से गुजर रहे थे तब अचानक एक गाय दोदती हुई आ रही थी ओंर उसके पीछे कसाई आ रहा था कसाई बोल रहा तह की पकडो पकडो आप ने गाय का दो सिंग पकड़ लिया ओंर गाय रुक गई ओंर कसाई पकड़ लिया बस ओंर गाय कसाई वादे जाकर कतल हो गया,बस उसका फल के स्वरूप मे ये जनम मे आप को ये हाथ कटना पड़ा.</p>
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		<title>By: परमजीत बाली</title>
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		<dc:creator>परमजीत बाली</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 06:45:53 +0000</pubDate>
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		<description>सही लिखा है।</description>
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