झूठ बोलने की प्रतियोगिता बेमानी

लंदन के सैंटन ब्रिज में हुई एक प्रतियोगिता में ६९ वर्ष के जाँन ग्राहम को छठी बार दुनिया से सबसे झूठे इंसान का खिताब दिया गया है। वह झूठे इंसान हो सकते हैं पर हमें उनकों दुनिया का सबसे बड़ा झूठा मानने में संकोच है। अगर उनको अपने देश का कहा जाता तो हमें भला क्या आपति हो सकती थी? आपति तो उनको दुनिया का सबसे झूठा इंसान कहने पर है।

असल में हम उस हर श्रेष्ठ जगह को देखते हैं जहाँ हमारे देश का कोई शख्स पहुंच सकता है। जहाँ नहीं पहुंच सकता उसकी हम नहीं सोचते। फुटबाल में इस देश की टीम का कोई नाम लेवा नहीं है इसलिए हम यह नहीं सोचते कि इस समय दुनिया की सबसे अच्छी टीम ब्राजील की टीम है या अर्जेंटीना की या कोई और। टेनिस में इक्का दुक्का खिलाड़ी चमकते हैं वह भी डबल्स मैचों में। इसलिए हमे किसी भी प्रतियोगिता के डबल्स मैच में दिलचस्पी होती है। हमारे देश के मीडिया का एक वर्ग सानिया को जमकर गुणगान करता रहता है पर महिला एकल के परिणामों में दिलचस्पी नहीं लेते- हाँ, उनका महिला एकल की रैकिंग जरूर अखबारों में देखते हैं और जब वह आठ के आसपास होंगी तब टेनिस प्रतियोगिताओं के महिला एकल के परिणामों में दिलचस्पी लेने की सोचेंगे। आजकल हॉकी में भी दिलचस्पी नहीं लेते-हमें मालुम है अभी भारत की टीम विश्व की रैकिंग में १२ वें नंबर पर है।

स्वाभाविक है कि झूठ बोलने में नंबर वन का खिताब हमारे देश में न होना हमें अखर रहा है। इस मामले में हमारे देश का अच्छा खासा दखल है। इसलिए इसे प्रतियोगिता के बारे में पूरी खबर पढी। इसमें राजनीतिक नेताओं और वकीलों को भाग लेने के अनुमति नहीं थी। मतलब ऐसे कई तथ्य हैं जो इस प्रतियोगिता के ‘फैयर” होने में संदेह पैदा करते है। इस प्रतियोगिता में किसी भारतीय को शामिल किया गया या नहीं यह भी पता नहीं। इस प्रतियोगिता को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कहने में भी आपति है क्योंकि किसी भी ऐसी प्रतियोगिता में सभी देशों में राष्ट्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तर पर प्रतियोगिताएं होती हैं-जैसे विश्व सुन्दरी के लिए होती हैं। हमें याद नहीं आता कि हमारे देश में कोई ऐसी प्रतियोगिता हुई है और होती तो ऐसी बंदिशें रखकर उसका प्रायोजन करने का साहस किसी में नहीं है कि राजनीति और वकालत में सक्रिय लोगों को भाग लेने के अनुमति नहीं होगी। एक तरफ से भारत का सबसे ताकतवर वर्ग और दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ता बिफर जाते-दोनों से बैर लेकर भला किस्में साहस है जो ऐसी प्रतियोगिता आयोजित करता।

इसलिए हम झूठ बोलने की प्रतियोगिता को अंतर्राष्ट्रीय होने की बात को खारिज करते हैं क्योंकि इसमें हमारे देश का प्रतियोगी होता तो यकीनन वही जीतता। अगर कोई पाकिस्तानी ब्लोगर या पाठक इसे पढेगा तो आधा ही सहमत होगा और आधे पर गुस्सा हो जायेगा। प्रतियोगिता विश्व स्तर की नहीं है इस पर सहमत होगा मगर किसी भारतीय के जीतने पर असहमत होगा। अगर उससे बहस करोगे तो कह सकता है कि हमारे ‘देश की हालत देखो और बताओं कि हमारे देश के कर्णधार कितने झूठ बोलते हैं। आज वर्दी उतारेंगे, कल उतारेंगे। लोकतंत्र लाने की बात करते-करते आपातकाल थोप देते हैं। लेना है तो तुम लोग सच बोलने का खिताब ले लो। तुम्हारे लोकतंत्र के लिए इसकी कुर्बानी कर सकते हैं।”
इस आखिरी बात से भारत के ब्लोगर और पाठक सहमत नहीं होंगे। मतलब इस मामले में उनसे भी नहीं बनेगी। हम कहेंगे’तुम सच्चे’ और वह कहेंगे’तुम सच्चे’। मतलब झूठ बोलने वाली प्रतियोगिता हो तो वह फिर वही चिरप्रतिद्वंदी की शैली में आ जायेंगे। धीर-धीरे बंगलादेश वाले भी आ जायेंगे और कहेंगे-’आप दोनों सच्चे हैं, कुछ हमारे प्रदर्शन पर भी गौर फरमाईये,’ श्री लंका वाले भी भला कहाँ पीछे रहने वाले हैं।

शायद यही वजह कि यह प्रतियोगिता इस उपमहाद्वीप के देशों को अँधेरे में रखकर की जाती है। अंग्रेज डरते हैं कि कहीं क्रिकेट की तरह यह खेल भी हथिया लें।
अंग्रेज बहुत तेज हैं पहले हमारे मुकाबले अपने को सच्चे बताते थे और जब पोल खोलने लगी तो हमसे अधिक झूठ बोलने का दावा करने लगे। उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि इसमें किसी भारतीय को इस प्रतियोगिता में भाग लेने देते।

नोट-यह एक व्यंग्य लेख है, और इसमें किसी की भावनाओं को आहत करने का प्रयास नहीं किया गया। यह अखबार में छपी खबर पर आधारित है।

Leave a Reply