चाणक्य नीति:विपरीत स्वभाव वालों का मेल नहीं होता


१.समाज में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा में लगी हुये वाणी पर रोक लगाओ। परनिन्दा में रस लेना दुष्ट लोगों के प्रवृति है । वाणी पर संयम तपस्या है। निंदा न करके दूसरों की प्रशंसा करने वाला ही लोकप्रिय होता है । विद्वान् व्यक्ति वही माना जाता है जो अपने व्यक्तित्व के अनुसार वार्तालाप करता है। वह वार्तालाप के प्रसंग के अनुसार ही बात करता है।
२.अच्छी से अच्छी बात अप्रासंगिक होकर भी अप्रभावी हो जाती है। यदि कोई अप्रिय बात हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो भी वह उतना ही प्रदर्शित करना चाहिये जितना अपनी शक्ति के अनुकूल हो।

३.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।
*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।
4. अर्थाभाव में मित्र, स्त्री, नौकर स्नेहीजन भी व्यक्ति का आदर नहीं करते, यदि वही व्यक्ति पुन: संपन्न हो जाये तो अनादर करने वाले फिर आदर करने लगते हैं।

5.बुद्धिमान पुरुष को तब तक ही भय की चिंता करना चाहिए जब तक वह सामने नहीं आ जाता, अगर एक बार वह सामने आ जाये तो उसका मुकाबला करना ही बेहतर है। भय के सामने आने पर घबडा कर छिपने की कोशिश करना समझदारी का काम नहीं है।
6.बुद्धिमान व्यक्ति को सदैव यह सोचना चाहिए कि उसके मित्र कितने है, और उसका समय कैसा चल रहा है। इसके अलावा अपने निवास स्थान और अपने आय व्यय पर भी विचार करते रहना चाहिए। उसे इस बात पर भी चिन्तन करना चाहिऐ कि वह कौन है, आत्मा या शरीर , स्वाधीन है अथवा पराधीन, तथा उसकी ताकत कितनी है, उसे इन बातों पर विचार करते रहना चाहिए वर्ना वह पत्थर की तरह निर्जीव हो जाता है।

७.भाग्य में लिखा बिना कार्य के कैसे होगा? आम खाना भाग्य में लिखा है तो आम के पेड की नीचे मूहं खोलकर लेटने से भी आम मुहँ में नहीं जायेगा। उसके लिए हाथ से कर्म करना होगा।तेल में जल नहीं मिल सकता। घी में जल नहीं मिलता। पारा किसी में नहीं मिल सकता। इसी प्रकार स्वभाव वाले एक दुसरे में नहीं मिल सकते.

2 Comments

  1. Posted 21/11/2007 at 06:45 | Permalink

    सही लिखा है।

  2. Posted 24/11/2007 at 08:04 | Permalink

    कर्म की गाथा …………nareshbhai jariwऐक बार ऐक राजा के यहा राजकुवर का सादी था, उस समय राजा के गुरु महाराज पधारे गुरु महाराज का उतारा राजकुवर के baju के रूम मे उतारा दीया, राजकुवर का सादी धाम धूम से हो गई रात मे रूम मे राजकुवर ओर राजकुमारी सोने गए आधी रात मे राजकुँमारी की आँख खुल गई उनका पलंग दिवाल के साथ था ओर दिवाल के उपर तलवार लटकी हुई थी, राजकुमारी ने सोचा की ये राजकुमार तलवार असली या नकली रखते हे या नही ये सोच कर राजकुमारी तलवार लेने के लिए राजकुमार के सिर के पास दो पांव रख कर तलवार निचे उतरने लगी तलवार हाथ मे लेकर तलवार की धार देख ने लगी एसेमे राजकुवारी के हाथ से तलवार छुट गई ओर राजकुमार के गर्दन धुस गई ओर राजकुमार मर गया अब सोच ने लगी की राजा को मालूम पड़ेगा तो राजा हमे फांसी पे लटका देगा अब मे क्या करू इतने मे उन्हें विचार आया की बाजु के रूम मे गुरु महाराज हे ओर राजकुमारी कुछ सोचकर गुरु महाराज के रूम का दरवाजा खट khtane लगी जेसे गुरु महाराज ने दरवाजा खोला की राजकुवारी चिल्ला ने लगी ओंर अपने कपडे फाड़ने लगी की बचावो बचावो गुरु महाराज ने मेरी इज्जत लुटी ओंर राजकुमार को मार डाला इतने मे सब सिपाई डोदते हुए आ गए ओंर गुरु महाराज को पकड़ कर राजा के सामने रजु किया राजा कहा की अभी गुरु महाराज को जेल मे बंध कर दो कल प्रजा के सामने न्याय होगा दूसरे दिन राजा ने राज महल के मेदान बिच मे खडा किया ओंर कहा की ये तो हमारे पूर्वजो के गुरु महाराज हे फांसी तो हम दे सकते नही इनका दो हाथ का पंजा कापते हे ओंर देश नीकाल करते हे राजा ने फेंसला सुना दीया ओंर गुरु महाराज का हाथ का पंजा कांत डाला ओंर राजा ने देश निकाल कर दीया गुरु महाराज सोच ने लगे की मेने ऐसा कोनसा पाप किया हे की मेरी साथ ऐसा हुआ ऐसा सोचते सोचते चल दिए ओंर ऐक बहुत दूर गाँव मे ऐक ब्रह्मण रहेता था वो आ जनम ओंर दूसरे जनम का भविष्य जानता था गुरु महाराज उनके पास पूछ ने के लिए चल दिए के मेने तो ये जनम मे कोई पाप किया नही हे तो ये कोन से जनम का हे जब गुरु महाराज
    ब्रह्मण के घर के पास आ गए तो देखा की ब्रह्मण की पटनी मतलब गोंरानी ब्रह्मण को झाडू से ब्रह्मण के सिर पर मार रही थी ओंर बहुत बोल बोल करती थी ओंर ब्रह्मण अपने धार्मिक पुस्तक पढ़ ने मे लगा था ये नजारा देख कर गुरु महाराज सोच ने लगे की ये क्या हमारा भविष्य बताएगा फिर भी चलो देखते हे के क्या होता हे ओंर गुरु महाराज ब्रह्मण के पास गए तब ब्रह्मण कहा बेठो महाराज,ब्रह्मण अपना पूजा पाठ पुरा करके महाराज के पास आये ओंर बोले महाराज हुकम करिये तब महाराज बोले की मे तो मेरा भविष्य जानने के लिए आया हू परन्तु आपको देख कर मेरा दुख भूल गया हू,आपने ऐसा कोनसा पाप किया हे की आपको ऐसी पत्नी मिली तब ब्रह्मण बताया की मे पिछले जनम मे कोंवा था ओंर ये मेरी पत्नी गधी थी,गधी की पीठ पकी हुई थी ओंर मे उसकी पीठ पर चोच मार रहा था ओंर मजा ले रहा था, बस उसका बदला ये जनम मे ले रही हे ये जनम मे मेरी पत्नी बनकर मेरेसे बदला ले रही हे,अखा दिन कोंवा की तरह का का कर रही हे,परन्तु महाराज आप बताये केसा आना हुआ, गुरु महाराज बोले की मेने तो ये जनम मे कोई पाप किया नही हे तो ये सजा मुजे केसी मिली, तब
    ब्राह्मण बतया की महाराज आप पिछले जनम मे आप सुबह मंदिर जा रहे थे आप एक गली से गुजर रहे थे तब अचानक एक गाय दोदती हुई आ रही थी ओंर उसके पीछे कसाई आ रहा था कसाई बोल रहा तह की पकडो पकडो आप ने गाय का दो सिंग पकड़ लिया ओंर गाय रुक गई ओंर कसाई पकड़ लिया बस ओंर गाय कसाई वादे जाकर कतल हो गया,बस उसका फल के स्वरूप मे ये जनम मे आप को ये हाथ कटना पड़ा.


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