संत कबीर वाणी:जैसा मन है वैसा ही चमन है

मान बढ़ाई जगत में, कूकर की पहचान
प्यार किए मुख चाटई, बैर किए तन हान

संत कबीर दास जी कहते हैं कि मान पाने की लालसा, बड़ाई सुनने की इच्छ या सत्कार और यश की भूख तो संसार में कुत्ते का लक्षण है. जैसे कुत्ता पुचकारे जाने पर प्रसन्न होकर पूँछ हिलाता हुआ पैरों में लोटने लगता है और अपने मालिक का मुख चाटने लगता है. किन्तु दुत्कारे जाने पर जोर से भूँकता और काटने दौड़ता है.
भावार्थ-यहाँ कबीर दास जी मनुष्य को चेताते हैं कि थोडा दिखावटी सम्मान पाकर फूलना उसे शोभा नहीं देता यह तो कुत्ते का लक्षण है.

मोह फंद सब फंदिया, कोय न सकै निवार
कोई साधू जन पारखी , बिरला तत्व बिचार

मोह के फंदे में समस्त समस्त लोग फंसे हुए हैं, कोई भी इस फंदे का निवारण करने में सक्षम नहीं है. कोई पारखी साधू ही विरला होता है जो इस तत्व पर विचार करके इस फंदे से मुक्त हो पाता है.

भावार्थ-मोह माया का अभिन्न अंग है और माया मोह का. जैसे ज्ञान और चेतना एक दुसरे के पूरक हैं, वैसे ही अविद्या और अन्धकार भ्रम और अज्ञान के पूरक हैं. मजे की बात यह है मन से मोह और माया के प्रति लोभ और मन से ही ज्ञान और चेतना का उदय होता है.

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